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संपादकीय: मुफ्त की योजनाओं पर नकेल कसने की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने चुनावी फ्रीबीज संस्कृति पर गंभीर बहस छेड़ी है। सार्वभौमिक मुफ्त योजनाएं राज्यों पर कर्ज बढ़ाकर पूंजीगत व्यय और विकास को प्रभावित करती हैं। लेख में तर्क है कि लक्षित, पारदर्शी और वित्तीय रूप से जिम्मेदार कल्याणकारी नीतियां ही दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित कर सकती हैं।

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जयपुर

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arun Kumar

Feb 20, 2026

Supreme Court Freebies Comment

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ की तमिलनाडु सरकार को मुफ्त की योजनाओं पर फटकार...

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने चुनावी राजनीति में बढ़ती 'फ्रीबीज संस्कृति' पर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु सरकार को मुफ्त की योजनाओं पर फटकार लगाते हुए दूसरे राज्यों को भी कड़ा संदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा कि मुफ्त सुविधाएं सार्वभौमिक रूप से बांटकर आखिर देश में किस तरह की संस्कृति विकसित की जा रही है। मामला तमिलनाडु सरकार के बिना आय स्तर की परवाह किए सभी को मुफ्त बिजली देने के ऐलान से जुड़ा था।

गंभीर बात यह है कि फ्रीबीज योजनाओं के जरिए जनता को उपकृत करने से राज्यों पर कर्ज का बोझ बढ़ने का संकट रहता है। फ्रीबीज योजनाएं देश और राज्यों की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा रही हैं। कैपिटल एक्सपेंडिचर कम हो रहा है, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र तक प्रभावित हुए हैं। राज्य कर्ज लेकर खपत बढ़ा रहे हैं। आर्थिक सर्वे 2025-26 ने भी चेतावनी दी कि ये योजनाएं उत्पादक निवेश को दबाती हैं। अधिकांश राज्य राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं, फिर भी विकास परियोजनाओं को प्राथमिकता देने के बजाय मुफ्त योजनाओं पर अधिक खर्च कर रहे हैं। सीमित संसाधनों वाले राज्यों के सामने बुनियादी ढांचे, औद्योगिक निवेश, कौशल विकास और रोजगार सृजन जैसी दीर्घकालिक आवश्यकताएं हैं।

यदि बजट का बड़ा हिस्सा मुफ्त वितरण में खर्च हो जाएगा, तो पूंजीगत व्यय और रोजगार सृजन की योजनाएं प्रभावित होंगी। परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता दोनों पर असर पड़ेगा। हालांकि यह भी सच है कि भारत जैसे सामाजिक-आर्थिक असमानता वाले देश में लक्षित सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं अनिवार्य हैं। गरीब और वंचित तबकों को शिक्षा, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसी मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच दिलाना राज्य का कर्तव्य है। लेकिन इसके लिए सटीक पहचान, आय-आधारित पात्रता और पारदर्शी तंत्र की आवश्यकता है। सार्वभौमिक मुफ्त वितरण अल्पकालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकता है, परंतु दीर्घकाल में यह वित्तीय अनुशासन को कमजोर कर सकता है।

फ्रीबीज की राजनीति लोकतांत्रिक विमर्श को भी प्रभावित करती है। चुनावी बहसें विकास, रोजगार, शासन-सुधार और संस्थागत मजबूती से हटकर तात्कालिक लाभों की प्रतिस्पर्धा में बदल जाती हैं। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी किसी विशेष राज्य की आलोचना मात्र नहीं, बल्कि एक व्यापक चेतावनी है। यह समय है कि राजनीतिक दल और राज्य सरकारें 'मुफ्त' की प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर टिकाऊ विकास मॉडल पर ध्यान दें। कल्याणकारी योजनाएं हों, परंतु लक्षित और वित्तीय रूप से उत्तरदायी। संसाधन सीमित हैं, आकांक्षाएं असीमित। ऐसे में संतुलित नीति ही दीर्घकालिक समृद्धि की राह दिखा सकती है।