
supreme court of india
- एन.एन. माथुर, राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, पूर्व कुलपति, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने जिस तरह से सवाल उठाए वह न्यायिक संस्कृति के विरुद्ध ही है। सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई फैसले हैं जो मिसाल कायम नहीं कर पाए इनमें न्यायाधीश कर्णन को सजा व न्यायाधीश काटजू को अदालत में हाजरी व फटकार का मामला शामिल है। ये दोनों प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय ज्यादा संजीदगी से निपटा सकता था। रोस्टर प्रणाली, जो सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के पास होती है।
सभी न्यायाधीश बराबर होते हैं क्योंकि वे संवैधानिक पद पर हैं। मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों को काम बांटते हैं, उसे ही रोस्टर बनाना कहते हैं। यानी कौन न्यायाधीश पीआईएल सुनेंगे व कौन फौजदारी, दीवानी अथवा टैक्स के मामले। यह बंटवारा मामलों की लंबितता, न्यायाधीशों की क्षमता, उनका विशेष ज्ञान आदि ध्यान रखकर होता है। सर्वोच्च न्यायालय में सभी न्यायाधीश बहुत अनुभवी होते हैं। २- जी का केस न्यायाधीश पी.एस. सिंघवी ने सुना जबकि वे ग्यारहवें नम्बर पर हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीश जिन्हें दो साल भी नहीं हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों में फैसले दिये हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण ने जिस याचिका को इस विवाद का कारण बताया है, वह मेडिकल कॅालेज घोटाले से जुड़ी थी। यह याचिका प्रशांत भूषण के एनजीओ ‘सीजेएआर’ की थी। उसी वक्त अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने उसी विषय पर याचिका प्रस्तुत की। जो न्यायाधीश चेलमेश्वर के यहां उसी रोज लगी। उन्होंने ये मामला पात्र न्यायाधीश की पीठ को भेज दिया। ये मुख्य न्यायाधीश के विशेषाधिकार का क्षेत्र था। वास्तविक रूप से सीजेएआर बेंच हंटिंग का दोषी है।
वे न्यायाधीश चेलमेश्वर के यहां याचिका चाहते थे। ये लोग किसी वजह से मामले को उछाल रहे हैं। आज देश भर में हर शहर, राज्य में कुछ तथाकथित एक्टिविस्ट जिसमें कई अधिवक्ता भी है कई कारणों से जनहित याचिकाएं लगाते हैं। प्रचार में विश्वास रखने वाले न्यायाधीश उनकी तारीफ करते हैं। रिटायरमेंट के बाद अपनी जीवनी लिखवाते हैं। वंचितों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए शुरू हुई जनहित याचिकाएं अब कॉरपोरेट व राजनीतिक लाभ के लिए होने लगी है। आवश्यक है कि जनहित याचिकाओं की परिसीमा नये सिरे से तय हो।

Published on:
21 Jan 2018 09:59 am
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