
सच्ची प्रगति वही है जो समावेशी, टिकाऊ और मानव-केंद्रित हो...
नृपेन्द्र अभिषेक नृप,
विकास को सामान्यत: आंकड़ों के माध्यम से मापा जाता है। जीडीपी की वृद्धि, निवेश में बढ़ोतरी, बुनियादी ढांचे का विस्तार और औद्योगिक उत्पादन जैसे संकेतक लंबे समय से प्रगति के मानक बने हुए हैं। दुनियाभर के देश अपनी आर्थिक रैंकिंग सुधारने के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं। भारत भी आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां वह वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। लेकिन इसी लक्ष्य के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठता है कि क्या केवल आर्थिक विकास ही प्रगति की सही पहचान हो सकता है, या फिर विकास के केंद्र में मानव जीवन की भलाई और खुशहाली को रखना अधिक आवश्यक है?
यह बहस आर्थिक प्रगति के महत्व को नकारने की नहीं, बल्कि विकास की परिभाषा को इस तरह बदलने की है ताकि अर्थव्यवस्था इंसान की सेवा करे, न कि इंसान केवल अर्थव्यवस्था का साधन बनकर रह जाए। आर्थिक विकास निश्चित रूप से अवसरों के नए द्वार खोलता है। उत्पादन में वृद्धि, तकनीकी नवाचार और मजबूत बाजार रोजगार के अवसर पैदा करते हैं, आधारभूत संरचना को बेहतर बनाते हैं और राष्ट्रीय आय को बढ़ाते हैं। भारत की आर्थिक उदारीकरण के बाद की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि कैसे खुली अर्थव्यवस्था और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन देने से विकास की गति तेज हो सकती है।
करोड़ों लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठे, शहरों का विस्तार हुआ और भारत विश्व अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरा। ये उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं क्योंकि किसी भी देश के लिए मजबूत आर्थिक आधार के बिना सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करना संभव नहीं होता। फिर भी, चुनौती यह है कि विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहे हैं और आर्थिक आंकड़ों तथा आम नागरिकों के वास्तविक जीवन अनुभवों के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। आज भी अनेक लोग स्वच्छ हवा, सुरक्षित पेयजल, पौष्टिक भोजन, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बड़े शहरों में बढ़ता प्रदूषण, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में वृद्धि और इलाज की बढ़ती लागत यह दिखाती है कि विकास की वर्तमान दिशा में कई कमियां हैं। जब आर्थिक सफलता के साथ पर्यावरणीय क्षति और स्वास्थ्य संबंधी असुरक्षा भी बढ़े, तो यह विकास की स्थिरता पर सवाल खड़े करता है। ऐसा विकास, जो प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए, अंतत: आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी कमजोर करता है। इसलिए आवश्यक है कि अल्पकालिक लाभों की जगह दीर्घकालिक और मानव-केंद्रित विकास दृष्टि को अपनाया जाए। विकास की चर्चा में रोजगार की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
तेज आर्थिक वृद्धि हमेशा पर्याप्त और स्थायी रोजगार में परिवर्तित नहीं होती। कई बार अर्थव्यवस्था बढ़ती है, लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाते, जिसे 'जॉबलेस ग्रोथ' कहा जाता है। भारत जैसे युवा देश में विकास की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि युवाओं को सम्मानजनक और स्थिर रोजगार मिल सके। यदि विकास रोजगार सृजन में विफल रहता है, तो आर्थिक वृद्धि केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाती है और सामाजिक परिवर्तन अधूरा रह जाता है। इसलिए विकास का लक्ष्य केवल धन कमाना नहीं, बल्कि ऐसे अवसर पैदा करना होना चाहिए जो लोगों को सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन दे सकें। दुनिया के कई देशों के अनुभव भी हमें महत्वपूर्ण सीख देते हैं।
कुछ देश ऐसे हैं जिनकी जीडीपी बहुत अधिक नहीं है, फिर भी वे मानव विकास के मानकों पर आगे हैं क्योंकि उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी है। इन देशों ने नागरिकों को केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मानव के रूप में देखा है जिसकी खुशहाली ही समाज की असली ताकत है। सस्ती या नि:शुल्क शिक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएं और मजबूत सार्वजनिक परिवहन जैसे उपाय सुनिश्चित करते हैं कि विकास का लाभ हर वर्ग तक पहुंचे। ऐसे मॉडल यह सिखाते हैं कि विकास केवल ऊंची इमारतों या शेयर बाजार की मजबूती से नहीं मापा जा सकता, बल्कि इससे कि आम नागरिक अपने जीवन को कितना सुरक्षित, स्वस्थ और आशावान महसूस करते हैं।
