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भारतीय भाषाएं हों सार्थक लोकभाषा की भूमिका में

हिंदी दिवस (14 सितंबर) विशेष

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Nitin Kumar

Sep 15, 2023

भारतीय भाषाएं हों सार्थक लोकभाषा की भूमिका में

भारतीय भाषाएं हों सार्थक लोकभाषा की भूमिका में

गिरीश्वर मिश्र
पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
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निश्चय ही मनुष्यों के लिए भाषा कृत्रिम होते हुए भी एक ऐसा अनमोल उपहार है जिसके द्वारा जीवन की गतिविधि और व्यवस्था संयोजित होती है। भाषा की सहायता से हम अतीत और भविष्य दोनों से जुड़ जाते हैं और तमाम समस्याओं का हल ढूंढा जाता है। इसीलिए भाषा का सीखना जीवन के आधारभूत कौशल में शामिल है। कोई भी काम चाहे तात्कालिक हो या दीर्घकालिक, प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, भाषा की मदद के बिना करने के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता। भाषा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहती है। आज हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के उपयोग की प्रासंगिकता और उसकी चुनौतियों को अंग्रेजी और पाश्चात्य सांस्कृतिक प्रभाव के संदर्भ में जांचना जरूरी है।

उक्त संदर्भ में भाषा के प्रयोक्ता समाज की बदलती संरचना पर भी गौर करना जरूरी होगा। आज भारतीय समाज युवतर हो रहा है। वैश्वीकरण के दौर में नई पीढ़ी की आकांक्षाएं हिलोरें ले रही हैं। इसी बीच सूचना और संचार क्रांति के चलते मीडिया ने भी बड़े जोर-शोर से दस्तक दी है और साथ ही अनुभव की दुनिया का ताना-बाना भी नए ढंग से बुना जा रहा है। संदेश और सार तत्व की जगह विज्ञापन और प्रचार पर जोर के चलते मानक भाषा से तुलना करें तो भाषा प्रयोग में कई कमियां आने लगी हैं। ऐसे में यदि संवेदनशील प्रयोक्ताओं में भाषाई अस्मिता को खोने का डर उभर रहा हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। यहां भारत के भाषाई परिदृश्य पर भी गौर करना जरूरी होगा। हालांकि भाषा-प्रयोग जीवन के सभी क्षेत्रों में किए जाते हैं पर भारत की सभी भाषाओं को, जिनकी संख्या करीब हजार-बारह सौ से ऊपर है, छोड़ भी दें तो भी, आठवीं अनुसूची की सभी 22 भाषाओं को समान अवसर नहीं मिल पा रहा है।

भारतीय भाषाओं को किनारे कर अंग्रेजी के उपयोग के अवसर में जो आरक्षण की व्यवस्था अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के लिए की थी वह बहुत हद तक आज भी लागू है। अंग्रेजी-प्रयोग को सुरक्षित किया गया और आज भी अंग्रेजी में भारत की धरोहर संभालने का उपहास जारी है। भारतीय अवधारणाओं के कठिन व्याख्यात्मक अनुवाद किए जाते हैं क्योंकि अंग्रेजी में कोई पर्याय नहीं मिलता। ज्ञान-विज्ञान, सरकारी कामकाज, नागरिक जीवन से जुड़े क्षेत्र ( जैसे- न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य) में हमारी भाषा नीति इस अर्थ में जनविरोधी ही रही है कि वह अंग्रेजी सुविधाभोगियों के सुख और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए काम करती रही। हम अपनी संस्कृति, समाज के राग-विराग, उसके आध्यात्मिक और सामाजिक चिंतन और देश की स्मृति को खोते रहे इस भ्रम में कि अंग्रेजी के बल पर विश्व नागरिकता मिलेगी। वैश्विकता के मानसिक भ्रम और आग्रह ने भारतीय भाषाओं की उपेक्षा को बल दिया।

हमारा संकल्प तो यह होना चाहिए कि हिंदी या किसी अन्य भारतीय भाषा को अंग्रेजी नहीं बनना है। उसे भेदकारी नहीं बल्कि संयोजन की, प्यार की और सौहार्द की भाषा बनना है और सार्थक लोकभाषा की भूमिका निभानी है।