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निर्बन्ध : ऊहापोह और ग्लानि

उसे अपना आत्मसंयम काफी भारी पड़ रहा था। सात्यकि से अर्जुन की यह अवस्था देखी नहीं गई। अर्जुन के प्रति उसकी सहानुभूति ने धृष्टद्युम्न के प्रति आक्रोश का रूप धारण कर लिया।

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सागर

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raghuveer singh

Aug 09, 2016

नरेंद्र कोहली के प्रसिद्ध उपन्यास से

उसे अपना आत्मसंयम काफी भारी पड़ रहा था। सात्यकि से अर्जुन की यह अवस्था देखी नहीं गई। अर्जुन के प्रति उसकी सहानुभूति ने धृष्टद्युम्न के प्रति आक्रोश का रूप धारण कर लिया। वह दांत पीसकर बोला, यहां ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो इस अभद्र, पापी, नराधम को मार डाले। और फिर उसकी दृष्टि सीधे धृष्टद्युम्न पर जा टिकी, तेरे इस पाप कर्म के कारण सारे पांडव अत्यंत घृणा प्रकट करते हुए तेरी निन्दा कर रहे हैं; और तू लज्जित होने के स्थान पर अपना यशगान कर रहा है।

तेरी जिह्वा के टुकड़े क्यों नहीं हो जाते। तेरा मस्तक फट क्यों नहीं जाता। तू अर्जुन पर भीष्म के वध का आरोप लगा रहा है। भीष्म ने तो स्वयं ही अपनी मृत्यु का ऐसा विधान किया था। भीष्म का वध करने वाला भी तेरा ही पापी भाई है। ऐसे पाप कर्म करने वाला पांचाल पुत्रों के समान इस पृथ्वी पर और है ही कौन। तुम दोनों को पाकर सारे पांचाल धर्मभ्रष्ट नीच, मित्रद्रोही और गुरुद्रोही हो गए हैं।

यदि तू फिर इस प्रकार की बात करेगा तो मैं अपनी इस गदा से तेरा सिर कुचल दूंगा। तू मेरे सम्मुख मेरे गुरु और उनके गुरु पर आक्षेप कर रहा है। तुझे लज्जा नहीं आती। युधिष्ठिर विचित्र ऊहापोह में फंसे हुए थे। वे तो स्वयं अद्र्धसत्य बोलकर एक प्रकार की ग्लानि का अनुभव कर रहे थे। अर्जुन के इस धिक्कार ने उनका आत्मबल और भी कुंठित कर दिया था। और अब उनके सबसे प्रबल दोनों सहायक परस्पर उलझ गए थे। उन्हें भय था कि कहीं वे दोनों शस्त्र ही न उठा लें।

क्षत्रियों का अपने क्रोध पर कोई नियंत्रण नहीं था। और क्रोध आते ही उनके हाथों में शस्त्र भी प्रकट हो जाते थे। वे सात्यकि को जानते थे। वह न कृष्ण के विरुद्ध कुछ सुन सकता था और न ही अर्जुन के विरुद्ध। कृष्ण का अपमान करने पर तो वह उपप्लव्य में बलराम से उलझ पड़ा था। उस बलराम से जिनके विरोध में बोलने से स्वयं कृष्ण और पांडव भी बचते थे और धृष्टद्युम्न का क्रोध कौन-सा कम था।

इस समय उसका दोष भी विशेष नहीं था। द्रोण का वध करने पर तो कृष्ण, भीम और स्वयं धर्मराज सहमत थे। उसका अपराध तो इतना ही था कि उसने वध करते हुए आचार्य के सम्मान का ध्यान नहीं रखा था। पर उसके मन में वर्षों से क्रोध संचित हो रहा था। उस क्रोध को भी तो कहीं प्रकट होना ही था। पर धृष्टद्युम्न ने बड़े धैर्य से सात्यकि की बात सुनी थी, जैसे स्वेच्छा से उसे बोल लेने का अवसर दे रहा हो।

जब वह बोला तो भी उसका स्वर अनियंत्रित नहीं था, मैं तुझे क्षमा कर देता, क्योंकि अनार्य पुरुष साधुओं पर ऐसे आक्षेप करते ही रहे हैं। पर मेरी क्षमा को तू मेरी उदारता न मानकर मेरी दुर्बलता समझेगा। इसलिए केवल तुझे स्मरण रखने के लिए कह रहा हूं कि युद्धभूमि में भूरिश्रवा की बांह पार्थ ने काट ली थी। भूरिश्रवा आमरण अनशन पर बैठ गया था, तब तूने उसका मस्तक काट लिया था। द्रोण की स्थिति वह नहीं थी। वे मुझसे लड़ रहे थे। सारे शस्त्रास्त्र उनके पास थे। उनके सारे अंग समर्थ और सबल थे।


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