
यूं तो कहने को शरीर स्त्री-पुरुष है, किन्तु यह बात इतनी सहज नहीं है। गीता कह रही है—
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद:।। (13.2)
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचरा:।। (13.6)
इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं सङ्घातश्चेतनाधृति:।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।। (13.7)
पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, मूल प्रकृति, दस इन्द्रियां, मन, पांच इन्द्रियों के विषय, इच्छा, द्वेष, सुख-दु:ख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति। यह क्षेत्र कहलाता है। इसी का स्त्री-पुरुष भेद होता है। जीवात्मा क्षेत्रज्ञ कहलाता है।
प्रकृति-पुरुष ही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ हैं। क्षेत्र ही करण है। कर्म करने का साधन है। प्रकृति है। क्षेत्रज्ञ भीतर रहने वाला आत्मा है, फल भोगने वाला है। प्रकृति कामना है, कर्म में प्रवृत्त करती है। कर्मानुसार योनियों में जन्म लेने का कारण बनती है। जन्म-कर्म-फल का सारा प्रपंच देह के माध्यम से दिखाई पड़ता है, किन्तु सूक्ष्म स्तर पर यह अग्नि-यम-आदित्य, आप:-वायु-सोम, प्रकृति, वर्ण (वीर्य) एवं कर्मफल के द्वारा घटित होता है। कामना में भी योग, भोग तथा रोग की प्रधानता रहती है।
प्रकृति-पुरुष को तात्त्विक रूप में जानना ही ज्ञान है। अध्यात्म के चार अंग हैं—शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा। इनमें से बुद्धि आग्नेयी व मन सौम्य है। पुरुष में आग्नेयी बुद्धि की प्रधानता रहती है तथा स्त्री में सौम्य मन की। प्रजा की उत्पत्ति में स्थूल-सूक्ष्म व कारण तीनों शरीर काम आते हैं। स्थूल दृष्टि से पुरुष एवं स्त्री क्रमश: आग्नेय व सौम्य हैं। सूक्ष्म स्तर पर ये ही क्रमश: शुक्र व शोणित रूप में सोम और अग्नि हैं। सूक्ष्मतम कारण स्तर पर शुक्र-सोम का आग्नेय वृषा प्राण तथा आग्नेय-शोणित का सौम्य योषा प्राण संयुक्त होते हैं। इस योषा-वृषा प्राण के मिथुन भाव से ही संतति उत्पन्न होती है।
पुरुष भीतर सौम्य होता है अत: उसका मन संकल्पित नहीं रहता है। बुद्धि पर मन का आच्छादन होने से मन चंचल ही बना रहता है। पुरुष शरीर का बल (शक्ति) सोम (रेत-शुक्र) में निहित होता है। चंचल मन और बल में द्वन्द्व बना रहता है। एकाग्रता का अभाव परिलक्षित होता है। दो-तीन कार्य एक साथ नहीं कर सकता। मन को बार-बार संकल्पित करना पड़ता है। यह उसके भीतर की निर्बलता का द्योतक है।
स्त्री शरीर भीतर आग्नेय है। उसके मन का संकल्प दृढ़ होता है। बुद्धि में बृहस्पति और शुक्राचार्य की युति है। स्त्री-पुरुष का भीतरी विकास ही महत्त्वपूर्ण है। वही उसका ज्ञान भाग है। पुरुष का ज्ञान सौम्य होकर साधना पथ पर अग्रसर हो पड़ता है। स्त्री में चंचलता और रजोगुण की बहुलता होती है अत: चलनात्मक स्वभाव वाला रजोगुण उसको सहजता से स्थिर भाव में नहीं रहने देता। वह स्वभाव से भी कामना का पर्याय है। अभाव ही कामना का स्रोत है। शरीर की सौम्यता भी आश्रय ढंूढ़ती है- अग्नि का। सोम ऋत तत्त्व है। ऋत तत्त्व को प्रतिष्ठित होने के लिए सत्य का आश्रय अपेक्षित रहता है। बाल-युवा-वृद्ध तीनों ही अवस्थाओं में इसके संरक्षण का दायित्व क्रमश: पिता-पति एवं पुत्र को दिया गया है—
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ (मनुस्मृति ९.३)
