
suicide
बच्चे अनमोल होते हैं। वे और भी विशिष्ट होते हैं जो समय से पहले ही अपने होने का अहसास खोजने लगते हैं। ऐसे होनहार अतिसंवेदनशील होते हैं जो तुरंत अवसादग्रस्त भी हो जाते हैं। कभी-कभी अवसाद इतना गहरा होता है कि वे जीवन से ही मुंह मोड़ लेते हैं। विद्यार्थियों की आत्महत्याओं ने एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि असीम संभावनाओं के द्वार पर खड़े उन विशिष्ट बच्चों व किशोरों को सहेजकर रखने में हमारा समाज कितना सचेत है। बड़े लोगों की दुनिया बहुत बड़ी हो सकती है पर बच्चों का संसार तो माता-पिता में सिमटा होता है।
बच्चे थोड़े बड़े होते हैं तो परिवार, फिर स्कूल तक उनका संसार फैलता है। यह स्थिति तब तक रहती है जब तक वे स्कूल-कॉलेज से निकल असली दुनिया में कदम नहीं रखते। इसीलिए माता-पिता, परिवार और स्कूल को यह अहसास जरूरी है कि क्या वे अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं? प्रतिदिन बढ़ता तनाव परोक्ष रूप से बच्चों को शिकार बना रहा है। बड़े लोगों को यह अहसास होना जरूरी है कि कैसे उनकी खिन्नता और कुंठा नई पीढ़ी पर असर डाल रही है। इसके विपरीत, प्रशंसा या सांत्वना का एक शब्द बच्चों को सातवें आसमान तक ले जा सकता है।
पहली घटना तमिलनाडु की है जहां एक सुपुत्र ने शराब की लत छुड़ाने में नाकाम रहने पर यह सोचकर देह त्याग दी कि शायद उसके बाद पिता की आदत सुधर जाए। दूसरी घटना झांसी विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहने वाली लडक़ी की है जिसने हीनताबोध में फंदे से झूल जाना उचित समझा। तीसरी घटना राजस्थान की है जहां शिक्षक से परेशान छात्र इसलिए फांसी पर लटक गया कि उसे क्लास रूम में सबके सामने अपमानित होना गवारा नहीं था।
ये घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि विद्यार्थियों को अपने वजूद का अहसास था और स्वयं को विफल या अपमानित होते देखना मंजूर नहीं था। उन्हें यह बताया जाना चाहिए था कि दुनिया इतनी छोटी नहीं है, और भी बड़े-बड़े गम व खुशियां उनका इंतजार कर रही हैं। उतार-चढ़ाव का सामना करना ही जीवन है। रोमांचक यात्रा से पहले ही हताश हो जाना तैयारी में कमी का द्योतक है। परिवार व स्कूल को अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। यह इसलिए भी जरूरी है कि दुनिया में आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में सबसे ज्यादा भारतीय हैं।

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