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स्मृति में… 48 साल पहले पोस्टकार्ड ने दूर की थी चिंता, कॉलेज टॉपर बनने की राह दिखाई

karpoor Chandra Kulish 100th Birth Year: राजस्थान पत्रिका के एक कॉलम में मिली सलाह ने एक सामान्य छात्र की जिंदगी की दिशा बदल दी। हौसला, अनुशासन और सही मार्गदर्शन से वही छात्र आगे चलकर बैंक का मुख्य प्रबंधक बना।

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यह फोटो रतनलाल पंवार, भीनमाल (जालोर) ने साझा की है। वे बीते 35 साल से राजस्थान पत्रिका का संकलन कर रहे हैं।

जयपुर। स्कूली शिक्षा नागौर से पूरी करने के बाद 1977 में ग्रामोथान विद्यापीठ कृषि कॉलेज, संगरिया में प्रवेश लिया। तब तक मैं मध्यम श्रेणी का विद्यार्थी था और मुझे यह चिंता सताने लगी थी कि अगर यही स्थिति रही तो जीवन में कामयाबी नहीं मिल पाएगी। इस चिंता से मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य गिरने लगा था।

मनोचिकित्सक की सलाह प्रकाशित हुई

ऐसे समय मैंने 1977 के दौरान ही पत्रिका में प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक संस्करण 'इतवारी पत्रिका' के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी नियमित कॉलम में पोस्टकार्ड भेजा। अगले ही संस्करण में मेरा पत्र और मनोचिकित्सक की सलाह प्रकाशित हुई। सलाह थी कि कठिन परिस्थिति में हौसला बनाए रखते हुए आशावादी बनूं, कठोर परिश्रम कर विद्याध्ययन पर ध्यान, नियमित व्यायाम व संतुलित भोजन करूं और 'चिंता रहे तो डेल कारनेगी की पुस्तक 'चिंता छोड़ो सुख से जियो' पढूं। उसी दिन से सलाह का पालन शुरू किया।

कॉलेज का सर्वोत्तम विद्यार्थी बना

परिणामतः मैं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होकर कॉलेज का सर्वोत्तम विद्यार्थी बना। लगातार तीनों वर्ष टॉपर रहा। फिर बैंक अधिकारी बना और अंत में मुख्य प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुआ। कुलिशजी के जन्मशती पर्व पर मैं कहना चाहूंगा कि मेरे लिए राजस्थान पत्रिका के सामाजिक सरोकार का यह उत्कृष्ट उदाहरण है।

प्रेषक: पवन काला, नागौर

काव्यांजलि

जीवन सफल और आप, धन्य हो गए, आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।
आप वीर नहीं, महावीर थे, बिन शस्त्रों के, शमशीर थे।
था तेज लिलाट, अनुपम आभा, आप धीर-वीर और गंभीर थे। पूरे विश्व को अपना बना गए, आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।

झुके नहीं आप दमन के आगे, बढ़े गए कदम, जो नहीं रुके।
थी वज्र बाहें, और फौलादी सीना, आप सूरज थे, जो नहीं थके। अंधियारी डगर को, रोशन कर गए, आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।

निर्भीक चिंतक और समाज सुधारक, दिला गए सबको, जिनका था हक। प्रखर वक्ता और वेदों के ज्ञाता, 'गीत गोविन्द' के, सफल निर्माता। मर्मज्ञ, अध्येता, नव इतिहास रच गए, आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।

छप्पन में, रोपा था पौधा, पत्रकारिता के, ओ पुरोधा।
अलख जगाई सरोकार की, आप डटे रहे कुलिश, बन योद्धा। पत्रिका की नैया, पार लगा गए, आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।

जयपुर छोड़, सीमा पर आए, लोगों के दुःख - दर्द सुनाए।
'बाड़मेर मेरी दृष्टि में' पुस्तक सृजन कर, नवभाव जगाए।
'भायाजी' बन, सबको हिला गए। आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।
लाखों-लाखों मस्तक झुके, याद में, यादें बसी हैं, हर इबादत में। पत्रिका लहराए, गजब परचम आपके रहते, आपके बाद में। आप गए नहीं कुलिश, अमर हो गए।

