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Germany Work Culture Debate: कार्य-संस्कृति, उत्पादकता और विकास की चुनौती

सिकुड़ता कार्यबल पेंशन और स्वास्थ्य-व्यय का भार उठाता है। यदि उत्पादकता पर्याप्त न बढ़े, तो कर-राजस्व ठहरेंगे और व्यय बढ़ेगा, जिससे नवाचार और अवसंरचना निवेश प्रभावित होगा। निर्यात-प्रतिस्पर्धा भी चुनौती में है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Feb 20, 2026

India EU Free Trade Agreement 2026

जर्मनी यूरोप की औद्योगिक धुरी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का प्रमुख चालक है।

के.एस. तोमर,

चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के नेतृत्व में जर्मनी का आर्थिक आत्ममंथन बर्लिन से कहीं आगे तक गूंजने वाली बहस बन चुका है। जब विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का प्रमुख नागरिकों से समृद्धि बनाए रखने के लिए 'अधिक काम' करने का आह्वान करता है, तो यह सांस्कृतिक आलस्य नहीं, बल्कि संरचनात्मक दबाव का संकेत होता है। मर्ज ने 'लाइफस्टाइल पार्ट-टाइम वर्क', अत्यधिक बीमार अवकाश व चार-दिवसीय कार्य-सप्ताह की अवधारणा की आलोचना करते हुए कहा है कि 'वर्क-लाइफ बैलेंस और चार-दिवसीय सप्ताह वर्तमान समृद्धि को बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे।' उन्होंने ग्रीस जैसे देशों में अधिक कार्य-घंटों की भी सराहना की है।

आलोचक तर्क देते हैं कि जर्मनी की प्रति घंटा उत्पादकता अब भी विश्व में अग्रणी है (ओईसीडी के अनुसार), किंतु मर्ज कुल कार्य-परिमाण पर बल देते हैं। 2026 में जर्मनी का अनुमानित जीडीपी 5.33 ट्रिलियन डॉलर (आइएमएफ अनुमान) है- जो उसे अधिकांश देशों से आगे रखता है, पर लगभग 32 ट्रिलियन डॉलर की अमरीकी अर्थव्यवस्था और 21 ट्रिलियन डॉलर के चीन से काफी पीछे है। भारत, लगभग 4.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ, समग्र आकार में अंतर घटा रहा है, भले ही प्रति व्यक्ति आय में बड़ा अंतर कायम है। स्पष्ट है कि यह बहस केवल जर्मनी की नहीं, बल्कि वृद्ध होती आबादी और बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना के बीच विकास बनाए रखने की चुनौती का प्रतीक है।

यह प्रश्न पूरे विकसित विश्व के सामने है। जर्मनी यूरोप की औद्योगिक धुरी और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का प्रमुख चालक है। उसका इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल, रसायन और पूंजीगत वस्तु क्षेत्र एशिया और भारत से गहराई से जुड़ा है। वहां की किसी भी संरचनात्मक मंदी का असर मध्यवर्ती वस्तुओं की मांग, तकनीकी साझेदारी और निवेश प्रवाह पर पड़ता है।

श्रम नीति में परिवर्तन एशियाई उत्पादन नेटवर्क तक लहर पैदा करता है और निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की रणनीतियों को प्रभावित करता है। पिछले दो दशकों से जर्मनी की जनसंख्या लगभग स्थिर है; प्राकृतिक वृद्धि नकारात्मक रही है, जिसे आप्रवासन ने संभाला है। समृद्धि बढ़ने के साथ प्रति श्रमिक वार्षिक कार्य-घंटे घटे हैं। 2024-25 के यूरोस्टेट और ओईसीडी आंकड़ों के अनुसार औसत साप्ताहिक कार्य-घंटे 33.9-34.6 हैं- यूरोपीय संघ में सबसे कम में से एक है- जो लगभग 1,350 वार्षिक घंटों के बराबर है, जबकि ग्रीस में यह लगभग 39.8 है। यह एक परिपक्व कल्याणकारी समाज की प्रवृत्ति है, जहां भौतिक सुरक्षा के बाद अवकाश को महत्व मिलता है।

