
Gandhi Jayanti : महात्मा गांधी ने सद्गुणों से युक्त मनुष्य निर्माण को बनाया लक्ष्य
प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल, (कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय)
Mahatma Gandhi Jayanti : भारत की आजादी के महानायक महात्मा गांधी, युद्ध और हिंसा से त्रस्त विश्व के उद्धारक हैं। गांधी मनुष्य को बांटने, लड़ाने और उसे युद्ध में धकेलने वाले विचारों के विरोधी थे। इस रूप में जब हम गांधी को देखते हैं, तो एक ऐसे महामानव का चित्र उभरकर आता है, जो सभी आसुरी शक्तियों के खिलाफ नचिकेता के समान निर्भय होकर खड़ा होता है और मृत्यु के देवता से ही अमरत्व का रास्ता प्राप्त करता है। हिंद स्वराज में गांधी इसी रूप में पश्चिम की सभ्यता और दृष्टि को झकझोरते हैं। विश्व को गुलाम बना रही आधुनिक साम्राज्यवादी सभ्यता आंधी की तरह भारत की ओर आई थी, गांधी उसे राक्षसी सभ्यता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। गांधी का यह दर्शन उनको उन ऋषियों में खड़ा करता है, जिन्होंने भौतिकतावादी सभ्यता के संकटों का आकलन करते हुए तप, त्याग और तुष्टि की मानव केन्द्रित सभ्यता को स्थापित किया था। दूसरी ओर यूरोप की युद्धोन्मत्त सत्ता केन्द्रित सभ्यता के समक्ष वे ईसा मसीह के रूप में प्रस्तुत होते हैं, जिसे मैनचेस्टर की मिलों में काम कर रहे बेबस, निरीह, मजदूरों की स्वतंत्रता की भी चिंता है।
गांधी राजनीतिक स्वतंत्रता और आधुनिक सभ्यता के बीच अहिंसा, करुणा, प्रेम, त्याग, सुचिता, स्वच्छता के मूल्यों को सभ्यता की पहचान के रूप में प्रतिस्थापित करने वाले दार्शनिक और प्रयोक्ता हैं। गांधी खुद के जीवन और अपने साथ के लोगों को आश्रम जीवन की प्रयोगशाला में परिवर्तित करते हैं।
गांधी विश्व सभ्यता के लिए एक ऐसा अनुपम उदाहरण हैं, जिनसे यूरोप की सभ्यता दृष्टि का पूर्व में कोई परिचय नहीं था। गांधी की सभ्यता और समाज दृष्टि भारत की अपनी सांस्कृतिक परंपरा, करुणा, मूल्यबोध, परदुख कातरता के साथ संपूर्ण प्रकृति के संरक्षण और संपोषण की सतत, स्थाई और टिकाऊ विकास दृष्टि है। गांधी अहिंसा के हथियार से लडऩे वाला वह बहादुर योद्धा है, जिसका युद्ध व्यक्ति को मारता नहीं, परिवर्तित करता है। हाड़-मांस के पुतले को कोई क्षति न पहुंचाते हुए उसे आसुरी वृत्ति से मुक्त कराकर दैवीय गुणों से युक्त करता है।
सभ्यता को लेकर गांधी की कल्पना बहुत स्पष्ट है। हिंद स्वराज में यह सभ्यता दृष्टि रामराज के रूप में परिलक्षित होती है, जिसमें दैहिक, दैविक और भौतिक त्रिविध तापों से मुक्त समाज भारत में किस प्रकार से बनेगा इसका विधान प्रस्तुत करते हुए हिंसा, लालच, आक्रामकता की अधुनातन प्रवृत्तियों के खात्मे के लिए पूरी शक्ति के साथ खड़े हो जाते हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद विकसित हुई सभ्यता मनुष्य को उत्पादन का साधन और शोषण का लक्ष्य बनाती है। इसकी समाप्ति का आह्वान करते हुए वे एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना सामने रखते हैं, जिसमें व्यक्ति, गांव, जनपद, प्रांत और राष्ट्र की सभी इकाइयां अपने पैरों पर खड़ी हैं। यह आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं है। मनुष्य के जीवन के सभी पक्षों को समेटती और समन्वित करती है। इसीलिए गांधी अहिंसा के व्रत को ताकतवर के हथियार के रूप में और सत्याग्रह को कमजोर की लाठी के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
युद्ध और शांति प्रत्येक स्थिति में सृजनात्मक चेतना से संपन्न मनुष्य और समीक्षात्मक बुद्धि से युक्त समाज महत्त्वपूर्ण है। बोध और कौशल से संपन्न, सद्गुणों से युक्त मनुष्य कैसे निर्मित होगा, यह गांधी की चिंता रही। गांधी की यह भी चिंता रही कि आधुनिकता के प्रचंड प्रवाह में हिंसक हो रही मानवता को अहिंसा और करुणा के रास्ते पर किस प्रकार चलाया जाए। आज गांधी के जाने के 73 वर्ष बाद यह कठिनाई और बढ़ी है। विज्ञान और तकनीक की निर्गुण तथा एकांगी दृष्टि ने व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक सब में लालच और अहंकार का ऐसा विस्तार किया है कि परदुख कातरता तो विस्मृत ही हो गई है, स्वबोध भी समाप्त हो गया है। मानवता की रक्षा और टिकाऊ विकास के लिए गांधी का रास्ता आज भी प्रासंगिक है।
Published on:
02 Oct 2021 09:27 am
बड़ी खबरें
View Allओपिनियन
ट्रेंडिंग
