
शिवम भारद्वाज - स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार,
हाल के वर्षों में 'जेन जी' को लेकर शिकायतों का स्वर लगातार तेज हुआ है। अक्सर कहा जाता है कि यह पीढ़ी अनुशासनहीन है, परंपराओं के प्रति सम्मान नहीं रखती और 'अपने तरीके से जीने' की जिद में सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी करती है। पारिवारिक बातचीत से लेकर सोशल मीडिया और दफ्तरों तक यह धारणा बार-बार दोहराई जाती है कि आज के युवाओं में संयम, धैर्य और प्रतिबद्धता की कमी है। किसी भी पीढ़ी का स्वभाव अचानक पैदा नहीं होता। हर पीढ़ी अपने समय की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिणाम होती है। जिन युवाओं के व्यवहार पर आज सवाल उठाए जा रहे हैं, उनका बचपन उसी सामाजिक वातावरण में बीता है जिसे वर्तमान वयस्क पीढ़ी ने निर्मित किया है।
नई पीढ़ी की परवरिश उसी समाज के भीतर होती है जिसकी संरचना पिछली पीढिय़ां तय करती हैं। पिछले दो दशकों में परिवार और सामाजिक जीवन की संरचना में गहरे परिवर्तन आए हैं। तेज होती आर्थिक प्रतिस्पर्धा और व्यस्त जीवनशैली के कारण माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय कम होता गया। इस कमी की भरपाई अक्सर सुविधाओं के माध्यम जैसे खिलौनों से लेकर स्मार्टफोन और डिजिटल उपकरणों तक की गई। बच्चों को बहुत कुछ मिला, लेकिन हर सुविधा के साथ आवश्यक अनुशासन और संयम सिखाने की प्रक्रिया उतनी गंभीरता से नहीं अपनाई गई। परिणामस्वरूप सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन सीमाएं धीरे-धीरे धुंधली होती चली गईं।
तकनीक ने इस परिवर्तन को और तेज कर दिया। जेन जी ने ऐसी दुनिया में जन्म लिया है जहां सूचना तुरंत उपलब्ध है, प्रतिक्रिया तत्काल मिलती है और सफलता के त्वरित उदाहरण लगातार सामने आते रहते हैं। इसी पृष्ठभूमि का असर कार्यस्थलों पर भी दिखाई देता है। कई बार कहा जाता है कि नई पीढ़ी के कर्मचारी पारंपरिक कार्य संस्कृति के अनुरूप ढलने में संकोच करते हैं। वे लंबे समय तक एक ही संस्थान में टिके रहने के बजाय अवसरों के अनुसार नौकरी बदलने में संकोच नहीं करते। काम और निजी जीवन के संतुलन पर उनका जोर भी कई बार पुरानी कार्य संस्कृति के साथ टकराव पैदा करता है। यह भी सच है कि डिजिटल संस्कृति ने धैर्य और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता की आदत को कुछ हद तक प्रभावित किया है। कॉरपोरेट संस्थानों के सामने यह चुनौती है कि वे ऐसी कार्यसंस्कृति विकसित करें, जिसमें दक्षता और अनुशासन के साथ संवाद, लचीलापन और मानसिक संतुलन के लिए भी जगह हो।
हर पीढ़ी को अंतत: अपने व्यवहार की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होती है। लेकिन केवल उन्हें कठघरे में खड़ा कर देना समस्या का समाधान नहीं है। इससे अधिक आवश्यक यह है कि हम उस सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी विचार करें, जिसने इस पीढ़ी को गढ़ा है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी अधिक संतुलित, जिम्मेदार और संवेदनशील बने, तो परिवारों में संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। बच्चों को केवल सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें समय, ध्यान और मार्गदर्शन भी देना होगा। शिक्षा संस्थानों को ज्ञान और कौशल के साथ-साथ जीवन मूल्यों और कार्य संस्कृति को भी अपनी प्रक्रिया का हिस्सा बनाना होगा। किसी भी पीढ़ी का मूल्यांकन करते समय केवल उसकी कमियों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होता। यह भी देखना जरूरी है कि उसे किन परिस्थितियों ने गढ़ा है। आखिर मनुष्य को उसके जन्म-वर्ष से नहीं, बल्कि उसके अनुभवों से पहचाना जाता है और उन अनुभवों को गढऩे में समाज की भूमिका होती है।
Published on:
18 Mar 2026 02:16 pm
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