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एआइ नहीं, शिक्षक ही कर सकते बच्चों का समग्र विकास

फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग अध्ययनों से पता चलता है कि डिजिटल गैजेट्स के अभ्यस्त छात्रों में मस्तिष्क के हिस्से पूरी तरीके से विकसित और सक्रिय नहीं हो पाते। जिसकी वजह से युवा पीढ़ी उपयोगी, प्रासंगिक व शोधपरक पाठ्य-सामग्री को पढऩे और समझने की क्षमता खो रही है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 14, 2026

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डॉ. विनोद यादव, शिक्षाविद्

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा और जीवन शैली में शिक्षक का महत्त्व मानवीयता की ज्ञान समृद्ध-सामाजिक संरचना में विलक्षण है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से युवा-विद्यार्थी बहुत-सी जानकारी मिनटों में हासिल कर सकते हैं। लेकिन सच यह भी है कि एआइ तकनीक संस्कार प्रदान नहीं कर सकती। एआइ के सहारे युवा पीढ़ी में पनप रहे असामाजिक व्यवहार व भ्रष्ट आचरण पर लगाम नहीं लगाई जा सकती। यानी आत्म-विवेचन, पारस्परिक सहयोग, सौहार्द, बंधुत्व, उदारता, त्याग-भावना आदि मूल्यों की जगह एआइ-गुरु नहीं ले सकता। आज एआइ पर सब कुछ सुलभ है, यदि कुछ दुर्लभ है तो वह है- विद्यार्थी के समग्र व्यक्तित्व विकास की संभावना। इंटरनेट पर क्या उसके लिए उपयोगी है, क्या अनुपयोगी है? इतना विवेक विद्यार्थी के अंदर अपने इनोवेटिव मैथड से कर्तव्यनिष्ठ और सदाचारी शिक्षक ही जागृत कर सकता है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देश की समृद्धि का आधार
सोशल नेटवर्किंग के इस दौर में शिक्षण संस्थानों का बाजारीकरण हो गया है और शिक्षक को प्रोफेशनल के तौर पर देखे जाने की वजह से मौजूदा दौर को नैतिक मूल्यों व इनोवेटिव आइडियाज के बिखराव का संक्रमण-काल माना जा रहा है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देश की समृद्धि का आधार है। इसके तीन प्रमुख पहलू हैं- इनपुट, प्रोसेसिंग और आउटकम। इनपुट में कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक, अनुशासित विद्यार्थी, समृद्ध लाइब्रेरी और बेहतर शैक्षणिक माहौल शामिल हैं। प्रोसेसिंग में इनोवेटिव टीचिंग मैथड, छात्रों की रचनात्मक सोच तथा विद्यालयों का प्रभावी संचालन आता है। वहीं आउटकम का लक्ष्य आदर्श विद्यार्थी तैयार करना और उनमें संस्कारों का विकास करना है। भारत युवाओं का देश है। मान्यता है कि नवयुवक देश के कर्णधार होते हैं। युवाओं के व्यक्तित्व एवं समग्र विकास के लिए बौद्धिक प्रखरता के साथ नैतिक चेतना भी जरूरी है। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने लिखा है, ‘नैतिकता के अभाव में बुद्धि से श्रेष्ठ व्यक्ति सबसे खतरनाक अपराधी बन सकता है।’ सच्ची शिक्षा का उद्देश्य बुद्धि और चरित्र, दोनों का विकास करना है। डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार शिक्षक ऐसा रचनात्मक और ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, जो विद्यार्थियों की आंतरिक क्षमताओं को निखारकर उनकी मानसिक योग्यता को नया आयाम दे सके।

मस्तिष्क के हिस्से पूरी तरीके से विकसित नहीं हो पाते
आज के दौर में परंपरागत नोट्स रटवाकर विद्यार्थियों को अंकों के पीछे दौडऩे का धावक तो बनाया जा सकता है, किंतु आत्मविश्वास को नहीं जगाया जा सकता। यह तभी संभव है, जब शिक्षक आत्मानुशासन व नैतिकता का रोलमॉडल बनकर कक्षा में प्रवेश करे। आमतौर पर कोई भी समाज या देश तरक्की के रास्ते पर तभी आगे बढ़ता है, जब वहां की शिक्षा गुणवत्ता से परिपूर्ण हो। फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग अध्ययनों से पता चलता है कि डिजिटल गैजेट्स के अभ्यस्त छात्रों में मस्तिष्क के हिस्से पूरी तरीके से विकसित और सक्रिय नहीं हो पाते। जिसकी वजह से युवा पीढ़ी उपयोगी, प्रासंगिक व शोधपरक पाठ्य-सामग्री को पढऩे और समझने की क्षमता खो रही है। व्यक्ति के सभ्य आचरण का स्तर उसकी बौद्धिक क्षमता से सदैव ऊंचा होता है। भारतीय समाज में यह अपेक्षा की जाती है कि शिक्षक भावप्रवण हो, उचित प्रशिक्षण प्राप्त कर्मठ व्यक्ति हो जिसकी प्रतिबद्धता अपने व्यवसाय, बच्चों, समाज एवं देश के प्रति समर्पित हो।