
एक-दूसरे की होड़ में दिखावे में कोई पीछे नहीं रहता...
कर्पूर चन्द्र कुलिश,
जन्म शताब्दी वर्ष,
भाग- 48,
मध्यमवर्गीय परिवारों का यह स्वभाव है कि वे अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर बताएं। धनी वर्ग का स्वभाव आडम्बर में रहने का है। जिनके पास धन पड़ा है, वे उसका भौंडा प्रदर्शन सड़कों पर करते हैं। मध्यमवर्गीय लोग उनसे पीछे नहीं रहना चाहते। शादी-ब्याह के मौके इस दिखावे के लिए सहज माध्यम बनते हैं। आजकल शादी की सालगिरह भी धूमधाम से मनाई जाती है और बच्चों की सालगिरह भी उसी तरह। शादी की सालगिरह एक पीढ़ी पुरानी है। इससे पूर्व ऐसे जलसे कम ही देखने में आते थे। आजकल एक चलन हो गया है।
ऐसा भी नहीं है कि तलाक का दौर बढ़ गया हो। पश्चिम में तलाक का दौर इतना तेज हो गया है कि विवाहित लोग अपनी शादी की सालगिरह मनाकर यह अहसास करना चाहते हैं कि उनका वैवाहिक जीवन कितना लम्बा चला। पश्चिम के देश अधिक सम्पन्न और दबदबे वाले हैं, अत: भारतवासी उनके ढर्रे में ढलना सहज ही पसंद करने लगे। यही नहीं कि हम लोग ही पश्चिम की नकल करते हैं। कई पश्चिमी पर्यटक हमारे पांच सितारा होटलों में राजसी ठाठ-बाट से भारतीय शैली की शादियां रचाते हैं। उनके लिए ऐसी शादियां एलबम का आकार बढ़ाने के लिए होती हैं और हमारे लिए कौतुक बढ़ाने वाली।
मध्यमवर्गीय और शहरी परिवारों में कई नए-नए शौक चल पड़े हैं। इनमें एक शौक 'लेडीज संगीत' का है। पुरानी पीढ़ी के लोग बना और बनड़ी गाया करते थे। उसी का संशोधित, संस्कारित, परिष्कृत, भ्रष्ट, विकृत या ऐसा ही कुछ 'लेडीज संगीत' है। कोई-कोई इसे महिला संगीत के नाम से भी पुकारते हैं। इसका प्रचलन और विस्तार तो इतना हो गया है कि धनाढ्य लोग तो बड़े-बड़े फिल्मी सितारों को प्रदर्शन के लिए बुलाने लगे हैं।
अधबिचले लोग इस मामले में स्वावलम्बी हैं किन्तु प्रदर्शन में पीछे नहीं रहना चाहते। एक-एक महीने पहले लेडीज संगीत की तैयारियां चलती हैं। बहू-बेटियां अपना-अपना कला-कौशल नृत्य संगीत के माध्यम से दिखाती हैं। अलबत्ता यह सब फिल्मी तर्ज पर होता है। इसमें पॉप म्यूजिक भी जुड़ जाता है। प्रतिभा के इस आयोजन की होड़ तेजी से चल रही है।
संगीत-नृत्य की इस शैली में आजकल शादियों-जलसों में आर्केस्ट्रा बुलाए जाते हैं। इनमें गायन-वादन और नृत्य का अच्छा कॉकटेल होता है। अलबत्ता उसका आधार फिल्मी संगीत ही होता है और वह सुनने वालों को सुहाता भी है। यह बात दूसरी है कि उसके सुनने वाले भी बिरले ही होते हैं। बहुधा आर्केस्ट्रा वाले मंच पर अपना कला-कौशल दिखाते रहते हैं। सुनने वाले मेहमान खाने-पीने और रीति-रिवाजों को पूरा कराने में मशगूल रहते हैं।
कभी-कभी कोई 'गुण ग्राहक रसिक' वाह-वाह भी कर देता है। इस संगीत की गर्जना इतनी प्रलय होती है कि महफिल के मेहमान आपस में बात नहीं कर सकते। वास्तव में यह संगीत मेहमानों के लिए उतना नहीं होता जितना कि मोहल्ले वालों के लिए होता है। मोहल्ले वाले जानते हैं कि कभी उनके घर में भी इसी तरह के मनोरंजन की जरूरत पड़ सकती है। (31 जुलाई 1996 को प्रकाशित 'अदब-कायदे और स्टाइलट आलेख के अंश)
लुटताँ-लुटताँ, लुट गया, लुटिया बरस हजार।
खेवाँ-खाँवा आज भी, धन दौलत अम्बार।।
('सात सैंकड़ा' से)
पहनावे में अमरीकी स्त्री साड़ी पहनने को तैयार है, बशर्ते उसे पहनना आ जाए। साड़ी पर हर अमरीकी स्त्री की नजर टिक जाती है। मुझे जयपुर की ही एक छात्रा गृहिणी कुसुम बहरी ने सैन फ्रांसिस्को में बताया कि उसके पास अमरीकी लड़कियां साड़ी पहनना सीखने के लिए पहुंच जाती हैं। बूस्टर में एक गृहिणी, मिसेज मिलर, जितनी देर मेरे साथ रहीं, भारत के इतिहास-पुराणों की ही बात करती गईं। वहां के अखबार 'टेलीग्राफ एंड गेजेट' के कार्यालय में तो एक महिला ने मेरे सामने गीता-उपदेश का अंग्रेजी संस्करण रख कर मुझे विस्मय में डाल दिया। (यात्रा वृत्तांत पर आधारित पुस्तक 'अमरीका एक विहंगम दृष्टि' से)
जारी…
कुलिश जी का सृजन संसार पढ़ें आगामी गुरुवार को भी
Updated on:
19 Feb 2026 03:34 pm
Published on:
19 Feb 2026 03:31 pm
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