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संसाधनों पर कब्जा, रणनीति और सत्ता की राजनीति

वेनेजुएला का 'आर्को मिनेरो डेल ओरिनोको' क्षेत्र चांदी, सोना व दुर्लभ धातुओं से समृद्ध बताया जाता है। इनका रणनीतिक महत्व तेल से कम नहीं है। इन पर नियंत्रण यूएस को यूरोपीय संघ व अन्य देशों पर भू-राजनीतिक बढ़त दिला सकता है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 09, 2026

-वाप्पला बालचंद्रन, लेखक कैबिनेट सचिवालय में विशेष सचिव रहे हैं (द बिलियन प्रेस)

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण का आदेश देने और संसाधन-संपन्न इस लैटिन अमरीकी देश पर हमले के पीछे डॉनल्ड ट्रंप की मंशा को समझाने के लिए कई सिद्धांत सामने आए हैं। क्या यह तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की एक छिपी कोशिश है या फिर पश्चिमी गोलार्ध में अमरीका द्वारा अतीत में अपनाए गए सिद्धांत-आधारित हस्तक्षेपवाद यानी 1823 के मुनरो सिद्धांत की ओर वापसी का प्रयास? पहला सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि मादुरो के सत्ता से हटने के बाद अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों को प्रवेश देकर वेनेजुएला के विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण स्थापित किया जाए। तेल से भी गहरा कारण चांदी और अन्य रणनीतिक धातुओं से जुड़ा माना जा रहा है।

वेनेजुएला का 'आर्को मिनेरो डेल ओरिनोको' क्षेत्र, (जहां एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक के अप्रयुक्त संसाधन होने का अनुमान है) चांदी, सोना और दुर्लभ धातुओं से समृद्ध बताया जाता है। ये धातुएं अमरीकी सैन्य प्रणालियों, रक्षा आपूर्ति शृंखलाओं व उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक कमी के दौर में इनका रणनीतिक महत्व तेल से कम नहीं है। इन पर नियंत्रण अमरीका को यूरोपीय संघ व अन्य देशों पर भू-राजनीतिक बढ़त दिला सकता है। दूसरा कारण अमरीका की वह पारंपरिक दलील है, जिसे वह 'लोकतंत्र की बहाली' कहता है। इस बार संदर्भ वेनेजुएला के 2024 के कथित 'धांधली भरे' चुनाव हैं, जिनमें विपक्षी उम्मीदवार एडमुनदो गोंजालेज उरुतिया- जो पूर्व-चुनावी सर्वेक्षणों में आगे थे, को 44.2 प्रतिशत वोट मिले, जबकि मादुरो को 51.2 प्रतिशत वोट मिलने की पुष्टि की गई। यह स्थिति दिसंबर 1989 के माल्टा शिखर सम्मेलन की याद दिलाती है, जब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव से पनामा के मैनुअल नोरेगा का जिक्र करते हुए कहा था कि अमरीका उनके खिलाफ 'मजबूत अभियोग' तैयार कर रहा है और पनामा में 'लोकतंत्र' लाने जा रहा है। स्पेन के दैनिक 'एल पाइस' के अनुसार तीसरा कारण ट्रंप की नई सुरक्षा नीति है, जिसमें लैटिन अमरीका को अमरीका की कई गंभीर समस्याओं जैसे अवैध प्रवासन, नशीले पदार्थों का निर्यात, अंतरराष्ट्रीय अपराध और बढ़ते चीनी निवेश का स्रोत माना गया है।

