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अमरीकी राजनीतिक कार्यकर्ता मैल्कम एक्स ने कभी कहा था कि मीडिया धरती की सबसे बड़ी ताकतवर संस्था है क्योंकि वह व्यापक स्तर पर लोगों के दिमाग को नियंत्रित करती है। कुछ पत्रकार इसे अतिशयोक्ति कह सकते हैं, मगर एक अध्ययन की मानें तो यह बात सही है। अध्ययन के मुताबिक, मौजूदा दौर में चौथे स्तंभ यानी मीडिया पाठकों के दिलोदिमाग पर असर डाल रहा है। हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के गैरी किंग और उनके सहयोगियों ने तीन दर्जन से ज्यादा अलग-अलग स्रोतों से ली गई स्टोरी का अमरीकी पाठकों पर पडऩे वाले प्रभावों का आकलन किया है।
इसके लिए स्टोरी को ट्विटर पर भी पोस्ट किया गया। यह शोध ‘साइंस’ में प्रकाशित हुआ। अध्ययन में वॉशिंगटन पोस्ट या फिर न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी न्यूज साइटों की भी स्टोरी शामिल की गई। हालांकि, अध्ययन में इनका हिस्सा बेहद कम ही रहा। फिर भी यह पाया गया कि इन न्यूज साइटों की स्टोरी से ट्विटर पर औरों के मुकाबले 60 फीसदी ज्यादा बहस छिड़ जाती है। ट्वीट मुद्दों पर नजरिए को भी बदलकर रख देते हैं।
मेडिकल रिसर्च में इस तरह की समस्याओं के हल के लिए उसे बेतरतीब तरीके से नियंत्रित परीक्षणों से गुजारा जाता है। इसमें से एक को दवा दी जाती है या इलाज किया जाता है, जबकि दूसरे समूह पर दवाओं के असर को जांचा जाता है। डॉ. किंग ने इसी तरीके का इस्तेमाल खबर पढने के असर के आकलन में भी किया। डॉ. किंग को सबसे पहले अध्ययन में शामिल होने के लिए प्रेस को राजी करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। एक जटिल प्रक्रिया के तहत छप चुकी कई खास स्टोरी की तारीखों में तालमेल बिठाया गया। तीन साल बाद ‘नेशन’, ‘हफिंगटन पोस्ट’ से लेकर चुनिंदा दर्शकों तक अपनी पकड़ बनाने वाले ‘न्यूज टैंको’ समेत 33 न्यूज साइटें इस अध्ययन में हिस्सा लेने को राजी हुईं।
नस्लवाद, प्रवासियों और नौकरियों पर ज्यादा स्टोरी अक्टूबर, 2014 से मार्च, 2016 के बीच थीं। ये स्टोरी नस्लवाद, प्रवासियों और नौकरियों से संबंधित थीं जो लगातार एक हफ्ते से दूसरे हफ्ते तक चली। जिस हफ्ते ये स्टोरी छपी, उसे डॉ. किंग ने ‘ट्रीटमेंट’ का नाम दिया, जबकि दूसरे हफ्ते को ‘नियंत्रण’ कहा गया। यानी पहले हफ्ते में पाठकों ने स्टोरी पढ़ी, जबकि दूसरे हफ्ते उस पर अपनी राय कायम की। विषयों का वर्गीकरण करने वाली कंपनी क्रिमसन हेक्सागन की मदद से ट्विटर चैटर ने मशीन लर्निंग तकनीक से स्टोरी पर किए गए ट्वीट के विषयों और ट्वीट में जाहिर की गई भावनाओं का वर्गीकरण किया। डा. किंग इस कंपनी के सहसंस्थापक हैं।
यह पाया गया कि इन छह दिनों में नियंत्रित हफ्ते के मुकाबले व्यापक विषयों पर 13,000 से ज्यादा पोस्ट हुए। जो दर्शाता है कि पारंपरिक साप्ताहिक में छपे विषयों पर किए गए पोस्ट में तकरीबन 10 फीसदी का इजाफा हुआ। तुलनात्मक तौर पर देखा जाए तो लोकप्रिय टेलीविजन कार्यक्रमों या समारोह पर ज्यादा ट्वीट होते हैं। खास बात यह है कि इन स्टोरी पर किए गए ट्वीट्स से ऐसी बहस छिड़ जाती है, जिनका रुख व्यापक स्तर पर एक ही दिशा में होने लगता है। ये बहस आम पाठकों के नजरिए को ही बदलकर रख देते हैं।
अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान हुई बहस इसका शानदार उदाहरण है। हालांकि, अध्ययन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि ट्विटर पर रहने वाले लोग आम आदमी का प्रतिनिधित्व नहीं करते। शोधकर्ताओं ने पाया कि स्टोरी पाठकों का नजरिया तय करने में मदद करती है। शोध में अलग-अलग वर्ग, लिंग, राजनीतिक लोगों के नजरिये को शामिल किया गया। हैं। यह अध्ययन इस जमीनी हकीकत को बयां करता है कि मीडिया की ताकत में लगातार इजाफा हो रहा है।
साभार : इंडियन एक्सप्रेस

Published on:
17 Nov 2017 12:55 pm
