प्रो. संजय भारद्वाज
एशियाई देशों के मामलों के
जानकार
चीन ने मध्य तिब्बत क्षेत्र में यार्लुग नदी पर जिसे भारत में
ब्र±मपुत्र के नाम से जानते हैं, जलविद्युत परियोजना के लिए बड़ा बांध बनाकर, वहां
से बिजली उत्पादन शुरू कर दिया है। समुद्र तल से 3300 मीटर की ऊंचाई पर बना यह बांध
दुनिया में सर्वाधिक ऊंचाई पर है। यह बांध भारतीय सीमा से केवल 550 किलोमीटर की
दूरी पर है। चीन भले ही इसे व्यापारिक उद्देश्य से जोड़कर देखने की बात कहता हो
लेकिन व्यापारिक उद्देश्य के साथ वह इसका रणनीतिक इस्तेमाल नहीं करेगा, पुराना
इतिहास देखते हुए इस बात की कोई गारंटी भी नहीं है।
क्या कहता है चीन
चीन
अपनी आबादी और उसकी रोजी-रोटी को लेकर बेहद चिंतित है । इसीलिए उसने दो बड़ी
परियोजनाएं वन बेल्ट वन रूट और मेरिटाइम सिल्क रूट के साथ मध्य तिब्बत में
जलविद्युत परियोजना की शुरूआत की। शुरूआत में तो उसका इरादा ब्र±मपुत्र नदी के जल
का अधिकाधिक इस्तेमाल अपने लोगों के लिए करने का था लेकिन तकनीकी रूप से ऊंचाई की
ओर नदी का बहाव ले जाना संभव नहीं हो सका इसलिए उसने अपना यह इरादा छोड़कर
जलविद्युत परियोजना पर ही ध्यान केंद्रित किया। चीन के मुताबिक इस परियोजना से न
केवल तिब्बत के इलाके में बिजली की कमी पूरी की जा सकेगी बल्कि इसका लाभ औद्योगिक
विकास के लिए भी होगा।
आंकड़े बताते हैं कि इस परियोजना की लागत करीब1.5 अरब अमरीकी
डॉलर है और इससे सालाना 2.5 अरब किलोवाट बिजली का उत्पादन किया जा सकेगा। चीन कहता
है कि यह उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और यह उसके लिए विकास के द्वार खोलती है।
इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात यह भी है, चीन के मुताबिक समूचा बांध उसकी अपनी तकनीक
से बना है और यहां से बिजली उत्पादन के लिए वह पानी का संग्रहण नहीं करेगा। वह पानी
के बहाव को निरंतर बनाए रखेगा। यही उसकी तकनीक की खासियत है। वह ब्र±मपुत्र के
प्राकृतिक बहाव को स्वाभाविक बनाये रखेगा, उसमें किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की
जाएगी।
चीन की नीतिगत सोच
जिस तरह भारत में नदियों का आर्थिक, सामाजिक और
धार्मिक महत्व है लेकिन चीन इसके विपरीत पानी को उपभोक्ता वस्तु मानकर उसके अधिकतम
इस्तेमाल के बारे में ही सोचता है। यहां तक कि वह उसके पर्यावरण महत्व की ओर भी
ध्यान नहीं देता। पानी को लेकर उसकी सोच उपभोक्तावादी ही है। हम जानते हैं कि बौद्ध
परंपरा और आधुनिकता को लेकर मध्य मार्ग अपनाते हैं लेकिन चीन बौद्ध देश होने के
बावजूद इन सिद्धांतों को क्रियान्वयन में नहीं उतारता। उसकी नीतियां भौतिकतावादी और
आक्रामक हैं। उसकी आध्यात्किम सोच विकास की नीति के मामले मे आड़े नहीं आती।
वह
केवल उपभोग की बात जानता है। प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर उसका नजरिया
अन्य देशों से बिल्कुल अलग है। वह अपनी आबादी को ध्यान में रखते हुए फैसले करता है
और इसके लिए वह पर्यावरण की चिंता नहीं करता। यही वजह है कि उसके तुरत-फुरत में
ब्र±मपुत्र पर बांध बनाने का फैसला लिया और उसे क्रियान्वित भी कर डाला। एक बहुत
बड़ा कारक यह भी है कि जिस तरह से भारतीय लोकतंत्र में किसी परियोजना को लेकर विरोध
होते हैं और उसके लिए पर्यावरण संबंधी अनुमतियां लेनी पड़ती हैं, उस तरह का विरोध
और औपचारिकताएं चीन में नहीं होते। एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण कारक यह भी है कि