इसके विपरीत, चीन ने विशाल श्रम-निवेश और निर्यात-उन्मुख विस्तार से कुल आकार में जर्मनी को पीछे छोड़ा, जबकि अमरीका ने बेहतर जनसांख्यिकी, श्रम-लचीलापन और नवाचार से बढ़त बनाए रखी। भारत के लिए संकेत स्पष्ट हैं। जर्मन कंपनियां उच्च श्रम लागत और जनसांख्यिकीय दबाव के बीच लागत-कुशल बाजारों की ओर रुख कर सकती हैं। जनवरी 2026 में संपन्न भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसके तहत 2032 तक यूरोपीय निर्यात दोगुना होने और 96% से अधिक वस्तुओं पर शुल्क में कटौती का अनुमान है, भारत-जर्मनी व्यापार (जो 29 अरब डॉलर से अधिक है) को गति दे सकता है। परंतु केवल जनसांख्यिकीय लाभ पर्याप्त नहीं। कौशल, उत्पादकता और नियामकीय सुधार अनिवार्य हैं।

मर्ज का तर्क है कि समग्र 'कार्य-प्रदर्शन' अपर्याप्त है। दशकों में प्रति कर्मचारी वार्षिक कार्य-घंटे घटे हैं- यह आलस्य नहीं, बल्कि उच्च आय वाले समाज का तर्कसंगत व्यवहार है। जब वेतन ऊंचे हों, तो श्रमिक अतिरिक्त आय की बजाय अवकाश चुन सकते हैं। मजबूत श्रम-सुरक्षा और कड़े कार्य-समय नियमों ने कार्य-जीवन संतुलन सुनिश्चित किया है, पर लचीलापन सीमित किया है। तीव्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कठोर संरचनाएं बाधा बन सकती हैं।

जनसांख्यिकीय दबाव और गंभीर है। डेस्टाटिस के अनुसार 2035 तक 67 वर्ष से अधिक आयु वाले लोगों की हिस्सेदारी 25-27% तक पहुंच सकती है। वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात भी तेजी से बढ़ेगा। यदि महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी नहीं बढ़ती या उत्पादकता में उछाल नहीं आता, तो विकास दर पर दबाव रहेगा। यूरोप के ऊर्जा-परिवर्तन और भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच उद्योगों की लागत बढ़ी है। उच्च श्रम-लागत, कम कार्य-घंटे और महंगी ऊर्जा मिलकर औद्योगिक गतिशीलता कमजोर कर सकते हैं।

धीमी वृद्धि भू-राजनीतिक प्रभाव को सीमित करती है। 2026 के लिए 1% के आसपास का विकास अनुमान दर्शाता है कि जर्मनी की गति अपेक्षाकृत सुस्त है। सिकुड़ता कार्यबल पेंशन और स्वास्थ्य-व्यय का भार उठाता है। यदि उत्पादकता पर्याप्त न बढ़े, तो कर-राजस्व ठहरेंगे और व्यय बढ़ेगा, जिससे नवाचार और अवसंरचना निवेश प्रभावित होगा। निर्यात-प्रतिस्पर्धा भी चुनौती में है। यदि लागत-संरचना एशियाई उत्पादकों से अधिक रही, तो उत्पादन और बाजार-हिस्सा पूर्व की ओर खिसक सकता है।

भारत के लिए यह अवसर है- बशर्ते लॉजिस्टिक्स, नीति-स्थिरता और कौशल-आधार सुदृढ़ हों। समाधान प्रोत्साहनों के पुनर्संतुलन में है। कर-प्रणाली अतिरिक्त श्रम को दंडित न करे, ऊर्जा-नीति को पर्यावरण और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन साधना होगा। जर्मनी की यह बहस एक सार्वभौमिक संदेश देती है- समृद्धि स्थिर नहीं रहती। वैश्विक अर्थव्यवस्था में न तो केवल उच्च वेतन और न ही केवल लंबे कार्य-घंटे सफलता की गारंटी हैं। दीर्घकालिक स्थिरता का आधार है निरंतर उत्पादकता, संतुलित जनसांख्यिकी और समयानुकूल नीतिगत अनुकूलन। यही विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए समान रूप से प्रासंगिक सत्य है।