
anti enchroachment drive
हिमाचल प्रदेश के कसौली में महिला अधिकारी की गोली मारकर हत्या करने के मामले की सुनवाई के दौरान अवैध निर्माणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी देश के हर राज्य के लिए आईना है। बेंच ने कहा कि अवैध निर्माणों को नियमित करने से नियम-कानून का पालन करने वाले नागरिक हतोत्साहित होते हैं। सुप्रीम कोर्ट को इस बात पर भले ही आश्चर्य हुआ हो कि दो मंजिल की अनुमति पर छह मंजिलें तन जाती हैं, और किसी को पता भी नहीं चलता? लेकिन ऐसी अराजकता हर राज्य के हर शहर में सडक़ों पर ही उसको चुनौती दे रही है।
नेताओं और अफसरों की सरपरस्ती में अवैध निर्माण एक संस्थागत स्वरूप ले चुका है। अकेले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ही हर साल सैकड़ों अवैध व्यावसायिक ढांचे, अवैध कॉलोनियां खड़ी हो जाती हैं और सरकारें नाममात्र के शुल्क से उनके नियमन का रास्ता देकर इस धंधे की जड़ें सींचती रहती हैं। हर राजनीतिक दल को अवैध कॉलोनियां नोट और वोट की नर्सरी नजर आती हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ ऐसी कृपा बरसने का सिलसिला तेज हो जाता है और सरकारें इसे जनसेवा बताकर महिमामंडन करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता और नियम-कायदों पर चलने वाले लोगों की भावनाएं चुनावी चंदे और अफसरों की दराजों में नीलाम हो जाती हैं। इन धंधेबाजों के हाथ कानून से कितने लंबे हैं, इसका अंदाज मास्टर प्लान लागू करने में खुद सरकारों की हीलाहवाली से लगाया जा सकता है। राजस्थान में मास्टर प्लान लागू कराने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद राज्य सरकार इसके अमल में रोड़े अटका रही है। क्या यह तथ्य गठजोड़ के हिस्सेदारों की पहचान जाहिर करने के लिए काफी नहीं है?
हिमाचल प्रदेश के रिसॉट्र्स के मामले में सुप्रीम कोर्ट की मंशा के अनुरूप अगर हर राज्य में अवैध ढांचों के निर्माण में रिश्वतखोरी की जांच शुरू हो जाए, तो तमाम बड़े नेता, शीर्ष अफसर और कारोबारी जेलों में नजर आएंगे। इसीलिए यह भी तय है कि कोई सरकार खुद तो ऐसा करेगी नहीं। शीर्ष अदालत को खुद ही संज्ञान लेकर यह पहल करनी होगी, वरना-सब चलता है, का सिलसिला यूं ही जारी रहने वाला है।

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