
पुस्तकः सेंसेक्स क्षेत्रीय दलों का
राजेंद्र बोड़ा
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और पुस्तक समीक्षक
............................................................
पंथ में से पंथ निकलने की हमारे देश में सनातन परंपरा रही है। उसी का रूप राजनीतिक पार्टियों के विखंडन तथा नए-नए दलों के उदय में भी नजर आता है। अकादमिक लोग क्षेत्रीय दलों के उदय को जटिल और बहुआयामी घटना मानते हैं, जो वास्तव में 19वीं सदी में इस देश में उभरी क्षेत्रीय चेतना और आजादी मिलने के बाद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के बीच पारस्परिक अंतरसंबद्धों का परिणाम भी है। आजादी से पहले भी देश में राजनीतिक पार्टियों की बहुतायत रही। तब अंग्रेजी शासन के साम्राज्यवाद से मुक्ति का ही लक्ष्य था। समाज सुधार आंदोलनों से भी राजनीतिक दल निकले। हिंदुओं और मुसलमानों के अपने-अपने राजनीतिक वर्चस्व वाले आंदोलन भी उठे, जिन्होंने बाद में राजनीतिक दलों का रूप ले लिया। संघीय व्यवस्था में लोकतांत्रिक राजनीति की स्थापना के परिणाम स्वरूप क्षेत्रीय दलों का बनना अस्वाभाविक नहीं है। यह भी कि विभिन्नता वाले समाज की भिन्नताएं भी भौगोलिक राजनीति पर अपना असर डालती हैं, जिससे नए-नए दल बनते हैं।
पत्रकारिता और लेखन में लंबी पारी खेलने वाले अकु श्रीवास्तव की नई पुस्तक ‘सेंसेक्स क्षेत्रीय दलों का’ भले ही समाजशास्त्रीय या राजनीति शास्त्र की दृष्टि से कोई गहरी छानबीन न करती हो, मगर जिस विस्तार से देश में क्षेत्रीय दलों की यात्रा - क्या हुआ, कैसे हुआ और कब हुआ - का इसमें ब्यौरा दिया गया है, वह इसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बनाता है। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वालों और मीडियाकर्मियों के लिए तो यह पुस्तक उपयोगी संदर्भ सामग्री या कहें रेडी रेकनर है। विषय के समग्र चित्रण के लिए विषय का ऐसा प्रस्तुतीकरण उचित भी है। पुस्तक के कवर पर लिखा उपशीर्षक ‘भारतीय राजनीति की दिशा बदलने वाली रीजनल पार्टियों का लेखा-जोखा’ इसकी ताईद करता है। यही इस पुस्तक की कामयाबी भी है। कौन सी पार्टी कब बनी, कैसे बनी और किस तरह से चली, यह सब जानना बेहद रोचक है। हिंदी में अपनी तरह की यह पहली पुस्तक इन सभी जिज्ञासाओं को पूरा करती है। हालांकि पुस्तक क्षेत्रीय दलों का विवेचन है, किन्तु वह विषय से आगे जाकर कांग्रेस के विभाजनों से बने नए दलों के इतिहास को भी दर्ज करते हुए और अधिक उपयोगी बन गई है।
क्षेत्रीय दलों के उदय से भारत की चुनावी राजनीति की प्रकृति निर्विवाद रूप से बदल गई। 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में क्षेत्रीय दलों की स्थिति में अपूर्व वृद्धि के बाद, राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी प्रतिस्पर्धा में नया शक्ति-संतुलन बना तथा जाति और समुदाय की राजनीति का दौर भी चला। जिसमें न सिर्फ संबंधित प्रदेशों में, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी क्षेत्रीय दलों ने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज की। और अब राज्य के अंदर अपने पसंदीदा क्षेत्रीय दल को वोट देने वाले मतदाता लोकसभा चुनावों में अपना नजरिया बदल लेते हैं। इस नए ट्रेंड को रेखांकित करते हुए क्षेत्रीय दलों की दिलचस्प कहानियां इस किताब में हैं।
हालांकि पुस्तक का प्रतीकात्मक शीर्षक स्टॉक मार्केट के उतार चढ़ाव से लिया गया है, जो लुभावनी अखबारी सुर्खी की तरह है, किन्तु अकु श्रीवास्तव की यह पुस्तक आम पाठक को देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व की महत्त्वाकांक्षाओं को भी समझने में मदद करती है। चार सौ रुपए मूल्य की इस पुस्तक को प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित किया है, जिसमें 375 पृष्ठ हैं।
Published on:
16 Oct 2022 09:24 pm
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
