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प्रत्यक्ष : पृष्ठभूमि

और तब दुर्योधन बोला, 'कृष्ण! चलिए हम पहले भोजन कर लें और फिर आप मेरे इसी भवन के सर्वश्रेष्ठ विश्राम कक्ष में रात के लिए विश्राम कर सकते हैं।Ó

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kamlesh sharma

Apr 09, 2015

और तब दुर्योधन बोला, 'कृष्ण! चलिए हम पहले भोजन कर लें और फिर आप मेरे इसी भवन के सर्वश्रेष्ठ विश्राम कक्ष में रात के लिए विश्राम कर सकते हैं।Ó कृष्ण ने उठने की कोई तत्परता नहीं दिखाई, 'नहीं युवराज!

मैं भोजन करने के विचार से नहीं आया हूं और न ही आपके प्रासाद में रात्रि विश्राम की मेरी कोई योजना है। मेरे हस्तिनापुर प्रवेश से लेकर अब तक आपके दर्शन नहीं हुए थे, इसलिए मैंने सोचा कि आपसे भेंट तो कर ही जाऊं।Ó

'वह तो ठीक है किंतु आपको मेरे यहां भोजन करने में क्या असुविधा है?Ó दुर्योधन के मधुर शब्दों और शिष्ट व्यवहार के आवरण के भीतर से भी उसकी खीज प्रतिबिंबित हो रही थी, 'हम समधी हैं। हमारे द्वारा निवेदित अन्न, जल, वस्त्र और शैया को आपने इस प्रकार तिरस्कृत कर दिया है, जैसे आप हमसे कोई संबंध ही नहीं रखना चाहते।Ó

'मैं दूत हूं।Ó कृष्ण बोले, 'और दूत अपने प्रयोजन के सिद्ध हो जाने पर ही भोजन तथा सम्मान स्वीकार करता है। आप भी मेरे प्रयोजन की सिद्धि के पश्चात् मेरा और मेरे मंत्रियों का सत्कार कर सकते हैं।Ó

दुर्योधन का क्षोभ कुछ मुखर हो उठा, 'आप केवल दूत ही तो नहीं हैं। हमारे और पांडवों के संबंधी भी हैं। आप मध्यस्थ हैं और संभावित युद्ध के लिए आपने दोनों पक्षों की सहायता की है।

मैं आपसे पूछ सकता हूं कि आप हमारा इस प्रकार तिरस्कार क्यों कर रहे हैं? आपका उद्देश्य सफल हो या न हो, हम निरंतर आपका सम्मान करने का प्रयत्न कर रहे हैं किंतु उसमें हमें तनिक भी सफलता नहीं मिल रही है। आप हमारे आतिथ्य का निरादर क्यों कर रहे हैं। आपसे हमारा न कोई वैर है न कोई झगड़ा।Ó

कृष्ण के चेहरे पर मधुर मुस्कान के साथ सात्विक तेज भी झलका, 'राजन्! मैं काम, क्रोध, लोभ, द्वेष अथवा स्वार्थवश कभी धर्म का त्याग नहीं कर सकता।

किसी के घर का अन्न या तो प्रेमवश ग्रहण किया जाता है अन्यथा किसी आपत्ति में पड़ कर। प्रेम तुम्हारे मन में नहीं है और मैं किसी आपत्ति में नहीं पड़ा हूं।Ó 'आपसे किसने कह दिया कि मेरे मन में प्रेम नहीं है?Ó दुर्योधन का स्वर आदेशात्मक होता जा रहा था।

'पांडव तुम्हारे भाई हैं। वे सर्वगुण संपन्न हैं और सदा धर्म पर चलते हैं। उन्होंने कभी तुम्हारा कोई अहित नहीं किया। तुम सदा ही उनसे अकारण द्वेष करते रहे हो।Ó कृष्ण बोले, 'मेरा पांडवों से ऐसा तादात्म्य है कि मुझे उनसे एकरूप हुआ ही समझो।

जो उनसे प्रेम करता है, वह मुझसे भी प्रेम करता है। जो उनसे घृणा करता है, वह मुझसे भी घृणा करता है। उनका मित्र मेरा मित्र है और उनका शत्रु मेरा शत्रु है।Ó

'इसका क्या अर्थ हुआ?Ó दुर्योधन भौचक रह गया। उसने कृष्ण से इस प्रकार के उत्तर की कभी आशा नहीं की थी। 'इसका अर्थ यह है कि जो द्वेष करता हो, न तो उसका अन्न खाना चाहिए, न उसे अन्न खिलाना चाहिए।

तुम पांडवों से द्वेष करते हो और पांडवों में मेरे प्राण हैं।Ó कृष्ण बोले, 'तुम्हारा यह सारा अन्न दुर्भावना से दूषित है, अत: यह मेरे खाने योग्य नहीं है।Ó

दुर्योधन स्तंभित-सा कृष्ण को देखता रह गया। उसने तो सोचा था कि वे संधि करने आए हैं इसलिए वे सदा उसके अनुकूल रहने का प्रयत्न करेंगे, उसका विरोध करने से बचेंगे पर कृष्ण तो... कृष्ण उठ खड़े हुए, 'मैं जा रहा हूं दुर्योधन! आशा है कल कौरवों की सभा में तुमसे भेंट होगी।Ó

कर्ण, दु:शासन और शकुनि किंकर्तव्यविमूढ़ से बैठे रह गए। उनकी समझ में ही नहीं आया कि कृष्ण इतनी जल्दी सब कुछ समाप्त कर उठकर कैसे चले गए? वे संधि करने आए थे अथवा संधि न होने देने की पृष्ठभूमि बनाने आए थे।

कृष्ण वस्तुत: संधि चाहते हैं या नहीं चाहते? पर यदि वे संधि नहीं चाहते तो वे हस्तिनापुर क्या करने आए हैं? दुर्योधन तो संधि के लिए तैयार ही नहीं है। यदि कृष्ण भी संधि नहीं चाहते तो उनकी इच्छा तो हस्तिनापुर आए बिना ही पूरी हो रही थी। फिर उन्होंने हस्तिनापुर आने का संकट क्यों उठाया?