
data management
- अरुण बोथरा, लेखक और अधिकारी
अगर आप किसी नए शहर या मोहल्ले में अपना या किराये का मकान लें तो बाकी बातों के साथ ये जरूर देखेंगे कि वहां का माहौल कैसा है। सुरक्षा-व्यवस्था कैसी है। कहीं ज्यादा चोरी-चकारी तो नहीं होती। जाहिर है ये सब बातें आप किसी मित्र-परिचित से पूछेंगे जो उस इलाके में रहता हो या वहां के बारे में जानता हो। पर अगर आप लंदन या न्यूयॉर्क जैसे किसी शहर में रहना चाहें तो ऐसी जानकारी के लिए किसी से पूछने की जरूरत नहीं है। शहर तो क्या गली-मोहल्ले तक की कुंडली ऑनलाइन मिल जाएगी। किस इलाके में किस तरह के कितने अपराध होते हैं, दिन के किस वक्त ज्यादा अपराध होते हैं और कितने अपराधी पकड़े जाते हैं, हर जानकारी कुछ बटन भर दबाने से आपके इनबॉक्स में आ जाएगी, बशर्ते आप उसकी कुछ कीमत देने को तैयार हों।
सूचना में शक्ति है ये बात लोग पिछली सदी में जान गए थे, पर सूचना में नकद पैसा है ये हमें गूगल और फेसबुक ने पिछले दशक में सिखाया है। प्राइवेसी के खतरों के बारे में जानते-बूझते भी हम सब चाहे-अनचाहे रात-दिन इन कंपनियों को अपनी निजी जिंदगी के बारे में सब कुछ बताते चलते हैं। यही मुफ्त में परोसी हुई जानकारी आज दुनिया में कमाई का एक बड़ा जरिया बन गई है।
सूचना में पैसा है, ये जानना एक बात है लेकिन सूचना में से ये पैसा निकालना बिल्कुल अलग बात। जनसंख्या में हम दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं। जाहिर है, हमारे पास सूचना की भरमार है। परेशानी ये है कि हमारी मुफ्त में दी हुई सूचना से दुनिया पैसे कमा रही है और उसी सूचना को हम पैसे देकर खरीदते हैं। पैसे कमाना तो दूर, हम इस सूचना का इस्तेमाल अपनी व्यवस्थाएं सुधारने में भी नहीं कर पा रहे।
अब अपराध के बारे में सूचना को ही लें। पूरी दुनिया में पुलिस अपने कामकाज के लिए बहुत हद तक डेटा पर निर्भर करती है। अपराध की हर घटना से संबंधित पूरी जानकारी को बड़ी सावधानी से संजोया जाता है। खासतौर पर पुलिस बजट का पैसा कहां और कैसे खर्च किया जाएगा यह वैज्ञानिक तौर पर डेटा विश्लेषण से तय किया जाता है। विश्लेषण का यह काम अक्सर बाहरी एजेंसियां जैसे कि शैक्षिक संस्थान और निजी कम्पनियां करती हैं। पैसा सरकार देती है।
जाहिर है डेटा जमा करने और उसके विश्लेषण में काफी खर्च भी होता है। गूगल और फेसबुक भी इसी काम पर बड़ी रकम खर्च करते हैं और मोटा मुनाफा भी कमाते हैं। अपराध संबंधी डेटा एक तरफ कामकाज बेहतर करने में पुलिस की मदद करता है तो दूसरी तरफ यह कमाई का जरिया भी है। लोग ये डेटा पैसे देकर खरीदते भी हैं जैसे कि किसी खास इलाके में मकान लेने के लिए। अपने यहां ये डेटा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो जमा करता है। देश के हर थाने से आंकड़े जुटाने की बड़ी कवायद के बाद ब्यूरो हर साल ‘क्राइम इन इंडिया’ किताब प्रकाशित करता है। आंकड़े कितने सटीक और विश्वसनीय हैं, हालांकि इस पर सवाल उठते रहते हैं लेकिन मूल बात यह है कि इस जानकारी का धरातल पर कोई ठोस फायदा नहीं दिखता।
आज के दौर में जब दुनिया भर में पुलिस डेटा के जरिये अपने काम को जांचती और सुधारती है, हमारे यहां पुराने तरीके बरकरार हैं। यदि किसी शहर में पुलिस को पचास नई गाडिय़ां और दो सौ सिपाही दिए जाएं तो अक्सर इन संसाधनों की तैनाती वहां होने वाले अपराधों के बारीक वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर नहीं, बल्कि पुराने तजुर्बे और अंदाजे से की जाती है। इस प्रक्रिया में मानवीय भूल की गुंजाइश भी ज्यादा रहती है।
उदहारण के लिए किसी महानगर में पुलिस का मुखिया सोच सकता है कि पैदल गश्त से अपराध पर बेहतर काबू पाया जा सकता है। कोई दूसरा अधिकारी मोटरसाइकिल से गश्त पर जोर दे सकता है तो कोई तीसरा गाडिय़ों पर। ऐसे में तीनों अधिकारियों के सरकारी पैसे का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से निजी पसंद या अंदाजों के आधार पर किए जाने की संभावना ज्यादा है, जबकि यह वैज्ञानिक तरीके से होना चाहिए। इन फैसलों का सीधा असर लोगों के जान-माल पर पड़ता है। बात पुलिस की हो या दूसरे विभागों की, फैसले डेटा के वैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर होने चाहिए।
अपराध से संबंधित आंकड़ों को जमा करने और उनका अध्ययन करने का काम विश्वविद्यालयों और दूसरे शैक्षिक संस्थानों में होना चाहिए। यह पुलिस का काम नहीं है। होना यह चाहिए कि पुलिस सिर्फ आंकड़े जुटा कर दे। हमारे विश्वविद्यालयों में अपराध संबंधी कोई महत्त्वपूर्ण शोध नहीं हो रहे। जो शोध हो रहे हैं, उनका उपयोग समाज और जीवन में कम और डिग्री देने में ज्यादा है।
अपराध के आंकड़े पुलिस के पास हैं, पर वह वैज्ञानिक विश्लेषण कर कामकाज सुधारने में अक्षम है। शैक्षिक संस्थानों के पास न तो आंकड़े हैं और न ही समाज के काम आने लायक शोध करने की ललक। आज का जमाना डेटा का है। यदि सही डेटा उपलब्ध हो और उसका उचित विश्लेषण हो तो हम अपनी व्यवस्थाओं में काफी सुधार ला सकते हैं। पुलिस और दूसरे विभागों में शैक्षिक संस्थानों की भागीदारी समाज के लिए अहम हो सकती है। फिलहाल यह तालमेल नजर नहीं आता। गूगल देश के गली-कूचों के नक्शे बना कर ओला-उबर को बेच रहा है और हम इस मुफ्त की जानकारी की कीमत टैक्सी के बिल में अदा कर रहे हैं।

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