
-डॉ. सुभाष कुमार प्रोफेसर, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय वडोदरा
खेल को अक्सर 'राजनीति से परे' होना चाहिए, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब भी देशों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ता है, उसका असर खेलों पर भी पड़ता है। हाल में बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) से रिलीज करने का बीसीसीआइ का निर्णय इसी जटिल रिश्ते का उदाहरण है। आइपीएल 2026 की नीलामी में कोलकाता नाइट राइडर्स ने बांग्लादेशी तेज गेंदबाज मुस्तफिज़ुर रहमान को खरीदा, किंतु बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हालिया हमलों और भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव को देखते हुए बीसीसीआइ ने फ्रेंचाइजी को निर्देश दिया कि वे उन्हें टीम से रिलीज करें।
इस पर बांग्लादेश की सरकार ने अपनी टीम के टी20 वल्र्ड कप के लिए भारत न आने के फैसले और बांग्लादेश में आइपीएल के प्रसारण पर रोक लगाने की धमकी दे दी। मुस्तफिज़ुर रहमान के आइपीएल अनुबंध रद्द करने के निर्णय को खेल में राजनीतिक हस्तक्षेप बताकर इसकी आलोचना करने से पहले उन प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरणों को देखना समीचीन है जब खेलों में राजनीतिक हस्तक्षेप को अनिवार्य समझा गया था। जो लोग खेल को राजनीति से अलग करने की बात करते हैं वे भूल जाते हैं कि चाहे 1971 का अमरीका और चीन के बीच 'पिंग-पोंग डिप्लोमेसी' हो (जिसके अंतर्गत टेबल टेनिस मैचों ने दोनों देशों के संबंध सुधारने में अहम भूमिका निभाई) या भारत में, विशेष रूप से दक्षिण एशिया में क्रिकेट की लोकप्रियता को देखते हुए दो देशों के बीच के संबंध को बेहतर करने के लिए 'क्रिकेट डिप्लोमेसी' की बात होती रही है। राजनीतिक हस्तक्षेप हमेशा नकारात्मक नहीं होता बल्कि कभी-कभी यह शांति और सहयोग का मार्ग भी खोलता है, लेकिन इतना तो तय है कि खेलों में राजनीतिक हस्तक्षेप होता रहा है।
खेल समाज से अलग नहीं है, जब समाज प्रभावित होता है, तो खेल भी प्रभावित होता है। मुस्तफिजुर के आइपीएल फ्रेंचाइजी को रद्द करने के कई मायने हैं और यह केवल एक खेल संबंधी निर्णय नहीं था, बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से यह एक बहुआयामी निर्णय था। रहमान को रिलीज करके भारत ने यह संदेश भी दिया है कि वह मानवाधिकार उल्लंघन व धार्मिक हिंसा को नजरअंदाज नहीं करेगा। रहमान मामले ने यह दिखाया कि खेल व राजनीति को पूरी तरह अलग रखना सरल नहीं है। बीसीसीआइ का निर्णय इस बात का प्रमाण है कि जब समाज और राष्ट्रहित दांव पर हों, तो खेल में राजनीतिक हस्तक्षेप न केवल उचित बल्कि आवश्यक भी हो जाता है। खेल भावना के सम्मान की प्रक्रिया में सम्पूर्ण राष्ट्र की भावनाओं और सम्मान के साथ खेल नहीं होना चाहिए।
ओलंपिक बहिष्कार
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फुटबॉल और विश्व राजनीति
इन घटनाओं ने दिखाया कि ओलंपिक जैसे वैश्विक खेल का आयोजन भी राजनीतिक मुद्दों से अछूते नहीं हैं।
Published on:
09 Jan 2026 01:44 pm
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