  • डॉ. बंशीधर तातेड़, बाड़मेर

कुलिशजी की कलम प्रतिभा, सारे जग ने जानी है। 'राजस्थान पत्रिका' के वो, उद्भव की कहानी है।
जिसने अपना जीवन लक्ष्य, लेखन सत्य बनाया था। जनता की आवाज उठाकर, सच का शंख बजाया था।

कभी ना हारी जिसने हिम्मत, संकट मार भगाया था। पत्रकारिता में परिवर्तन का, गीत उन्हीं ने गाया था।
कुलिशजी के योगदान का, कोई न जग में सानी है। राजस्थान पत्रिका के वो, उद्भव की कहानी है।।

था विश्वास उन्हें यह पूरा, एक भोर सुहानी आनी है। राजस्थान पत्रिका के वो, उद्भव की कहानी है।।
उनकी कलम कभी न रुकी थी, अपनी मुश्किल राहों में। उनकी कलम कभी न झुकी थी, घोर निविड़ झंझाओं में!

धन, सत्ता और बाहु का बल, जकड़ न पाया बांहों में। चली निरंतर कलम आपकी, ध्येय था नेक निगाहों में।
विपुल साहित्य किया जो सृजन, अथाह ज्ञान की खानि है। राजस्थान पत्रिका के वो, उद्भव की कहानी है।।

सच्चे प्रहरी लोकतंत्र के, लिखते बातें जन मन की, जानकारी थी उनको सारी राजस्थान के कण-कण की।
राजस्थान पत्रिका उनका, खबरें देता पल-पल की। जीवन निर्मल सरित जल-सा, नाव सुनाता कल-कल की!

बाण चलाती अनीति पर, ऐसी कुलिश कमानी है। राजस्थान पत्रिका के वो, उद्भव की कहानी है।।

  • भोमराज सुथार, बाड़मेर

जीवन का यह निरंतर प्रवाह, यहां हर व्यक्तित्व बहता जा रहा, वहां 'कुलिश' आपके अंशों ने, है 'जन-जन की खोज पर बल दिया।।
कुछ मेहनतकश हाथों की थकान, जिन्हें ना मिला था कभी कोई सम्मान, उन दबे हुए बलिदानों को है आपने ही दी थी नई पहचान।।
ना मुश्किल वक्त को कभी 'बुरे दिन' माना, संघर्ष को भी समझा तप' समान।।
अनमोल इन शब्दों को 'धाराप्रवाह' से है आपने ही दी 'जीवन से अस्तित्व' की पहचान।।

  • नेहा शर्मा, करौली

आज सात दशकों को याद करते हैं, चलो कुछ संवाद पत्रिका के साथ करते हैं।
न दबाव सहूंगा न समझौता करूंगा, था प्रण मन में, कुछ ऐसा करूं जनहित में, शासन प्रशासन का आइना दिखाऊं, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सार्थकता निभाऊं, फिर हुआ सपना साकार श्रद्धेय बाबोसा ने दिया राजस्थान पत्रिका का उपहार।

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जनहित में अभियान चलाए, सत्य विश्वास सब तक पहुंचाए, ज्वलंत मुद्दे पर प्रश्न उठाकर समाधान की जो राह सुझाए, वह राजस्थान पत्रिका कहलाए।

पथ प्रदर्शक बनकर, जो नीति परिवर्तन का आधार बनाए, व्यवस्थागत खामियों को उजागर कर, जो सोचने को मजबूर कर जाए, वह राजस्थान पत्रिका कहलाए!

सामाजिक अभियान हो, धरोहर का मान हो, जल संरक्षण, स्वास्थ्य शिक्षा, सरकारी सेवा की अनियमितता सबको जो सच का आईना दिखाए, वह राजस्थान पत्रिका कहलाए।

  • पहल शेखावत, कोटा