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मेंटल हेल्थ: नशे में ड्राइविंग अपराध के साथ मानसिक-सामाजिक त्रासदी भी

—डॉ. शीतल नायर (लेखक साइकोथैरेपिस्ट व टेड एक्स स्पीकर हैं)

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Apr 21, 2025

हाल ही भारत की सड़कों पर नशे में ड्राइविंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। ये हादसे केवल शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि गांवों की गलियों तक पहुंच चुके हैं। भले ही गांव-कस्बों की घटनाएं, शहरों के हादसों की तरह अखबारी सुर्खियां नहीं बटोर पातीं। राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ में एक शराबी ठेकेदार की तेज रफ्तार एसयूवी ने दोपहिया पर सवार एक परिवार को कुचल दिया, जिसमें केवल एक बच्चा बचा। मध्यप्रदेश के सागर में नशे में धुत ट्रक चालक ने एक शिक्षिका की जान ले ली।

उत्तर प्रदेश के बस्ती में एक मेले के दौरान जीप भीड़ में घुसी, जिससे दो की मौत हो गई। गुजरात के वडोदरा में नशे में चूर एक छात्र ने कई वाहनों को टक्कर मारी और शराब पीने के लिए चिल्लाता रहा, जबकि लोग कराह रहे थे। ये घटनाएं सिर्फ शराब की नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की उस समस्या की ओर इशारा करती हैं, जो गहरे आघात, हताशा, समूह की स्वीकृति और सांस्कृतिक सोच से पैदा हुई है। थ्योरी ऑफ प्लांड बिहेवियर बताती है कि व्यक्ति का व्यवहार उसके रवैये और सामाजिक मान्यताओं से प्रभावित होता है। 

कॉग्निटिव डिसोनेंस थ्योरी समझाती है कि कैसे ये चालक शराब पीकर वाहन चलाने को सहयात्री दोस्तों के बीच इस तर्क से अपने व्यवहार को उचित ठहराते हैं- 'पहले भी किया है, कुछ नहीं हुआ' या 'पास ही तो जाना है।' सेल्फ-मेडिकेशन थ्योरी बताती है कि लोग अक्सर अनसुलझे मानसिक तनाव, चिंता या अवसाद से उबरने के लिए शराब का सहारा लेते हैं। कई लोग मानसिक अवसाद के चलते आत्महत्या कर लेते हैं और सैकड़ों चुपचाप संघर्ष करते हुए शराब की ओर झुक जाते हैं। 

मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखा प्रभावित क्षेत्र बुंदेलखंड में लोग आर्थिक परेशानियों की हताशा में शराब का सेवन करते हैं। गुजरात में शराब पर कानूनी रूप से प्रतिबंध है, लेकिन लगभग हर जगह यह अवैध रूप से उपलब्ध है। दाहोद और गोधरा में शराब माफिया फल-फूल रहे हैं और कानून मौन है। मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में महुआ से बनी शराब का सेवन पारंपरिक रूप से किया जाता है। युवा इसके दुष्प्रभावों को समझे बिना इसका सेवन करते हैं। नशे में ड्राइविंग के हादसे का अंत दुर्घटना स्थल पर नहीं होता। इसमें एक मां अपना बच्चा खो देती है। एक बच्चा अनाथ हो जाता है। एक विधवा को जिंदगी फिर से शुरू करनी पड़ती है। इन हादसों का असर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी होता है। दुर्भाग्यवश, ऐसे पीडि़तों के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता लगभग नहीं के बराबर है। वे अकेले अपना दुख झेलते हैं। कई पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, चिंता या अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं।

प्रत्येक बड़े हादसे के बाद हम काफी खोखले भाषण सुनते हैं। अब हमें यह पूछना चाहिए कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता क्यों नहीं है? शराब की लत  और मानसिक संकट को जोड़कर देखने वाली नीति कब बनेगी? पीडि़तों के लिए काउंसलिंग और पुनर्वास की व्यवस्था क्यों नहीं है? सबसे जरूरी - क्या हम नशे में ड्राइविंग को सिर्फ 'अपराध' समझते रहेंगे या इसे एक सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य आपदा भी मानेंगे? जब तक हम सड़कों पर होने वाली इन त्रासदियों के पीछे के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों को नहीं समझेंगे, तब तक ऐसी त्रासद और दु:खद कहानियां घटती रहेंगी। 'नशा मुक्त भारत'का स्कूलों की दीवारों पर सिर्फ पोस्टर क्यों है, एक असली आंदोलन क्यों नहीं? बार-बार नशे में पकड़े गए चालकों को अनिवार्य पुनर्वास या काउंसलिंग के लिए क्यों नहीं भेजा जाता? ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण में आरटीओ (क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय) मनोवैज्ञानिक जांच को क्यों शामिल नहीं करते? हम लक्षणों का इलाज करते हैं, कारणों की अनदेखी करते हैं। हमें इस समस्या से निपटने के लिए एक ग्रामीण-प्राथमिकता वाला, जन-केंद्रित और संस्कृति-संवेदनशील मॉडल चाहिए।

हर जिला अस्पताल और तालुका पीएचसी में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर नियुक्त हो, ड्राइविंग लाइसेंस कोर्स में भावनात्मक जागरूकता और मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा शामिल की जाए। स्थानीय बोलियों (मारवाड़ी, बुंदेली, गुजराती, अवधी) में सहायता हेल्पलाइन शुरू की जाए। पुलिस और ट्रैफिक वार्डनों को मानसिक स्वास्थ्य की प्राथमिक प्रतिक्रिया में प्रशिक्षित किया जाए। हमें समस्या से समाधान, सजा से रोकथाम की ओर बढऩा चाहिए।