वर्तमान समय में पर्यावरणीय संतुलन भी विकास का एक निर्णायक आयाम बन चुका है। जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मौसमी घटनाएं और प्राकृतिक संसाधनों की कमी अब भविष्य की समस्याएं नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकताएं हैं। यदि औद्योगिक विस्तार पर्यावरणीय सुरक्षा के बिना होता है, तो नदियों का प्रदूषण, जैव विविधता का नुकसान और कृषि उत्पादन में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आती हैं। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी कृषि और प्रकृति पर निर्भर है, पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। भविष्य का विकास मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें हरित ऊर्जा, टिकाऊ शहरी योजना और जिम्मेदार उपभोग को महत्व दिया जाए ताकि प्रगति पर्यावरण की कीमत पर न हो।
सामाजिक समानता का प्रश्न भी विकास की नैतिकता से जुड़ा हुआ है। यदि समाज का बड़ा हिस्सा आर्थिक असमानता, क्षेत्रीय विषमता या सामाजिक बाधाओं के कारण पीछे रह जाए, तो विकास अपनी विश्वसनीयता खो देता है। समावेशी विकास का अर्थ है ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश, छोटे व्यवसायों को समर्थन, महिलाओं को समान अवसर और शिक्षा व तकनीक तक व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना। केवल कुछ लोगों तक सीमित विकास सामाजिक तनाव को जन्म देता है, जबकि अवसरों का समान वितरण समाज को अधिक मजबूत और स्थिर बनाता है। यह संतुलन स्थापित करने में सार्वजनिक नीतियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सरकारों को केवल आर्थिक संकेतकों तक सीमित न रहकर स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और नागरिक संतुष्टि जैसे व्यापक मानकों को भी विकास के मापदंड बनाना होगा। बजट और नीतिगत प्राथमिकताओं में स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा को पर्याप्त महत्व देना आवश्यक है। साथ ही प्रशासनिक सुधार भी जरूरी हैं ताकि भ्रष्टाचार, अक्षमता और नीतिगत अस्थिरता जैसी समस्याएं विकास के लाभों को जनता तक पहुंचने से न रोक सकें। एक नए विकास सूत्र की कल्पना केवल नीतिगत बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी सोच और जीवन मूल्यों में बदलाव की भी मांग करती है।
आधुनिक समाज में उपभोग और भौतिक उपलब्धियों को सफलता का प्रतीक माना जाता है, जबकि वास्तविक प्रगति सामुदायिक सहयोग, मानसिक स्वास्थ्य, संतुलित जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य में निहित हो सकती है। जब लोग अपने भविष्य को लेकर सुरक्षित और आश्वस्त महसूस करते हैं, तभी आर्थिक उत्पादकता भी स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। इसलिए मानव विकास में निवेश आर्थिक विकास का विकल्प नहीं, बल्कि उसे मजबूत करने का माध्यम है। तकनीक और नवाचार भी मानव-केंद्रित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म शासन को पारदर्शी बना सकते हैं, शिक्षा को दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंचा सकते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बना सकते हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा नई उद्योग संभावनाएं और रोजगार के अवसर पैदा कर सकती है। परंतु यह भी आवश्यक है कि तकनीक सबके लिए उपलब्ध हो, क्योंकि यदि डिजिटल असमानता बढ़ी तो समाज में नए प्रकार की विषमताएं जन्म लेंगी। इसलिए कौशल विकास और डिजिटल पहुंच का विस्तार विकास की सफलता के लिए अनिवार्य है। जैसे-जैसे भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विकास आखिर किसके लिए और किस उद्देश्य से हो रहा है। यदि विकास का परिणाम स्वच्छ शहर, स्वस्थ नागरिक, सशक्त श्रमिक और सुरक्षित पर्यावरण के रूप में सामने आता है, तभी उसे सच्ची प्रगति कहा जा सकता है। लेकिन यदि इसके साथ असमानता, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है, तो विकास की दिशा पर पुनर्विचार करना जरूरी हो जाता है।
एक परिपक्व विकास मॉडल वही है जो अर्थव्यवस्था को मानव जीवन को बेहतर बनाने का साधन माने, अंतिम लक्ष्य नहीं। वास्तव में विकास का भविष्य संतुलन में निहित है। आर्थिक शक्ति आवश्यक है, लेकिन मानवता को नीति और योजना के केंद्र में बनाए रखना उससे भी अधिक जरूरी है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक सफलता केवल वित्तीय सूचकों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के सम्मान, स्वास्थ्य, सुरक्षा और खुशहाली से मापी जाती है। यदि भारत विकास की व्यापक और मानवीय दृष्टि अपनाता है, तो वह दुनिया के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है, ऐसा मॉडल जिसमें आर्थिक वृद्धि और मानवीय कल्याण साथ-साथ आगे बढ़ें और एक समावेशी, संतुलित तथा टिकाऊ भविष्य का निर्माण करें।
Published on:
19 Feb 2026 06:26 pm
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