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रोना तो इसी बात का है कि हमारे मंत्री अक्सर आम आदमी की तकलीफ को समझने के बावजूद उसे दूर करने के लिए कुछ करते नहीं। करते होते तो रेल मंत्रालय को अपने अफसरों के लिए निर्देश जारी करने की नौबत नहीं आती। मंत्रालय ने ताजा निर्देशों में अफसरों से जनता यानी यात्रियों की तकलीफ समझने को कहा है। कहा ये भी गया है कि अफसर सरकारी काम के लिए आरामदायक सैलून की जगह स्लीपर या थर्ड एसी में सफर करें।
रेल विभाग में अभी नए मंत्री आए हैं। अफसरों की बैठकें ले रहे हैं और निर्देश भी जारी कर रहे हैं। ठीक उसी तरह जैसे पूर्व रेल मंत्री किया करते थे। मुम्बई के एक रेलवे स्टेशन पर पुल हादसे से हाहाकार मचा तो रेलवे को आम आदमी की याद आ गई। रेल यात्रियों की तकलीफों को कौन नहीं जानता? मंत्री भी जानते हैं और अफसरों को भी सब पता है। नए मंत्री आते हैं तो दिखावा तो करना ही पड़ता है। सो रेल मंत्री पीयूष गोयल को भी ये सब करना पड़ रहा है। खाने की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर रेलयात्री सालों से अपना दुखड़ा सुनाते आ रहे हैं। रामविलास पासवान , नीतीश कुमार , लालू प्रसाद यादव , राम नाइक से लेकर ममता बनर्जी , पवन कुमार बंसल और सुरेश प्रभु ने भी ऐसे दुखड़े सुने हैं। रेल में सुविधाएं बढ़ाने के आश्वासन भी कम नहीं दिए। लेकिन हकीकत यही है कि न सुविधाएं ही बढ़ीं और न दुर्घटनाएं ही कम हुईं।
रेल मंत्री स्वयं शायद ही कभी रेल में सफर करते हों। जब मंत्री नहीं करेंगे तो अधिकारी भला पीछे रहने वाले कहां? छोटे अफसरों को सैलून से ही काम चलाना पड़ता है। फिर यात्रियों की तकलीफ समझे कौन? भारतीय रेल दुनिया में सबसे अधिक यात्रियों को यात्रा कराने वाली चंद रेल सेवाओं में शुमार है। लेकिन यह कभी बदहाली से ऊपर उठ ही नहीं पाती। हालत ये हो चली है कि सत्तारूढ़ दल के नेता रेल मंत्रालय लेने से ही कतराने लगे हैं। ये हालत ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि निर्देश जारी करने की खानापूर्ति से ऊपर उठकर ठोस कार्रवाई की जाए। देश में बुलेट ट्रेन चले लेकिन करोड़ों दूसरे रेल यात्रियों का भी ध्यान रखा जाए। उनके खानपान का भी, सुरक्षित सफर का भी और सुविधाओं का भी।

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