
मन के अनंत स्वरूप और उसने त्रिगुण के अनुरूप इच्छाएं पैदा होने पर रोशनी डालते पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला 'शरीर ही ब्रह्मांड' के लेख 'प्रकृति से प्रभावित है मन' को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उनका कहना है कि लेख मन के भीतर चलते अंतर्द्वंद्वों को परिभाषित करने के साथ उनकी तार्किक व्याख्या करने वाला है। यह जीव की यात्रा और जीव में मौजूद प्रकृति के अंतर्संबंधों की व्याख्या करने वाला भी है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से
लेख प्रकृति से प्रभावित है । इसमें मन का जो विश्लेषण किया गया है वह हमारे जीवन चक्र का सटीक विश्लेषण है। मन तो चंचल होता है। मन की चंचलता पर नियंत्रण प्रत्येक व्यक्ति को रखना चाहिए।ऋतु परिवर्तन का हमारे जीवन में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रकृति के अनुरूप ही हमारी मनोदशा बदलती है। लेख में प्रकृति के बदलाव से मानव जीवन में होने वाले बदलाव को भी विस्तार से बताया गया है।
पंडित गोविंद व्यास, हरदा
प्रकृति के विभिन्न गुण और तत्त्व हमारे मन, कर्म और इच्छाओं पर प्रभाव डालते हैं। सत्त्व, रजस और तमस हमारे जीवन और विचारों को संचालित करते हैं। इन तीनों गुणों के प्रभाव से मनुष्य के विचार और कर्म उत्पन्न होते हैं और यह तय होता है कि व्यक्ति किस दिशा में अपने जीवन को ले जाएगा। मनुष्य अपने कर्मों और मनोभावों से प्रकृति के तीनों गुणों को प्रभावित करता है। हमारे कर्मों के परिणाम भी इन्हीं गुणों पर निर्भर होते हैं। जीवन में सही दिशा और शांति प्राप्त करने के लिए प्रकृति के अनुसार ही चलना चाहिए और इसके गुणों को समझना चाहिए। लेख ज्ञानवर्धक और पठनीय है।
मुन्ना शेंडे, छिंदवाड़ा
मन के भीतर ही भीतर चलते अंतर्द्वंद्वों को परिभाषित कर उसकी तार्किक व्याख्या करता यह आलेख एक अलग मोड़ तक ले जाता है। प्रकृति में जीव की यात्रा और जीव में मौजूद प्रकृति के अंतर्संबंधों को इसमें गहराई से विश्लेषण किया गया है। मनुष्य की प्रवृत्ति, कर्म के प्रति उसकी अनिवार्यता और जीवन के प्रति उसका अनुराग इन सबके बीच प्रकृति की व्यवस्था और उसके भीतर मनुष्य का अपना रहन -सहन, यह सब उथल-पुथल हमारे भीतर भी होती है । निरंतर यह विचार मन में कौंधता है कि मनुष्य अपनी छोटी सी व्यवस्था को ठीक से नहीं चला पाता और प्रकृति की यह व्यवस्था इतनी वृहद होकर भी किस तरह निरंतर चलती रहती है। यह सही है कि आज जितनी भी विषमताएं पनप रही हैं वह मनुष्य की स्वार्थी प्रवृत्ति के कारण और प्रकृति की व्यवस्था को बाधित करने की वजह से हैं। कर्म के प्रति मनुष्य का समर्पित रहना ही इस व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है। आलेख मनुष्य के मन के भावों के साथ मनुष्यता के कर्त्तव्य के प्रति भी सजग करता है।
आशीष दशोत्तर, रतलाम
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लेख में अहंकारमुक्त जीवन की सीख दी गई है। अहंकार को छोड़कर हम विनम्रता को अपनाएं और अपने जीवन में सदैव दूसरों का सम्मान करें। स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की इच्छा को त्याग कर, निष्काम भाव से कार्य करें। मोह-माया से दूर रहते हुए एक संतुलित जीवन जीएं, जिससे मोक्ष मार्ग मिलेगा।
सुभाष शर्मा, शिक्षाविदृ, खंडवा
लेख में जीवन में प्रकृति का विशेष महत्व बताया गया है। प्रकृति है तो जीवन खुशहाल है। प्रकृति से ही मन प्रभावित होता है। प्रकृति से ही मन प्रभावित होता है। लोग नदी, झरने, जंगल के करीब पहुंचते हैं तो मन प्रसन्नचित हो जाता है। जीवन का आनंद प्रकृति में है।
शिवशंकर यादव, मंडला
मानव जीवन की सभी समस्याओं, समाधान और सुख-दुःख की वजह मन है। मन यदि स्थिर और शांत है तो सुख समृद्धि की आवक होती है। वहीं मन चंचल और विचलित होता है और गलत इच्छाएं जागृत होती हैं तो ये मानव जीवन में दुखों का प्रवेश कराता है। मन ही व्यक्ति को जीत और हार के लिए प्रेरित करता है। इच्छा शक्तियां इसी के वश में होकर काम करती हैं। मन लग गया तो हर असंभव सा लगने वाला काम भी आसानी से हो जाता है, और बेमन से अच्छा खासा काम भी बिगड़ जाता है। मन को स्थिर और शांत रखने से ही जीवन में शांति बनी रहती है। इसके लिए आवश्यक है ईश्वर से लगन लगाना। योग ध्यान से मन को वश में किया जा सकता है, जिसके प्रभाव से गलत रास्तों के बजाय अच्छे कामों की ओर व्यक्ति अग्रसर होता है।
पं. अनूप देव, गीता धाम, जबलपुर
प्रकृति द्वारा मनुष्य और पशु अलग-अलग योनियों में जन्मे हैं, उसी के अनुसार हम सभी अपने अपने कार्य और कर्म करते हैं। ऐसा करने के पीछे भी कोई न कोई प्रारब्ध जुड़ा होता है। यही कर्म और सद्कार्य हमें प्रकृति से जोड़े रखते हैं। कोठारी ने लेख में इसी पर रोशनी डाली है।
पुजारी प्रदीप गुरु, महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन
Published on:
20 Oct 2024 05:35 pm
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