
indian farmer
- योगेन्द्र यादव, टिप्पणीकार
बापू आपके जमाने में कहते थे, किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है। आज भी स्थिति वही है - बस कर्ज की राशि बढ़ गई है और साहूकार की जगह बैंक ने ले ली है। आपके जमाने में लगान और कर्ज से सताए गुलाम विद्रोह कर देते थे। आज का गुलाम किसान आत्महत्या कर रहा है।
बापू, आपको ये चिठ्ठी मैं आपके ही आश्रम से लिख रहा हूं। सौ साल पहले चंपारण सत्याग्रह के केंद्र के रूप में आपने भीतरवाह में यह आश्रम बनाया था। सुना है पिछले साल आपके जन्मदिन पर यहां बहुत सरकारी तामझाम था। इस बार आपके जन्मदिन पर सरकार नदारद रही। आश्रम में रस्मी प्रार्थना जरूर चल रही थी लेकिन वहां का माहौल कुछ थका और बुझा हुआ सा था। सत्याग्रह की आत्मा आश्रम की चारदीवारी के बाहर जिंदा थी। वहां लोक संघर्ष समिति के हजारों पट्टाधारी भूमिहीनों को उनकी जमीन का कब्जा दिलाने के लिए अहिंसक संघर्ष कर रही है।
मुझे लगा कि अगर आप होते तो किसी औपचारिक समारोह में शामिल होने के बजाय भूमिहीनों के इस संघर्ष में जरूर शरीक होते। वहीं बाहर ही देश भर के किसान आंदोलनों का शामियाना भी लगा था। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले हम लोग भी वहां किसान मुक्ति यात्रा का आगाज कर रहे थे। चंपारण सत्याग्रह के दौरान भारत के किसान की दशा पर कही आपकी बात को याद कर रहे थे। आपने कहा था नील की खेती करने वाला किसान बंधुआ है। आपकी नजर में उस किसान की अवस्था भारत के किसान की गुलामी का दर्पण थी।
वहां बैठे-बैठे मैं सोचने लगा कि क्या चम्पारण का किसान आज भी बंधुआ नहीं है? क्या भारत का किसान आज भी गुलाम नहीं है? चंपारण का किसान कहता, ‘निलहे गए मिलहे आये’ यानी कि नील के जमींदार तो चले गए लेकिन उनकी जगह चीनी के मिल की जमींदारी ने ले ली। आज भी चम्पारण में बड़ी जोत एकड में नहीं किलोमीटर में नापी जाती है। पुराने राजे-रजवाड़े और कंपनियों के पास कई किलोमीटर जमीनें हैं। आज भी जमीन जोतने वाले लाखों परिवार जमीन की मिल्कियत से वंचित हैं। गन्ना उगाने वाला किसान चीनी मिल से बंधा हुआ है, उसे इतना दाम भी नहीं मिलता जो कि पड़ोस के उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में गन्ना उत्पादकों को मिलता है।
किसान अब भी बंधुआ ही है- नील की जगह चीनी, जमीदार की जगह मिल और अंग्रेज़ों की जगह चुनी हुई सरकार ने ले ली है। बापू, ये सिर्फ चंपारण नहीं पूरे देश के किसान की कहानी है। भारत का किसान आज भी गुलाम है। वो गुलाम है ऐसी अर्थव्यवस्था का जिसे न वो समझता है और जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। वो गुलाम है ऐसी व्यवस्था का जिसमें उसके फसल के दाम तो बढ़ते नहीं लेकिन लागत और घर खर्च बेतहाशा बढ़ते जा रहे हैं। किसानी घाटे का धंधा बन गई है। किसान गुलाम है बैंक और साहूकार का, जिसके कर्ज में वो डूबा है।
आपके जमाने में कहते थे कि किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है। आज भी वही स्थिति बदली नहीं है - बस, कर्ज की राशि बढ़ गई है और साहूकार की जगह बैंक ने ले ली है । आपके जमाने में लगान और कर्ज से सताए गुलाम विद्रोह कर देते थे। आज का गुलाम किसान आत्महत्या कर रहा है। आज का किसान गुलाम है आधुनिक खेती का, पिछले 70 साल में उसे पाठ पढ़ा दिया गया है कि उसे अपने पुरखों की खेती छोड़ कर नई फसल, संकर बीज, रासायनिक खाद, जहरीले कीटनाशक और पम्प से निकला पानी लगाना होगा।
शुरू के सालों में कुछ कमाई का लालच किसान को इस नई खेती में खींच लेता है। फिर न उसका बीज, न उसका ज्ञान, न उसकी खाद और न उसकी फसल। कुछ साल में आमदनी घट जाती है, कुएं सूख जाते हैं, नई लाइलाज बीमारियां लग जाती हैं लेकिन ये गुलामी नहीं छूटती। इस मायने में तो आजादी के बाद किसान और ज्यादा गुलाम हो गया है। किसान गुलाम है अपनी ही चुनी हुई सरकारों का। कहने को देश में लोकतंत्र है, लोकतंत्र में बहुमत की सरकार है और किसान बहुमत में है। लेकिन, इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसान की हैसियत एक नौकर से ज्यादा नहीं है। पटवारी के सामने हाथ जोड़ता, तहसील में जूतियां घिसता, बैंक के दरवाजे से दुत्कारा जाता ये किसान आज भी नागरिक नहीं प्रजा है।
हर सरकार के पास कंपनियों के लिए मलाई है और किसान के लिए खुरचन, उद्योग के लिए पैसा है किसान के लिए डायलॉग। अपने आप को किसान की संतान घोषित करने वाले मंत्री अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सौदों में किसान का हित बेच कर चले आते हैं, कोई पूछने वाला भी नहीं है। कहने को तीन सौ से अधिक सांसद अपने को किसान की संतान बताते हैं लेकिन किसान इस व्यस्था में हर कानून और नीति में सबसे अंत में आता है। बापू, किसान को इसी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए आपने चम्पारण सत्याग्रह किया था।
आज किसान को इस नई गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए कैसा सत्याग्रह करें? भीतरवाह आश्रम में चंपारण सत्याग्रह की झांकी देखते हुए इतना तो स्पष्ट हुआ कि यह सत्याग्रह किसी बनी-बनाई लीक पर नहीं चल सकता। इस सत्याग्रह का रास्ता सतत संघर्ष और नूतन प्रयोग से तय होगा। पिछले तीन महीनों में देश के तेरह राज्यों में किसान मुक्ति यात्रा में किसानों के साथ घूम कर इतना तो समझ आया है कि किसान एक बार फिर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करने को तैयार है। उम्मीद है कि आपका आशीर्वाद उन्हें जरूर मिलेगा।
- आपका योगेंद्र

Published on:
10 Oct 2017 04:35 pm
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