चीन में उच्च पदों पर जितने लोग आसीन हुए पिछले दो-ढाई दशकों में उनकी पृष्ठभूमि
इंजीनियरिंग रही है। इसीलिए वहां इमारतों, पुलों, बांधों, सड़कों आदि के निर्माण पर
पूरा जोर रहता है।
पानी के उपयोग पर अधिकार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पानी के
उपभोग को लेकर कई प्रकार की संधियां हुई हैं और उनमें संयुक्त राष्ट्र की पानी के
उपभोग को लेकर हुई 1997 की संधि का ध्यान रखा जाता है। इसमें कहा गया है कि जब कोई
नदी दो या इससे अधिक देशों में प्रवाहित होती है तो जिस देश में पानी का बहाव है,
वहां उसके पानी पर उस देश का समान अधिकार है।
इस आधार पर पानी के बहाव को जानबूझकर
नहीं रोका जाना चाहिए। बहाव के स्तर के आंकड़ों को साझा किया जाना चाहिए। लेकिन
परेशानी की बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र की इस संधि पर न केनव भारत ने बल्कि चीन
ने भी हस्ताक्षर नहीं किये हैं। इस परिस्थिति में चीन जब चाहे पानी के बहाव को रोक
सकता है और जब चाहे इस बहाव को तीव्र कर सकता है। बांध बनाने से जल प्रबंधन के
मामले में हम उससे पिछड़ गए हैं। अब तक हम उससे सीमा विवाद और व्यापारिक मुद्दों पर
बात को ही प्राथमिकता देते आए हैं लेकिन अब हमें जल प्रबंधन को लेकर बातचीत को
प्राथमिकता से उठाना होगा।
चीन का जल संकट
1. बढ़ती आबादी
चीन
बढ़ती आबादी की जरूरत को पूरा करना चाहता है।चीन के 886 शहरों में से 110 शहर पानी
के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं।
2. बढ़ता औद्योगिकरण
बढ़ते हुए
औद्योगिकीकरण के साथ-साथ कृषि आधारित जरूरतों को पूरा करने के लिए चीन को पानी
चाहिए।
3. बढ़ता मरूस्थल
चीन इस पानी से अपने शिनजियांग, जांझू और
मंगोलिया के इलाकों के मरूस्थल में तब्दील होने की रफ्तार को रोकना चाहता
है।
अटके हमारे प्रोजेक्ट
1. एनएचपीसी दिबांग प्रोजेक्ट : 3000 मेगावाट
स्वीकृत-2007, बांध की उच्चाई 10 मीटर कम करके नई डीपीआर बनाने का आदेश
2.
केएसके दिब्बिन प्रोजेक्ट : 120 मेगावाट स्वीकृत-2009, पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति
का इंतजार
3. जेपी लोेअर सियांग प्रोजेक्ट : 2700 मेगावाट स्वीकृत-2010,
मंत्रिमंडल समूह की अनुमति का इंतजार
4. एसएनईएल नेफ्रा प्रोजेक्ट : 120 मेगावाट
स्वीकृत-2011, वन भूमि के उपयोग की अनुमति का इंतजार
5. भीलवाड़ा नयामजंग छू
प्रोजेक्ट : 780 मेगावाट स्वीकृत-2010, द्धितीय चरण की वन विभाग की अनुमति का
इंतजार
6. एनएचपीसी तवांग स्टेज-1 प्रोजेक्ट : 600 मेगावाट स्वीकृत-2010,
पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
7. टीएचपीपएल टाटो-2 प्रोजेक्ट : 700 मेगावाट
स्वीकृत-2012, पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
8. एनएचपीसी तवांग स्टेज : 2
सेन्ट्रल प्रोजेक्ट-8000 मेगावाट स्वीकृत-2011, द्धितीय चरण की पर्यावरणीय अनुमति
का इंतजार
9. एथेना देमव लोअर प्रोजेक्ट : 1750 मेगावाट स्वीकृत-2011, फाइनल
क्लोजर अभी बाकी
10. जेपी हीरोंग प्रोजेक्ट : 500 मेगावाट स्वीकृत : 2013, वन
एवं पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
11. ईएचईपीसीएल ईटालिन प्रोजेक्ट : 3097
स्वीकृत-2013, अनुमति मिलना अभी बाकी
12. जीएमआर तलोंग लोंडा प्रोजेक्ट : 225
मेगावाट स्वीकृत-2013, पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
े13. एनडीएससीपीएलएस नायिंग
प्रोजेक्ट : 1000 मेगावाट स्वीकृत-2013, पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
14.
