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दूरदृष्टा कुलिश जीः अपने मूल उद्देश्य से भटक गई धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा

9 मई 1990 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित 'धर्म निरपेक्षता एक थोथा नारा' आलेख

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भारत

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Ashib Khan

Mar 18, 2026

Karpoor-Chandra-Kulish

फोटो: पत्रिका

कर्पूर चंद्र कुलिश जी का मानना था कि भारत में प्रचलित धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा मूल उद्देश्य से भटक गई है। उन्होंने कहा, स्वतंत्रता के बाद राजनीति में इस शब्द को इसलिए अपनाया गया था ताकि शासन सन सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टि रखे और धर्म को नागरिकों का निजी विषय माना जाए। लेकिन व्यवहार में यह सिद्धांत अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया।

कुलिश जी का मत है कि भारतीय समाज में परंपरागत रूप से विभिन्न धर्मों और मतों के बीच सहिष्णुता और सम्मान की भावना पहले से मौजूद रही है। इसके बावजूद धर्मनिरपेक्षता का प्रयोग धीरे-धीरे दलगत राजनीति का उपकरण बन गया, जिससे सामाजिक सौहार्द बढ़ने के बजाय कई बार कटुता की स्थिति पैदा हुई। इसी संदर्भ में कुलिश जी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 'सेक्यूलरिज्म' शब्द की स्पष्ट व्याख्या की मांग भी की, क्योंकि उनके अनुसार संविधान में इसका अर्थ अस्पष्ट है।