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हाल ही के दिनों में देश के कई हिस्सों में यह देखने में आया है कि अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला महंगे प्राइवेट स्कूलों की बजाय सरकारी स्कूलों में कराने को प्राथमिकता देने लगे हैं। सरकारी स्कूलों में संसाधनों के साथ शिक्षण व्यवस्था बेहतर हो तो इस रुझान को और बढ़ाया जा सकता है। बिहार सरकार ने इसी दिशा में पहल करते हुए सरकारी स्कूलों में कार्यरत नियमित और संविदा शिक्षकों को प्राइवेट कोचिंग सेंटर से जुडऩे व अपने स्तर पर ट्यूशन पढ़ाने पर रोक लगा दी है। ऐसा करते हुए पाए जाने पर इसे सेवा शर्तों का उल्लंघन मानते हुए संबंधित शिक्षक पर विभागीय कार्रवाई, वेतन रोकने व निलंबन तक की सख्ती अमल में लाई जाएगी। लंबे समय से यह शिकायत मिल रही थी कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक स्कूल समय के बाद प्राइवेट कोचिंग में सेवाएं दे रहे हैं।
आमतौर परसरकारी स्कूलों में अपेक्षाकृत अधिक अनुभवी व प्रशिक्षित शिक्षक होते हैं। जिन सरकारी शिक्षण संस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है, वहां बच्चे अच्छा रिजल्ट भी ला रहे हैं। केंद्रीय विद्यालय व नवोदय विद्यालय इसके उदाहरण हैं। लेकिन जहां अनदेखी की जाती है वहां कई मामलों में सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षक सेवा शर्तों का उल्लंघन करते हुए कोचिंग संस्थानों अथवा निजी शिक्षण संस्थानों से जुड़ जाते हैं या फिर निजी स्तर पर ट्यूशन शुरू कर देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सरकारी स्तर पर समुचित निगरानी होती ही नहीं। जाहिर तौर पर सरकारी स्कूल में पढऩे वाले बच्चे इन्हीं शिक्षकों के बेहतर अध्यापन से वंचित रह जाते हैं क्योंकि उनका सारा ध्यान निजी क्षेत्र की ओर रहने लगा है। हैरत की बात यह है कि सरकारी स्कूल में जिस शिक्षक की कक्षा में बच्चों का नामांकन ही नाम मात्र का होता है वही शिक्षक कोचिंग सेंटर पर जाता है तो ऊंची फीस देकर पढऩे वाले बच्चों की भीड़ नजर आती है। यह ऐसी विषमता है जो शिक्षा को समान शिक्षा का मंच बनने के बजाय वर्गीय विभाजन का औजार बना देती है। निजी कोचिंग व प्राइवेट ट्यूशन में अपनी ऊर्जा झोंकने वाले शिक्षकों के लिए सरकारी स्कूलों में पढ़ाना औपचारिकता ही बनकर रह जाता है।
इस बदहाली की वजह सरकारें ही हैं जो निजी शिक्षा तंत्र को बढ़ावा देते हुए अपने ही संस्थानों की अनदेखी करती हैं। चिंता इस बात की भी है कि समुचित सुविधाएं जुटाना तो दूर, सरकारें नियम-कायदे बनाकर इन्हें लागू करना ही भूल जाती हैं। आज अभिभावक भी चाहते हैं कि बच्चों की शिक्षा पर पडऩे वाले भार को कम किया जाए। यह तभी संभव है जब सरकारी स्कूलों की दशा सुधारी जाए। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों में ट्यूशन की प्रवृत्ति रोकने के लिए सेवा शर्तों को सख्ती से लागू कराना होगा। यह भी ध्यान में रखना होगा कि समुचित निगरानी भी हो अन्यथा ऐसे आदेश कागजी फरमान बनकर रह जाएंगे।
Published on:
14 Jun 2026 08:41 pm
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