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Patrika Opinion: इसरो ने गगनयान के लिए स्वीकारी एक और चुनौती

दरअसल, इसरो अब तक रॉकेट और उपग्रह निर्माण का काम करता रहा है, उसे ईसीएलएसएस विकसित करने का अनुभव नहीं है। इसलिए गगनयान के लिए ईसीएलएसएस बाहर से हासिल करने का विचार किया गया था, जो सफल होता नहीं दिख रहा है।

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Nitin Kumar

Dec 14, 2023

Patrika Opinion: इसरो ने गगनयान के लिए स्वीकारी एक और चुनौती

Patrika Opinion: इसरो ने गगनयान के लिए स्वीकारी एक और चुनौती

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) के अध्यक्ष एस. सोमनाथ का यह कहना मायने रखता है कि महत्त्वाकांक्षी गगनयान मिशन के लिए पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन समर्थन उपप्रणाली (ईसीएलएसएस) विदेश से मिलने की उम्मीद नहीं है, इसलिए इसरो ने इसे स्वयं विकसित करने का फैसला किया है। दरअसल, इसरो अब तक रॉकेट और उपग्रह निर्माण का काम करता रहा है, उसे ईसीएलएसएस विकसित करने का अनुभव नहीं है। इसलिए गगनयान के लिए ईसीएलएसएस बाहर से हासिल करने का विचार किया गया था, जो सफल होता नहीं दिख रहा है।

सोमनाथ के इस बयान ने एक बार फिर साबित किया है कि तेजी से विकसित होते भारत की राह में कांटे बिछाने का काम अब भी जारी है। दोस्ती का दम भरने वाले देशों, खासकर अमरीका, ने हमेशा दोहरी चाल चली है। चंद्रयान-3 और आदित्य एल-1 मिशनों की सफलता के बाद भले ही अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इसरो के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की बात की हो, सच्चाई यही है कि वह कभी नहीं चाहेगा कि इसरो अंतरिक्ष में उससे बड़ी छलांग लगाने की स्थिति में आ जाए। रूस की लगातार कमजोर होती आर्थिक स्थिति के बाद अंतरिक्ष में अमरीकी एकाधिकार को चीन और भारत से ही चुनौती मिल रही है। इसलिए अमरीका वह हरसंभव उपाय करेगा जिससे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की रफ्तार तेज नहीं हो सके।

इतिहास गवाह है कि न केवल अमरीका ने क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक देने से मना कर दिया था, बल्कि उसने यह सुनिश्चित किया कि यह तकनीक रूस से भारत को हस्तांतरित न की जा सके। सोवियत संघ के विघटन के बाद कमजोर हो चुके रूस की अंतरिक्ष एजेंसी पर कई प्रतिबंध लगाकर अमरीका ने समझौते के बावजूद क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक का हस्तांतरण नहीं होने दिया था। इस कारण रूस से हमें क्रायोजेनिक इंजन तो मिला, पर तकनीक नहीं। बाद में हमारे वैज्ञानिकों ने देश में ही इसे विकसित किया। यदि हमें रूसी तकनीक मिल गई होती तो अंतरिक्ष में आज हम और ऊंची उड़ान भर रहे होते।

हम जानते हैं कि इसरो की स्थापना के समय से ही इसके अभियानों में अड़चनें पैदा करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। हालांकि, भारतीय वैज्ञानिक हमेशा अपने कौशल और समर्पण के कारण हर अड़चन को अपने लिए अवसर में तब्दील करते रहे हैं। सोमनाथ का उपरोक्त कथन भी बताता है कि इस बार ईसीएलएसएस को विकसित करने की चुनौती उन्होंने स्वीकार कर ली है। उनका कथन दुनिया को बताएगा कि किस तरफ भारत अपनी ऐसी जिद से ही आगे बढ़ता रहा है, किसी दूसरे देश की मेहरबानियों से नहीं।