
industrial growth of india
- सुधीर मेहता, उद्यमी
अतीत में कुछ चुनिंदा एवं कृपापात्र लोगों को ऋण देने से उत्पन्न विपत्तियों ने बड़ी संख्या में मौजूद लघु एवं मध्यम आकार के उद्यमों के लिए ऋण के प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया है। इस प्रकार के अधिकांश उद्यम, ब्याज की उच्च लागत तथा बैंकों की कष्टप्रद शर्तों के कारण विस्तार करने में असमर्थ हैं।
पिछले कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था के पुनरोत्थान के संदर्भ में विभिन्न स्तर पर परिचर्चाओं का दौर जारी है, जो स्वागत योग्य है। दुर्भाग्यवश इस प्रकार की अधिकांश परिचर्चाएं राजनीतिक दलों की आपसी तकरार तक सिमट कर रह जाती हैं। इन परिचर्चाओं में दल अपने राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि विकास की दिशा में सुधारात्मक परिवर्तन सम्बंधी किसी भी सुझाव को सत्तारूढ़ दल के विरुद्ध माना जाता है, जबकि वर्तमान में जारी महत्वाकांक्षी आर्थिक सुधारों की सराहना को चापलूसी का दर्जा दे दिया जाता है। हालांकि, भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति से हो रहे वैश्विक विकास के साथ-साथ निजी क्षेत्र में मंद गति से निवेश की विषम परिस्थितियों का लगातार सामना कर रही है।
पिछले वित्त वर्ष के दौरान निजी निवेश में ५.८ प्रतिशत की मामूली वृद्धि देखी गई। इस विषम परिस्थिति के कई समाधान हैं, परंतु बुनियादी लक्षणों के अलावा इसके निदान एवं उपचार पर ध्यान केंद्रित करने से ही स्थायी समाधान संभव हो सकता है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) का लागू किया जाना अगली पीढ़ी के सुधारों के लिए मंच प्रदान करता है। उच्च ब्याज दरों का कुचक्र तथा क्षमता निर्माण के लिए ऋण उपलब्ध कराने के प्रति बैंकों की अनिच्छा के चलते निजी क्षेत्र का विकास प्रभावित हो रहा है
भारत में लघु एवं मध्यम आकार के उद्यम, अर्थव्यवस्था के विकास को तो गति देते ही है, साथ ही रोजगार का सृजन भी करते हैं। भारत में बैंकिंग क्षेत्र की समस्याएं सर्वविदित हैं। अतीत में कुछ चुनिंदा एवं कृपापात्र लोगों को निरंतर बड़े-बड़े ऋण देने से उत्पन्न विपत्तियों ने बड़ी संख्या में मौजूद लघु एवं मध्यम आकार के उद्यमों के लिए ऋण के प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया है। इस प्रकार के अधिकतर उद्यम, जो अपने कार्यों का कुशलतापूर्वक और निष्ठापूर्वक संचालन करते हैं, ब्याज की उच्च लागत तथा बैंकों की कष्टप्रद शर्तों के कारण विस्तार करने में असमर्थ या अनिच्छुक हैं। अधिकतर व्यावसायिक मामलों में निवेश के लिए ऋणों के प्रचलित १४ से १८ प्रतिशत ब्याज दर को तर्कसंगत नहीं माना जा सकता। किसी भी विनिर्माण इकाई के पांच प्रमुख बुनियादी लागतों में कच्चा माल, मजदूरी, ब्याज, रसद और मूल्यह्रास शामिल हैं।
भारत में उच्च ब्याज दरों, रसद और अनुपालन लागत के कारण किसी भी प्रकार के उद्यम को हानि होने की आशंका अधिक रहती है। आदर्श रूप में इसे दो अंकों के जुर्माने की तरह देखा जाता है, जो अपेक्षाकृत कम श्रम लागत की तुलना में काफी अधिक है। बैंकिंग व्यवस्था की पूरी सर्जरी के साथ-साथ ब्याज दर प्रणाली के पुनर्निर्माण के माध्यम से इस समस्या को दूर किया जा सकता है। पिछले पांच वर्षोंे में भारत में मुद्रास्फीति में ७०० आधार अंकों की कमी आई है लेकिन आरबीआई ने नीति दरों में केवल २०० आधार अंकों की ही कटौती की। वास्तविक ब्याज दरों को वैशिवक स्तरों के समरूप बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा न्यूनतम २०० आधार अंकों की कटौती की और आवश्यकता है। इसके साथ ही बैंकों में मौजूदा अशोध्य ऋणों को स्पष्टतौर पर चिह्नित एवं अलग किया जाना चाहिए।
ऐसा करने के लिए बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सुधारों की आवश्यकता होगी। पुनर्पूंजीकरण और परिचालन स्वायत्तता के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पूर्ण या आंशिक निजीकरण अनिवार्य है। विनिर्माण क्षेत्र के लिए जोखिम आधारित ऋण को पुन: प्रारंभ करने के लिए बैंकिंग प्रणाली को सक्षम बनाना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, ईमानदार ऋण देने की गारंटी दी जानी चाहिए कि विफलता की स्थिति में ऋणदाता अधिकारियों को संदिग्ध व्यक्ति तलाश जैसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा, बशर्ते वह कोई अनैतिक कार्य नहीं कर रहा हो। जब तक उद्यमियों और बैंकरों को बिना किसी डर और पक्षपात के सुविज्ञ जोखिम लेने और निष्कपट तरीके से गलतियां करने की अनुमति नहीं दी जाती, विकास संभव नहीं है।
विडंबना यह है कि आज हम ई-कॉमर्स उद्यमियों का गुणगान कर रहे हैं, जो लागत से नीचे माल उपलब्ध करा रहे हैं और बाजार में हिस्सेदारी की आपाधापी में लाखों छोटे उद्यमियों का नुकसान कर रहे हैं। वर्ष २०१७ के पहले ९ महीनों में भारतीय कंपनियों में १७.६ अरब डॉलर का निवेश किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इन ई-कॉमर्स संस्थाओं में ज्यादातर निवेश उन निजी उद्यम निधियों से आए हैं जिनके पास जोखिम मूल्यांकन के लिए बैंकों की तुलना में सीमित साधन होते हैं तथा ज्यादातर के पास तो सहारे के लिए वस्तुगत परिसंपत्तियां भी नहीं होती। दूसरी ओर, देश के कल-कारखाने जो रोजगार प्रदान करते हैं और आयात को भी कम करते हैं, उच्च ब्याज दरों और इन संस्थाओं के प्रवर्तकों की संभावित व्यक्तिगत देनदारियों की जंजीरों में बंधे नजर आते हैं। अगर हमें बढ़े आयात के साथ प्रतिस्पर्धा करनी है, तो नए निजी विनिर्माण उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए प्राथमिकताओं को पूरी तरह बदलना होगा। यही कंपनियां सरकारी खजाने को अतिरिक्त करों में योगदान देने के साथ-साथ भविष्य में रोजगार की संभावनाओं का भी विस्तार करेंगी।

Published on:
27 Oct 2017 02:06 pm
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