एसएचपीपीएल सियोम प्रोजेक्ट : 1000 मेगावाट स्वीकृत-2013, पर्यावरणीय अनुमति का
इंतजार
15. कालाई-2 प्रोजेक्ट : 12000 मेगावाट स्वीकृत-2015, पर्यावरणीय अनुमति
का इंतजार
16. एचएचपीपीएल हियो प्रोजेक्ट : 240 मेगावाट स्वीकृत-2015,
पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
17. एसएचपीपीएल टाटो-1 प्रोजेक्ट : स्वीकृत-2015,
पर्यावरणीय अनुमति का इंतजार
(सभी परियोजनाएं अरूणाचल प्रदेश
में)
...तो इस तरह दबाएगा चीन हमें
ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बड़े बांध
से पानी छोड़ने व रोकने का नियंत्रण चीनी हाथों में हो जाएगा। ऎसे में वह अपनी
सुविधानुसार पानी के बारे में फैसला करेगा। मसलन बरसाती मौसम में वह ज्यादा पानी
छोड़ेगा। यह अधिक पानी न केवल भारत बल्कि बांग्लादेश में भी बाढ़ के खतरे बढ़ाएगा।
ऎसा करने से ब्रह्मपुत्र नदी में जल का प्रवाह कभी भी प्रभावित हो सकता है। भारत और
बांग्लादेश दोनों ही देशों में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाएगा। ब्रह्मपुत्र के
प्रवाह के साथ छेड़छाड़ का विपरीत असर असम और अरूणाचल प्रदेश समेत पूरे उत्तर-पूर्व
क्षेत्र में भी पड़ेगा । इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
बाढ़ का
खतरा
कुल मिलाकर यह माना जा रहा है कि नीचे रहने वाली आबादी तो चीन के बांध
अधिकारियों के रहमोकरम पर होकर रह जाएगी जो पानी छोड़कर कभी भी बाढ़ के हालात पैदा
कर सकते हैं तो कभी जलापूर्ति रोक कर संकट खड़ा कर सकते हैं।
उर्वरा क्षमता
घटेगी
बांग्लादेश पर सबसे असर करने वाला जो कारक है वह यह है कि नदी के
जलप्रवाह के साथ साल-दर-साल आने वाले खनिज-लवण की आवक करीब-करीब थम सी जाएगी। जमीन
की उर्वरा क्षमता को ब्ाढ़ाने वाले पानी की आवक थम जाएगी। ऎसा इसलिए भी कहा जा रहा
है क्योंकि भारत के बाद बांग्लादेश ही है जो नदी के प्रवाह के सबसे निचले हिस्से पर
हैं। ऎसे में खनिज लवण व मिट्टी दोनों उसके हिस्से में ज्यादा आने वाली थीं। मिट्टी
पैदावार बढ़ाने वाली होती है तो सीधे-सीधे आर्थिक विकास भी होता है। ऎसा नहीं होने
पर पानी का खारापन और बढ़ेगा और मछली पालन पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
पारदर्शिता
नहीं
वष्ाü 2013 में जो अंतरमंत्रालय विशेष्ा समूह बनाया गया उसमें यह समझौता
किया गया था कि चीन, पारदर्शिता अपनाते हुए पानी से सम्बन्धित आंकड़ों का
आदान-प्रदान तो करेगा। हिमाचल प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश में पिछले वषोंü में आई
बाढ़ का कारण यही रहा कि चीन ने अपनी परियोजनाओं से पानी छोड़ने के सम्बन्ध में
भारत को पूर्व चेतावनी जारी नहीं की थी। नदियों का पानी साझा करने के लिए भारत को
चाहिए कि वह इस बारे में चीन को बातचीत के लिए तैयार करे।
इस बातचीत में बांग्लादेश
को भी शामिल करना होगा। इसका कारण यह है कि ब्र±मपुत्र पर बनने वाले बांधों से भारत
के साथ-साथ बांग्लादेश, लाओस, थाईलैंड व वियतनाम जैसे देशों को भी नुकसान होगा।
संयुक्त राष्ट्र संधि की शर्तो को चीन भी स्वीकार करे इसके लिए भारत को उस पर दबाव
बनाना होगा। इसके लिए भारत संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच का भी इस्तेमाल
कर सकता है। ऎसे मंच से उठने वाले दबाव के आगे चीन संधि को मानने को मजबूर होगा ही
ऎसा मानना चाहिए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच से होने वाली आलोचना को चीन के लिए
दरकिनार करना आसान नहीं होगा।