यद्यपि सोम बल है किन्तु बल को रहने के लिए, प्रतिष्ठित होने के लिए कोई आधार चाहिए। प्रतिष्ठित होकर ही बल का स्वरूप दिखाई देता है तब अग्नि को बलयुक्त होने पर बलवान कहा जाएगा। पुरुष को बलवान कहने के पीछे यही तथ्य है। स्त्री-पुरुष की शक्ति है तथा पुरुष शक्तिमान है। यही शिव-शक्ति स्वरूप अद्र्धनारीश्वर है। इसका एक अभिप्राय यह भी है कि प्रत्येक पुरुष व स्त्री में अग्नि व सोम दोनों विद्यमान रहते हैं। स्त्रिय: सतीस्तां उ में पुंस आहु:… ऋग्वेद का मंत्र भी यही प्रतिपादित करता है कि स्त्री ही पुरुष की प्रतिष्ठा है। जिन्हें हम पुरुष कहते हैं वे अग्निप्रधान आत्मदृष्टि से स्त्रियां ही हैं। आत्मदृष्टि से स्त्रियां आग्नेयी हैं—शोणिताग्नि के कारण। शरीर दृष्टि से वे सौम्य हैं।
ज्ञान के साधन क्या हैं, इसके अर्थ गीता में हैं। श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, क्षमा, अहिंसा, सरलता, श्रद्धा, शुद्धता, स्थिर अन्त:करण, इन्द्रिय निग्रह, आसक्ति का अभाव, दु:ख और दोषों का बार-बार विचार। ममता-आसक्ति का अभाव, प्रिय-अप्रिय में समभाव, ईश्वर भक्ति, वातावरण के प्रति जागरूकता, अध्यात्म ज्ञान में स्थिति, तत्त्व ज्ञान रूप परमेश्वर को देखना ही ज्ञान है। (१३/७-११)
यह सारा ज्ञान युक्त आचरण है जो व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई पड़ता है। अर्थात् आत्मसात किए गए ज्ञान का ही प्रभाव व्यवहार में परिलक्षित होता है। इसमें मन-बुद्धि का योग रहता है। शरीर तो मात्र दर्पण है। मन भाव प्रधान है, संवदेनशील एवं शीतल होता है। बुद्धि स्थितिपरक, कठोर एवं उष्ण होती है। पुरुष भीतर भावप्रधान है तथा स्त्री भीतर उष्ण है। उष्णता मिठास की शत्रु है। किन्तु पुरुष की भीतरी शक्ति भी यही है। अग्नि को सोम नहीं उपलब्ध हो तो शान्त हो जाएगा।
शुक्र ही रेत को लेकर शरीर में प्रवाहित होता है। इसी शुक्र की तीन अवस्थाएं आप:, वायु, सोम हैं। पुरुष शरीर में शुक्र (रेत) का पोषण होता है, स्त्री शरीर में शुक्र (शोणित) पल्लवित होता है। शुक्र व शोणित के शुक्राणु व अण्डाणु के मेल से ही संतति होती है। आज जिस प्रकार का जंक-फूड चल पड़ा है उसमें सौम्यता सिमट गई। सात्विक भाव पूर्ण रूप से विकृत हो गया। स्नेहन-मधुरता का अंश अन्न से सिमट गया। ये दोनों रेत के सौम्यता प्रधान तत्त्व हैं। इनके सिमटने से पुुरुष शुक्र में निर्बलता रहेगी। कन्या सन्तान की संभावना अधिक होगी।
स्त्री शोणित पर तो आज कई ओर से आक्रमण हो रहे हैं। समय पर विवाह नहीं करना भी शोणित की उष्णता को कम करता है। प्रजनन संस्थान को शिथिल करता है। जीव के लिए जिस शरीर का निर्माण करेगी, वह तो निर्बल होगा। प्रजनन क्रम ठहर भी सकता है। यदि इसी अवधि में गर्भनिरोधक गोलियों का प्रयोग हुआ है तो शरीर की रोग-निरोधक क्षमता का ह्रास ही होगा। ऐसे शोणित में आहूत हुआ सोम सन्तान में विकृति का कारण बनेगा। कुछ रसायनों का प्रभाव कारण शरीर तक पहुंच जाता है। कैन्सर की आशंका बढ़ जाती है।
स्त्री को शोणित को पुष्ट रखना है तो पुरुष को शुक्र (रेत) को। इसी से नए पुरुष शरीर में नई सन्तान पैदा करने की शक्ति बनी रहेगी। पेड़ के पोषण में पंचमहाभूतों का संतुलन, ऋतु के अनुचार चर्या (आचरण) एवं पथ्य (आहार) रखना अनिवार्य हो जाता है। स्त्री को गर्भ में संतान का शरीर निर्मित करना है। वही शरीर आगे भी उम्र के साथ बढ़े, यह तत्त्व भी उसमें हों। पचास वर्ष के बाद, उतार पर भी स्वस्थ बना रहे। पिता ही सन्तान रूप में जन्म लेता है। संतति परम्परा से पिता द्वारा प्रदत्त बीज अगली पीढ़ी के निर्माण में लग जाता है। इस प्रकार पिता का सम्बन्ध अक्षर रूप में रहता है जबकि मां तो क्षर शरीर के निर्माण में सहयोग देती है। मृत्युपर्यन्त वह क्षर शरीर रहता ही है। अत: जब तक शरीर है, मां के तत्त्व कार्य करते हैं। स्त्री शरीर में एक अवस्था के बाद प्रजनन क्षमता ठहर जाती है। जबकि पुरुष शरीर में बीज प्रवाहित होता रहता है।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com
Published on:
28 Jul 2024 04:11 pm
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