मध्यप्रदेश की इस घटना की तरह जब अमानवीय बर्ताव का कोई मामला उजागर होता है तो आरोपियों के सियासी रसूख भी सामने आते हैं। लेकिन राजनेता या तो पल्ला झाड़ लेते हैं या फिर आरोपी को बचाने में जुट जाते हैं। ऐसे में अदालतों को तो सख्ती दिखानी ही होगी, सरकारों को भी ऐसी घटनाएं सख्ती से रोकनी होंगी।
आजादी के बाद से आदिवासियों और समाज के दूसरे कमजोर वर्गों पर अत्याचार रोकने के लिए केन्द्र व राज्य सरकारों की ओर से किए गए प्रयासों के बावजूद इन्हें प्रताडि़त करने व भेदभाव की घटनाएं सामने आ रही हैं। जाहिर है कि ये तमाम प्रयास नाकाफी साबित हुए हैं। मध्यप्रदेश के सीधी जिले में आदिवासी युवक पर पेशाब करने की घटना तो मानवता को शर्मसार करने वाली है। वायरल हुए वीडियो में आरोपी की घृणित हरकत साफ दिखती है जो हर किसी को व्यथित करने वाली है।
पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और मध्यप्रदेश सरकार ने भी सख्ती दिखाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज कर आरोपी के मकान का अवैध हिस्सा भी ढहा दिया है। यह कार्रवाई खुद को कानून से ऊपर समझने वालों को सख्त संदेश भी है। लेकिन चिंता वहीं की वहीं है कि आजादी के अमृत महोत्सव के दौर में भी आखिर आदिवासियों और दलितों के साथ ऐसे बर्ताव की घटनाएं क्यों बढ़ने लगी हैं? क्यों आज भी वंचित वर्ग के दूल्हों को घोड़ी पर नहीं चढ़ने देने की घटनाएं सामने आती हैं? शायद ही कोई दिन जाता होगा जिस दिन कमजोर वर्ग के उत्पीडऩ के मामले पुलिस में दर्ज नहीं होते हों। आदिवासियों व दलितों पर अत्याचार की लगातार बढ़ती घटनाएं चिंतित करने वाली हैं। देश में वर्ष 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर अत्याचार रोकने के लिए कानून बनाया गया था। इसमें सख्त कानूनी प्रावधान भी किए गए थे। इसके बावजूद आदिवासियों और दलितों के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि देश के जिन राज्यों में आदिवासियों की संख्या अधिक है, वहां उनके प्रति अत्याचार का प्रतिशत भी अधिक है।दलित ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स नेटवर्क की एक रिपोर्ट के अनुसार 1991 से 2021 तक यानी 30 साल में अनुसूचित जाति समुदायों के खिलाफ अपराधों की संख्या में 177.6 फीसदी वृद्धि हुई है। वहीं इसी अवधि में जनजाति समुदायों के खिलाफ अपराधों में 111.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
कमजोर तबके पर अत्याचारों की घटनाओं पर सख्त से सख्त कदम उठाने की जरूरत है। चिंताजनक यह है कि मध्यप्रदेश की इस घटना की तरह जब अमानवीय बर्ताव का कोई मामला उजागर होता है तो आरोपियों के सियासी रसूख भी सामने आते हैं। लेकिन राजनेता या तो पल्ला झाड़ लेते हैं या फिर आरोपी को बचाने में जुट जाते हैं। ऐसे में अदालतों को तो सख्ती दिखानी ही होगी, सरकारों को भी ऐसी घटनाएं सख्ती से रोकनी होंगी।