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राष्ट्रीय सुरक्षा हर संधि से सर्वोपरि

- संयुक्त राष्ट्र दुनिया के परमाणु हथियार संपन्न देशों से संधि करना चाहता है।- दुनिया से परमाणु हथियारों को खत्म करने के लिए ये संधि की जा रही है।- लेकिन इस संधि के लिए दुनिया के कई देश अभी सहमत नहीं हो रहे हैं।

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राष्ट्रीय सुरक्षा हर संधि से सर्वोपरि

राष्ट्रीय सुरक्षा हर संधि से सर्वोपरि

संयुक्त राष्ट्र की परमाणु हथियार निषेध संधि 22 जनवरी से लागू हो गई है, लेकिन परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का सपना जल्द साकार होता नहीं लगता। इसमें अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग प्रावधान भेदभाव की तरफ इशारा करते हैं। इसलिए 1945 में भारी तबाही झेल चुका जापान भी संधि से दूर है। भारत समेत परमाणु सम्पन्न नौ देशों ने भी इस संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं। नाटो के 30 देश भी संधि में शामिल नहीं हुए। ऐसे में इस अंतरराष्ट्रीय संधि का औचित्य सवालों के घेरे में है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में संधि को जुलाई 2017 में मंजूरी मिल गई थी। तीन साल से इस पर समर्थन जुटाने की कवायद चल रही थी। वांछित कामयाबी नहीं मिली। भारतीय विदेश मंत्रालय ने संधि लागू होने के बाद साफ कहा कि भारत सार्वभौमिक, गैर-भेदभावपूर्ण और सत्यापन योग्य परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वह इस संधि का हिस्सा नहीं है। भारत के साथ अमरीका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजरायल भी शुरू से संधि का विरोध कर रहे हैं। अमरीका ने 1945 में जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे। इस हमले में लाखों लोग मारे गए थे। कहा जा रहा है कि नई संधि का मकसद ऐसे परमाणु हमलों पर लगाम लगाना है।

जब परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) 1970 से प्रभावी है, तो नई संधि की जरूरत क्यों महसूस हुई? पांच दशक के दौरान एनपीटी का कितना पालन हुआ? अगर एनपीटी पर दस्तखत करने वाले अमरीका तथा रूस ने परमाणु हथियारों की होड़ को लेकर संयम बरता होता, तो शायद आज अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य कुछ और होता। दुनिया में 1945 के बाद जो दो हजार से ज्यादा ज्ञात परमाणु परीक्षण हुए, उनमें से 85 फीसदी अमरीका और रूस ने किए। अमरीका के 1,332 और रूस के 715 परमाणु परीक्षणों पर ज्यादा हल्ला नहीं हुआ। भारत के चंद परमाणु परीक्षण पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की भृकुटियां तन जाती हैं।

दरअसल, भारत की परमाणु नीति का मकसद कई साल तक सामाजिक-आर्थिक विकास रहा। परमाणु शक्ति का इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन में होता रहा। लेकिन कुछ साल से पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के रुख को देखते हुए वह अपनी इस शक्ति के विकल्पों को खुला रखना चाहता है। किसी अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल होकर वह अपने सामरिक हितों की अनदेखी नहीं कर सकता। इसीलिए भारत इस बात पर जोर दे रहा है कि परमाणु हथियारों पर अंकुश और पूर्ण निरस्त्रीकरण के लिए क्षेत्रीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोशिशें होनी चाहिए। चीन ने 1964 में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दक्षिण एशिया में जो सामरिक असंतुलन पैदा किया, उसके बाद ही भारत को 1974 में पहला परमाणु परीक्षण करना पड़ा था। अब जबकि पाकिस्तान भी परमाणु क्लब में है, भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि से बढ़कर है।