
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी
जब देश में आपातकाल लगा हुआ था और अखबारों में लिखने की आजादी छीन ली गई थी, उन्हीं दिनों की बात है। बाबूसा. (कुलिश जी) रोटरी भवन में नियमित रूप से योगाभ्यास करने आते थे। वे योग साधकों को समझाते थे कि आने वाला वक्त योग का होगा। भाग-दौड़ की इस जिंदगी में जिस कदर मन का चैन छिन रहा है और तनाव बढ़ता जा रहा है, इससे निजात पाने के लिए लोग योग के प्रति आकर्षित होंगे। वास्तव में बाबूसा. की दूरदृष्टि कमाल की थी। आज भारत के नेतृत्व में करीब 200 देश स्वस्थ जीवन शैली के लिए योग अपना रहे हैं।
लोगों में योग के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए बाबूसा. ने हर सप्ताह योग पर आलेख लिखने का दायित्व मुझे सौंपा। मैं उन दिनों योग प्रशिक्षक के रूप में योग कक्षा का संचालन करता था तथा टैगोर विद्या भवन में अध्यापन का कार्य करता था। शायद यही वजह थी कि बाबूसा. मुझे मास्साब कहकर पुकारते थे।
कुलिश जी को पत्रिका में स्वास्थ्य, धर्म, समाज और कारोबार की खबरों की कमी खल रही थी। मैंने एम.कॉम कर रखा था और आयुर्वेद रत्न भी था। यह बाबूसा. की देन ही रही कि मैं शिक्षक से पत्रकार बन गया। उनके प्रयासों से ही शास्त्रीनगर स्थित योग भवन में पहला अखिल भारतीय योग सम्मेलन हुआ, जिसमें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के योग गुरुओं ने भाग लिया। इस सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष बाबूसा. थे, लेकिन मंच पर उन्होंने अपने स्थान पर मुझे बिठाया। योग सम्मेलन का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर ने किया तथा उनके इस अनुरोध को भी बाबूसा. ने अनसुना कर दिया कि वे मंच पर पधारें। कुलिश जी नहीं चाहते थे कि उनकी पब्लिसिटी हो या उनका नाम व फोटो अखबार में छपे। सम्मेलन का विज्ञापन भी उन्होंने पत्रिका में नि:शुल्क छपवाया। इस अवसर पर राजस्थान पत्रिका में योग पर छपे आलेखों के संग्रह ‘स्वास्थ्य सौंदर्य में योग’ का विमोचन बाबूसा. ने किया। रिपोर्टिंग के लिए कई बार उनके साथ घूमने का अवसर मिला। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा। मुझे याद है मैं उनके साथ राजापार्क स्थित प्राणनाथ मन्दिर के जयंती समारोह की कवरेज के लिए गया था और वे मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा-केवल आयोजकों का फोटो छापना है उसमें कुलिश नहीं होना चाहिए। क्योंकि फिर आयोजकों का तांता लग जाएगा कि उनके समारोह में भी भाग लें और यह मैं नहीं चाहता।
वे मानते थे कि पत्रकार का दायित्व जनता की भावना को मूल रूप से प्रतिध्वनित करना है। यदि वह कोई समाचार बना रहा है तो उसमें विचार नहीं डाले, लेकिन उसे विचार संप्रेषित करने हैं तो वे लेखों-सम्पादकीय के माध्यम से होने चाहिए।
कुलिश जी ने 60 वर्ष की उम्र पूरी होने पर पत्रिका को ‘नमस्कार’ किया तो भी उनका लेखन कार्य जारी रहा। उनकी लेखन शैली में एक अलग बांकपन, स्वाभिमान, तहजीब, पैनापन और धार दिखाई देती थी। उनकी लेखन शैली उनकी शख्सियत का ही विस्तार था।
कुलिश जी शुरू से मेरे प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक रहे। बाबूसा. किसी विषय की व्याख्या करने और निष्कर्ष तक पहुंचने में बेजोड़ थे। वे मर्म तक पहुंचते थे और भविष्य की दृष्टि लिए होते थे। घटनाओं, व्यक्तियों और लेखन पर उनकी टिप्पणियां सदैव गंभीर रहीं तथा उदाहरण के रूप में याद की जाती थीं। समाचारों की विश्वसनीयता, गुणवत्ता और श्रेष्ठता को उन्होंने अपना धर्म मान लिया था तथा इसी दिशा में निरंतर सचेष्ट रहे।
(लेखक लंबे समय तक पत्रिका से संबद्ध रहे।)
Updated on:
18 Mar 2026 02:19 pm
Published on:
18 Mar 2026 02:19 pm
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