सामयिक : रूस के साथ मजबूत रिश्ते की जरूरत

भारत ने पहले से ही आत्मनिर्भर भारत के आर्थिक पहलुओं पर बड़ी भूमिका के लिए रूस को आमंत्रित किया हुआ है। भारत ने यह ध्यान रखा है कि रूस एकमात्र ऐसा साझेदार है, जो भारत को अत्याधुनिक सैन्य तकनीक दे रहा है।

By: विकास गुप्ता

Updated: 17 Apr 2021, 06:43 AM IST

विनय कौड़ा

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की दो दिवसीय भारत यात्रा बहुत ही महत्त्वपूर्ण रही। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और लावरोव दोनों ने यह दर्शाने की कोशिश की कि द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर सब कुछ ठीक है। हालांकि, वास्तविकता कुछ अलग ही है। भारतीय विदेश मंत्री के साथ बैठक के बाद लावरोव पाकिस्तान भी गए। देखा जाए, तो भारत-रूस संबंध हाल के वर्षों में उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। लावरोव की यात्रा का उद्देश्य इन सम्बंधों में सुधार लाना था। जयशंकर और लावरोव दोनों ने 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' और 'चेन्नई व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर' की अहमियत को रेखांकित किया। भारत ने पहले से ही आत्मनिर्भर भारत के आर्थिक पहलुओं पर बड़ी भूमिका के लिए रूस को आमंत्रित किया हुआ है। भारत ने यह ध्यान रखा है कि रूस एकमात्र ऐसा साझेदार है, जो भारत को अत्याधुनिक सैन्य तकनीक दे रहा है। वैसे तो लावरोव ने मजबूत रिश्तों के लिए राह बनाई, लेकिन हिन्द-प्रशांत रणनीति और चार देशों (भारत, अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) की चौकड़ी पर द्विपक्षीय संबंधों में कड़वाहट आई है। हालांकि, भारत इंडो-पैसिफिक रणनीति में रूस को महत्त्वपूर्ण भागीदार मानता है, लेकिन रूस का अलग दृष्टिकोण है। दूसरी ओर भारत, रूस-चीन के उभरते हुए सम्भावित सैन्य गठबंधन से आशंकित है। लावरोव का मानना है कि रूस-चीन सम्बंध पूर्वकाल में ऊंचाइयों पर रहे हैं, लेकिन वे सैन्य गठबंधन की सम्भावना को खारिज करते हैं। जब मत-भिन्नता हो, तब स्पष्ट चर्चा इरादों की गलत व्याख्या से बचने का अवसर देती है।

पिछले दो दशकों में यह पहली बार हुआ जब भारत-रूस का वार्षिक शिखर सम्मेलन रद्द किया गया। दोनों देशों ने इसकी वजह कोविड-19 महामारी बताया, लेकिन कुछ मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक वार्षिक सम्मेलन रद्द करने की वजह इंडो-पैसिफिक और क्वॉड पर भारत के नजरिए के बारे में रूस की असहजता थी। जो कारण बताया गया, वह कमजोर तर्कों वाला रहा, क्योंकि महामारी के दौरान, भारत अपने अन्य सहयोगियों के साथ वर्चुअली द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठके करता रहा था। भारत ने भी इंडो-पैसिफिक और क्वॉड पर लावरोव की पिछली टिप्पणियों को पसन्द नहीं किया था। पिछले वर्ष दिसम्बर में, मास्को में एक कार्यक्रम में लावरोव ने चीन को लेकर भारत की चिंताओं को कमतर आंकते हुए कहा था कि वर्तमान में पश्चिमी देश भारत को चीन विरोधी क्रियाकलापों में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत अस्थिर अफगानिस्तान पर अपने प्रभाव को लेकर चिंतित है। ऐसे में भारत को रूस सहित सभी बड़ी शक्तियों के साथ निरन्तर जुड़ाव की जरूरत है। एक दशक में रूसी विदेश मंत्री की हालिया यात्रा पाकिस्तान के लिए एक लाभांश ही है। रूस ने पाकिस्तान के साथ अपना जुड़ाव तो बढ़ाया है, पर भारत को आश्वस्त भी किया है कि वह पाकिस्तान को कोई सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति नहीं करेगा। हालांकि, हम यह हकीकत छिपा नहीं सकते हैं कि भारत और रूस दोनों का अफगानिस्तान पर दृष्टिकोण अलग है। लावरोव ने पाकिस्तान में क्वॉड की तीव्र आलोचना की और इसे अमरीकी नेतृत्व वाली विघटनकारी संरचना के रूप में चित्रित किया है।

भारत-रूस को अपने ऐतिहासिक और मजबूत रिश्तों को भू-राजनीतिक परिवर्तनों के जरिए नए आयाम देने होंगे और उसी के अनुरूप नीतियों में सामंजस्य बैठाना होगा। भारत को वास्तविक खतरा चीन से है। ऐसे वक्त में भारत को रूस के साथ अपनी विशेष रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना चाहिए।

(लेखक अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ है और सरदार पटेल पुलिस, सुरक्षा और आपराधिक न्याय विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं)

विकास गुप्ता
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