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Travelogue: नन्ही जलपरी, जिसके दीवाने कई तो दुश्मन भी हैं जमाने में

यूरोप के देशों की प्रमुख राजधानियों में से एक और जीवनस्तर व पर्यावरण की दृष्टि से एक खास शहर की पहचान रखने वाले कोपेनहेगन की 'लिटिल मरमेड' यानी 'नन्ही जलपरी' आज डेनमार्क का प्रतीक भी है। कोई भी यहां आने वाला पर्यटक उसे देखे बिना नहीं जाता।

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Patrika Desk

May 10, 2022

Statue in 1964 after first attack on it.

1964 में बुत पर हुए पहले हमले में उसका सिर हटा दिया गया। चित्र में खोजबीन में जुटा एक शख्स।

तृप्ति पांडेय
पर्यटन और संस्कृति विशेषज्ञ

पिछले कुछ दिनों में मुझे अपनी डेनमार्क की यात्रा कई बार याद आई। पहले हमारी सबसे बड़ी बहन ने अपनी यात्रा के दौरान जब कई बार फोन पर डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन से वहां की सुंदरता की चर्चा की और फिर जब हमारे प्रधानमंत्री की वहां की यात्रा की सजीव खबरें देखीं। अभी कुछ सालों पहले ही मेरा भी पहली बार वहां जाना हुआ था, तब तक बहुत कुछ पढ़ा था कोपेनहेगन के बारे में।

यूरोप के देशों की प्रमुख राजधानियों में से एक और जीवनस्तर व पर्यावरण की दृष्टि से एक खास शहर की पहचान रखने वाले कोपेनहेगन की 'लिटिल मरमेड' यानी 'नन्ही जलपरी' आज डेनमार्क का प्रतीक भी है। कोई भी यहां आने वाला पर्यटक उसे देखे बिना नहीं जाता। हमने भी कोपेनहेगन के बहुत ही दिलचस्प और रंग-बिरंगे 'न्यू हार्बर' से नौका लेकर 'नन्ही जलपरी' तक पहुंचना तय किया। कभी मछुआरों का बीयर में डूबा, वेश्यावृति में लिप्त और वाइकिंग यानी समुद्री डाकुओं का बदनाम गांव 'न्यू हार्बर' आज रंग-बिरंगे 17वीं सदी के घरों, संग्रहालयों, रेस्टोरेंट आदि के कारण शहर का बड़ा आकर्षण बन गया है। यहां का सबसे पुराना मकान है 'नौ नम्बर' और यहीं प्रसिद्ध साहित्यकार हान्स क्रिश्चियन एंडरसन पहले मकान संख्या 67 और फिर मकान संख्या 18 में रहे। पहले वाले मकान पर उनके नाम की पट्टिका लगी है और बाद वाले में स्मृति चिह्नों की प्रदर्शनी। गुजरे जमाने के साहित्यकारों, संगीतज्ञों, चित्रकारों, नामी शख्सियतों, यहां तक कि तवायफों के जीवन की कहानियों, जिनका लेना-देना राजनीति से नहीं बल्कि पर्यटकों की रुचि से है, को एक आकर्षक रूप देने के लिए पश्चिमी देशों की तारीफ करनी ही होगी। तो अब बात साहित्यकार एंडरसन और नन्ही जलपरी की।

एंडरसन को विश्वप्रसिद्ध बनाया उनकी परिकथाओं ने। पहले एंडरसन की लेखनी में और फिर लोगों के दिल में नन्ही जलपरी ऐसी उतरी कि विवाद भी साथ हो लिए। नन्ही जलपरी, एंडरसन के 1837 में प्रकाशित परिकथा संग्रह का हिस्सा थी। उस पर आधारित 'बैले' यानी भव्य नृत्यनाटिका को जब मशहूर डेनिश बियर काल्र्सबर्ग के संस्थापक के बेटे कार्ल जैकबसन ने देखा तो नन्ही जलपरी की प्रतिमा को देश के समुद्र तट पर लगाना तय किया। 1909 में प्रतिमा के बनाए जाने से उसके आज के स्वरूप तक की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितनी कि प्रतिमा खुद। मॉडल के रूप में बैलेरीना नृत्यांगना एलन प्राइस को चुना गया और मूर्तिकार एडवर्ड एरिक्सन लग गए कांस्य प्रतिमा बनाने में, पर जब 23 अगस्त 1913 को प्रतिमा का अनावरण हुआ तो पता पड़ा कि प्रतिमा का सिर और शरीर बनाने के लिए मॉडल एक नहीं बल्कि दो थीं। हुआ यों कि प्रतिमा का सिर बन जाने के बाद मॉडल ने निर्वस्त्र होना नहीं स्वीकारा, तो मूर्तिकार पति को परेशानी में पड़े देख कर उनकी पत्नी बाकी बची प्रतिमा के लिए मॉडल बनीं।

'नन्ही जलपरी' को कई बार प्रदर्शनकारियों का विरोध और 'अंगभेदन' तक झेलना पड़ा है। 1964 में हुए पहले हमले में सिर हटा दिया गया जो बहुत खोजने पर भी नहीं मिला। तब नया सिर लगाया गया। 1984 में एक हमले में हाथ हटा दिया गया। 1998 में एक बार फिर हमले में नए सिर को हटा दिया गया पर इस बार वह ढूंढ निकाला गया। 'नन्ही जलपरी' की हस्ती ही कुछ ऐसी है कि मिटती नहीं। इसकी कहानी बच्चों से लेकर बड़ों तक को लुभाती है।