ट्रंप इसे सद्भावना और दबाव, दोनों के माध्यम से हल करना चाहते हैं। ट्रंप की इस दोहरी रणनीति में अल सल्वाडोर, अर्जेंटीना, इक्वाडोर और बोलीविया की दक्षिणपंथी सरकारों को पुरस्कृत करना, होंडुरास में दक्षिणपंथी उम्मीदवार नासरी असफुरा का समर्थन और नशीले पदार्थों की तस्करी में दोषी ठहराए गए पूर्व राष्ट्रपति जुआन ऑरलैंडो हर्नांडेज को माफी देना शामिल है। इन देशों को बिना सार्वजनिक निविदा के अमरीकी कंपनियों को ठेके दिए जाएंगे। मित्र देशों पर चीनी कंपनियों को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से बाहर करने का दबाव होगा, जबकि वेनेजुएला, कोलंबिया और चिली जैसे 'अडिय़ल' देशों को सैन्य बल की 'लक्षित तैनाती' से नरम करने की योजना है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार, चौथा कारण अमरीका के भीतर के महंगाई संकट और एपस्टीन फाइलों जैसे मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाना है। 'टाइम' पत्रिका के अनुसार, इस घटनाक्रम ने वहन-क्षमता के संकट, स्वास्थ्य बीमा से वंचित होते लाखों लोगों और एपस्टीन फाइलों से ध्यान हटाकर वेनेजुएला पर केंद्रित कर दिया।

'एशिया टाइम्स' ने दो जनवरी 2026 को इसमें यह जोड़ा कि वित्त वर्ष 2025 के अंत तक अमरीकी कर्ज जीडीपी के 100 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। 2020 में जहां ब्याज भुगतान 345 अरब डॉलर था, वह अब बढ़कर लगभग 970 अरब डॉलर हो चुका है। हालांकि, इन कारणों में से कुछ जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। अमरीकी आर्थिक और तकनीकी प्रकाशनों के अनुसार, अमरीकी तेल उद्योग को वेनेजुएला की पुरानी ड्रिलिंग और रिफाइनिंग प्रणालियों में निवेश कर वहां के चिपचिपे 'हेवी ऑयल' का दोहन करने में खास रुचि नहीं है, क्योंकि इसे निकालना और ढोना कठिन है। 'एल पाइस' ने चिली के पूर्व मंत्री और राजदूत जॉर्ज हाइन के हवाले से लिखा कि ट्रंप दक्षिण अमरीका को 'वफादार राज्य' की तरह देखना चाहते हैं। हाइन के अनुसार, अमरीकी कंपनियां वहां बड़े प्रोजेक्ट्स को लाभकारी नहीं मानतीं और लैटिन अमरीका में चीन की मौजूदगी अब अपरिवर्तनीय है। उन्होंने कहा कि आधुनिक 'डोनरो सिद्धांत' के तहत बल प्रयोग की धमकियों से दक्षिण अमरीकी देश डरने वाले नहीं हैं। अब तक अमरीका की ओर से वेनेजुएला पर सीधा कब्जा न करने के पीछे इराक का कड़वा अनुभव भी एक कारण है।

वर्तमान स्थिति में मादुरो का अपहरण अमरीकी कानून-व्यवस्था की कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो 1989 में तत्कालीन सहायक अटॉर्नी जनरल बिल बार की कानूनी राय पर आधारित है। पनामा पर आक्रमण और 20 दिसंबर 1989 को पनामा के वास्तविक तानाशाह मैनुअल नोरेगा के अपहरण से छह महीने पहले जारी की गई इस राय में कहा गया था कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर अमरीकी एजेंसियों को घरेलू कानून लागू करने के लिए विदेशों में 'बलपूर्वक अपहरण' से नहीं रोकता। नोरेगा का मुद्दा दिसंबर 1989 के माल्टा शिखर सम्मेलन में भी उठा था, जो सोवियत क्रूज जहाज 'मैक्सिम गोर्की' पर आयोजित हुआ। इस पर गोर्बाचेव की तीखी टिप्पणी थी- 'क्या स्वतंत्र देशों में अमरीकी कार्रवाई पर कोई रोक नहीं है? संयुक्त राज्य अमरीका खुद फैसला करता है और उसी फैसले को लागू भी करता है।' यह टिप्पणी खुद राष्ट्रपति बुश ने अपनी पुस्तक 'ए वल्र्ड ट्रांसफॉम्र्ड' (1998) में दर्ज की है। इसी सम्मेलन में शीत युद्ध के अंत की घोषणा भी हुई थी।