
school kids in auto
स्कूल से छुट्टी होते ही बच्चों के चेहरे पर तैरती खुशी देखते ही बनती है। दूसरी ओर माताओं के लिए भी यह वक्त सुखद इंतजार का होता है। लेकिन स्कूली वाहनों की कोई एक सुदूर दुर्घटना भी हर माता-पिता को चिंतित व भयग्रस्त कर देती है। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में स्कूल वैन दुर्घटना में एक दर्जन से अधिक बच्चों की मौत हम सब को दुख के सागर में तो ले गई लेकिन हादसों का यह सिलसिला रुकेगा कैसे, इसका भरोसा दिलाने वाला कोई नहीं।
जिस देश में स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने की व्यवस्था के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर सीबीएसई, राज्यों के बोर्ड, सरकारें और जिला प्रशासन तक गाइडलाइन बना चुके हों, उसमें अभिभावक अब फरियाद के लिए किस चौखट पर जाएं? कुछ दिन पहले इंदौर भी ऐसी ही एक स्कूल बस दुर्घटना से लहूलुहान हो चुका है। लेकिन कुछ ही माह बाद फिर अराजकता पसरी है। देश भर में कमोबेश हालात एक जैसे नजर आएंगे। वैन में ठूंस-ठूंसकर भरे बच्चे और खटारा बसें फिर वैसे ही दौड़ रही हैं।
दरअसल, एक नियमबद्ध व्यवस्था लागू कराने का माद्दा न तो प्रशासनिक तंत्र में नजर आता है और न ही जनता सख्ती स्वीकार करने को तैयार है। आफत जब तक हमारे ऊपर, हमारे परिवार पर नहीं टूट पड़ती, हम नहीं चेतते। एक वैन में बीस बच्चे भरकर जाते हैं तो इसलिए क्योंकि सुबह हम ही अपने हाथों से अपने बच्चे को ऐसी वैन में बैठाते हैं। लेकिन मजबूरी यह कि दस किलोमीटर दूर स्कूल भेजने के लिए हमें कोई और रास्ता नहीं सूझता। इस मजबूरी का फायदा पूरी व्यवस्था उठाती है।
वक्त आ गया है जब सबसे नजदीकी स्कूल में प्रवेश की व्यवस्था सभी राज्यों में लागू करने पर विचार हो। हर स्कूल में शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया नए सिरे से परिभाषित हो। उल्लंघन पर सीधे राजसात करने जैसी कार्रवाई हों। स्कूल वाहनों के संचालन के वार्डवार सहकारी मॉडल भी आजमाए जा सकते हैं। हर पोलिंग बूथ इकाई के दायरे में कॉमन स्कूली वाहन भी हो सकते हैं। साथ ही, अब स्कूल शिक्षा को चुनावी मुद्दा बनाएं। बुलेट ट्रेन, सस्ती विमान सेवाओं की बातें करने वाली पार्टियां और सरकारें सबसे पहले बच्चों की शिक्षा व्यवस्था और उसके हर पहलू का मॉडल सामने रखें। इसकी शुरुआत आप अपने पार्षद और विधायक से सवाल पूछकर करें।
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