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उत्तर कोरिया विध्वंसक हथियारों के परीक्षण कर रहा है और चीन का उसे मौन समर्थन है

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Sunil Sharma

Sep 12, 2017

PM Modi, Shinzo Abe

PM Modi-Shinzo

- मनिष सि. दाभाडे
कूटनीतिक मामलों के जानकार, जेएनयू, नई दिल्ली में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में अध्यापन, संयुक्त राष्ट्र मामलों के जानकार

समूचा एशिया उबल रहा है। उत्तर कोरिया विध्वंसक हथियारों के परीक्षण कर रहा है और चीन का उसे मौन समर्थन है। आशंका है कि वह पाकिस्तान से ऐसी घातक तकनीक साझा भी कर रहा है। इन हालात ने भारत व जापान की ङ्क्षचताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा से...

जापान और भारत पूर्व में भी निकट सहयोगी थे। लेकिन, उस समय जापान और भारत सिर्फ एक-दूसरे के समर्थन में बयान देने तक ही सीमित रहे। वर्तमान में दोनों देश एक-दूसरे के सक्रिय सहयोगी बन चुके हैं। पिछले दिनों हुए डोकलाम विवाद में जापान खुलकर भारत के समर्थन में आ गया था।

इसी सप्ताह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत की यात्रा पर आने वाले हैं। जापान के प्रधानमंत्री की यह यात्रा न सिर्फ भारत और जापान के लिए बल्कि समूचे एशिया क्षेत्र के लिए भी काफी महत्व रखती है। गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी और शिंजो आबे में निजी स्तर पर भी घनिष्ठ सम्बंध हैं। पूर्व में जब शिंजो आबे ने भारत का दौरा किया था तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आग्रह पर उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी की यात्रा भी की थी। आगामी भारत दौरे में भी शिंजो आबे प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात जाने वाले हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष २०१४ में नरेन्द्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री का पदभार संभाला तो बड़े देशों की यात्रा के लिए सबसे पहले उन्होंने जापान को ही चुना था।

विश्व में दोनों ही देश लोकतंत्र के अगुआ होने के नाते अपने आपको सांस्कृतिक और वैचारिक धरातल पर काफी निकट पाते हैं। यह भी देखना होगा कि बढ़ती ताकत, आक्रामक तेवर और अपनी विस्तारवादी नीतियों के चलते चीन, भारत और जापान के लिए समान रूप से चिंता का विषय बनता जा रहा है। चीन की बढ़ती महत्वाकाक्षांओं के बीच भारत और जापान को अपने हितों की रक्षा के लिए सामरिक और आर्थिक मोर्चों पर परस्पर सहयोग की आवश्यकता होगी। विश्व में चीन ही एकमात्र ऐसा देश है जो न तो किसी सीमा संधि को मानता है और न ही कभी अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करता है। जापान और पड़ोसी देशों की आपत्तियों के बावजूद तथा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले को दरकिनार करते हुए चीन, दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा जताता रहा है।

दक्षिण चीन सागर पर अवैध कब्जा बनाए रखने के उद्देश्य से चीन वहां निर्माण कार्य जारी रखे हुए है। वहीं दूसरी ओर भारत के साथ भी आए दिन सीमा पर तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर क्षेत्र की शांति और स्थिरता को खतरे में डालता रहता है। पिछले दिनों हुए डोकलाम विवाद से एक बार फिर यह साबित हो गया कि चीन अपने पड़ोसी देशों के साथ जब-तब सीमा सम्बंधी विवाद उत्पन्न कर उन पर दबाव व धौंस की नीति अपनाकर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। इस बात को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि उत्तर कोरिया की बढ़ती सामरिक ताकत ने सिर्फ जापान और दक्षिण कोरिया ही नहीं वरन समूचे एशिया और यहां तक कि अमरीका की सुरक्षा को भी खतरे में डाल दिया है। जापान का निकटवर्ती उत्तर कोरिया आए दिन घातक हथियारों का परीक्षण करता रहता है। यह जापान की अस्मिता और सुरक्षा के लिए चिंता का कारण बन गया है। पिछले दिनों हुए एक परीक्षण में तो मिसाइल सीधे जापान के ऊपर से निकली। इस घटना ने पूरे जापान की जनता को भयाक्रान्त कर दिया।

भारत को आशंका है कि उत्तर कोरिया इन भयानक हथियारों की तकनीक पाकिस्तान के साथ साझा कर रहा है। पूर्व में भी पाकिस्तान पर चोरी-छिपे उत्तर कोरिया को परमाणु बम तकनीक के हस्तांतरण के आरोप लगते रहे हैं। क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ते खतरों को देखते हुए और शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए जहां भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘एक्ट ईस्ट’ नीति को अपनाया है। वहीं, जापान ने दक्षिण चीन सागर में चीन के अनाधिकृत अधिकार जताने जैसी विस्तारवादी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए ‘फ्री एंड ओपन इंडो पैसेफिक’ नीति को अपनाया। जापान का उद्देश्य इस नीति द्वारा एशिया क्षेत्र में चीन की एकाधिकारी प्रवृत्ति पर लगाम लगाना है। उदाहरण स्वरूप जापान चाहता है कि दक्षिण चीन सागर में किसी देश का एकाधिकार न होकर, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन हो और सभी देशों को मुक्त आवागमन का अधिकार मिले। चीन की वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) परियोजना भी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

ओबीओआर द्वारा चीन, पड़ोसी देशों को जोडक़र सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। भारत ने ओबीओआर परियोजना का हमेशा विरोध किया है। भारत ने भी आर्थिक लाभ से वंचित रहे देशों को आगे लाने के लिए एशिया से अफ्रीका को जोडऩे वाले ‘एशिया-अफ्रीका गु्रप कॉरिडोर’ परियोजना का प्रस्ताव रखा है। एशिया-अफ्रीका ग्रुप कॉरिडोर को ओबीओआर के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जापान और भारत पूर्व में भी निकट सहयोगी थे। लेकिन, उस समय जापान और भारत का सहयोग सिर्फ एक-दूसरे के समर्थन में बयान देने तक ही सीमित रहा। वर्तमान में दोनों देश एक-दूसरे के सक्रिय और सहयोगी बन चुके हैं।

पिछले दिनों हुए डोकलाम विवाद में जापान खुलकर भारत के समर्थन में आ गया था। ऐसा पहली बार देखने को मिला है। सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन समझौता भी इस वर्ष जुलाई से कार्यान्वित हो गया है। साथ ही दोनों देशों के मध्य मेरिटाइम सिक्योरिटी पैक्ट होने की उम्मीद है। यूं तो भारत और जापान की नौसेनाएं काफी लम्बे समय से संयुक्ताभ्यास करती रही हैं। लेकिन, नौसना का और अधिक आधुनिकीकरण करने व आपसी सहयोग बनाने के लिए यह समझौता महत्वपूर्ण होगा। वहीं अहमदाबाद और मुम्बई के बीच चलने वाली बुलेट ट्रेन योजना की भी आधारशिला रखी जाएगी। उम्मीद है कि जापान के प्रधानमंत्री की इस यात्रा से समूचे एशिया की आर्थिक समृद्धि और स्थिरता मजबूत होगी।