'वह तो ठीक है किंतु आपको मेरे यहां भोजन करने में क्या असुविधा है?Ó दुर्योधन के मधुर शब्दों और शिष्ट व्यवहार के आवरण के भीतर से भी उसकी खीज प्रतिबिंबित हो रही थी, 'हम समधी हैं। हमारे द्वारा निवेदित अन्न, जल, वस्त्र और शैया को आपने इस प्रकार तिरस्कृत कर दिया है, जैसे आप हमसे कोई संबंध ही नहीं रखना चाहते।Ó