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चुप्पी पर चीखतीं चिंताएं

सर्वे के मुताबिक जीएसटी से फायदा बताने वालों से अधिक नुकसान बताने वाले हैं। नोटबंदी को अच्छा बताने वाले अब सिर्फ 15 प्रतिशत हैं और बुरा बताने वाले 73 प्रतिशत।

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Sunil Sharma

Aug 24, 2018

PM narendra modi

Petrol Diesel price

- योगेंद्र यादव, विश्लेषक

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण राजनीतिक होता है, होना भी चाहिए। यह भाषण प्रधानमंत्री के लिए एक मौका है देश की जनता को अपने राजकाज का लेखा-जोखा देने का। इसे लेकर कुछ विपक्षी नेता और टीवी एंकर एतराज कर रहे थे, लेकिन मेरी चिंता कुछ और थी। भाषण सुनते वक्त जो सवाल बार-बार मेरे जहन में कौंध रहा था, वह था कि क्या लाल किले और चांदनी चौक में फासला बढ़ रहा है, क्या प्रधानमंत्री अपने भाषण में उन सवालों का जवाब दे रहे हैं जो जनता के मन में हैं?

कुछ ही दिन बाद मुझे एक प्रमाण मिल गया जिसने मेरे संदेह को और भी पुख्ता कर दिया। ‘इंडिया टुडे’ और ‘आज तक’ ने कारवी एजेंसी के साथ अपना छमाही राष्ट्रीय जनमत सर्वेक्षण जारी किया। देशभर में बारह हजार के एक प्रतिनिधि सैंपल से बात कर यह ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे हर छह महीने बाद हमारे सामने जनमत का आईना पेश करता है। इस बार का सर्वेक्षण यह प्रमाणित करता है कि देश के शासकों के मन की बात और जनता के मन की बात में कितना बड़ा फासला है।

सर्वे के मुताबिक जनता की सबसे बड़ी चिंता बेरोजगारी है। पिछले एक साल में बेरोजगारी को देश की सबसे बड़ी समस्या बताने वालों की संख्या 27 फीसदी से बढक़र 34 फीसदी हो गई है। पूछे जाने पर कि क्या सरकार के प्रयासों से पिछले चार सालों में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं, सिर्फ 14 फीसदी ने सकारात्मक उत्तर दिया जबकि 60 फीसदी ने कहा कि रोजगार की हालत पहले से खराब हुई है।

यही नहीं, जब इस सर्वे में लोगों से मोदी सरकार की सबसे बड़ी असफलता बताने को कहा गया तो भी नंबर एक पर बेरोजगारी का ही नाम आया। यानी कि सिर्फ नौजवान ही नहीं, पूरा देश बेरोजगारी के सवाल पर चिंतित है। लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने इस चिंता को पहचाना था और दो करोड़ नौकरियां प्रतिवर्ष देने का वादा किया था। वो दिन है और आज का दिन, दो करोड़ नौकरी का जिक्रभी अब प्रधानमंत्री नहीं करते। लाल किले की प्राचीर से अपने मौजूदा कार्यकाल के अंतिम भाषण में उन्होंने देश की सबसे बड़ी चिंता पर एक शब्द भी नहीं कहा।

दूसरी सबसे बड़ी चिंता है महंगाई। यह चिंता भी पिछले एक साल में 19 फीसदी से बढक़र 24 फीसदी हो गई है। इस पर भी प्रधानमंत्री चुप्पी साध गए। पूछे जाने पर कि पिछले चार साल में महंगाई का क्या हाल है, 70 फीसदी कहते हैं कि महंगाई बढ़ी है और सिर्फ 11 फीसदी कहते हैं कि महंगाई में कमी आई है। आम आदमी मुद्रास्फीति की बात नहीं करता। उसकी शिकायत है कि जरूरत की वस्तुएं उसकी जेब से बाहर हो गई हैं। वह सिर्फ बाजार में भाव की शिकायत नहीं कर रहा, बल्कि अपनी आय में कमी को दर्ज कर रहा है। आर्थिक स्थिति बदतर बताने वालों का अनुपात भी पिछले एक साल में 13 फीसदी से बढक़र 25 फीसदी हो गया है। जीएसटी से फायदा बताने वालों से ज्यादा संख्या नुकसान बताने वालों की है। नोटबंदी को अच्छा बताने वाले अब सिर्फ 15 प्रतिशत हैं और बुरा बताने वाले 73 प्रतिशत। जाहिर है प्रधानमंत्री नोटबंदी पर भी चुप्पी साध गए।

जनता की तीसरी सबसे बड़ी चिंता भ्रष्टाचार की है। पिछले चार साल में सरकार की कारगुजारी से जनता संतुष्ट नहीं है। सिर्फ 23 फीसदी लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार घटा है, 28 फीसदी मानते हैं कि वह जस का तस है और 48 फीसदी कहते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है। समर्थकों का कहना है कि चार साल में कोई घोटाला नहीं हुआ, पर विरोधियों का कहना है कि सरकार ने सीएजी, सतर्कता आयुक्त और न्यायपालिका तक पर पहरे डाल रखे हैं तो कोई घोटाला बाहर कैसे आएगा। बिरला सहारा डायरी का मामला चुपचाप दफन हो गया और अब जबकि फ्रांस से रफाल विमान खरीद में बड़े घोटाले का आरोप लगा तो भी प्रधानमंत्री ने पूरा सच सामने रखने का मौका होने के बावजूद ऐसा नहीं किया।

चौथी बड़ी चिंता किसानों की आत्महत्या और कृषि के संकट की है। इस सवाल पर प्रधानमंत्री खूब बोले। लेकिन अफसोस, जितना बोले अर्धसत्य बोले। उन्होंने फिर दोहराया कि किसानों को पूरी लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य दे दिया गया, जबकि सच यह है कि सरकार ने आंशिक लागत पर डेढ़ गुना दाम घोषित किया। प्रधानमंत्री ने 99 बड़ी सिंचाई योजनाओं का जिक्र किया, पर यह नहीं बताया कि आधी से ज्यादा समय सीमा के बाद भी अधूरी पड़ी हैं; कृषि निर्यात बढ़ाने का संकल्प जताया, पर अपने शासनकाल में कृषि निर्यात का गिरना नहीं कबूला; किसानों की आय दोगुनी करने का जुमला दोहराया, पर यह नहीं बताया कि पिछले चार साल में किसानों की आय वास्तव में कितनी बढ़ी है।

टीवी पर इस सर्वे की सारी चर्चा सिर्फ इस पर सिमट गई कि बीजेपी को कितनी सीटें मिल सकती हैं, किस गठबंधन की जरूरत होगी और महागठबंधन की क्या संभावनाएं हैं। लेकिन मुझे चिंता है कि लाल किले के सरकारी बोल और चांदनी चौक में खड़ी जनता के कानों में फासला कहीं बढ़ता तो नहीं जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के बाद उनकी बातों से ज्यादा जनता को उनकी चुप्पी याद रहे?