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चयन में दखल के मायने

फाउंडेशन कोर्स के अंक अधिक प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि इनके आधार पर अधिकारियों को उच्च सेवा या अल्पस्तरीय सेवाओं में चयनित किया जाएगा।

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Sunil Sharma

May 28, 2018

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UPSC staff selection commission

- सी.के. मैथ्यू, पूर्व प्रशासक

वर्ष 1977 में जब मैंने आइएएस की परीक्षा दी थी तो सफल अभ्यर्थियों की सूची में अपना नाम देखकर बहुत खुश हुआ था। मुझे उम्मीद थी कि मेरे गृह राज्य केरल का नाम भी मेरे नाम के साथ प्रकाशित होगा, लेकिन मेरी रैंक की वजह से ऐसा नहीं हो सका। उस वक्त मुझे जरूर झटका लगा, जब प्रशिक्षण का पहला चरण समाप्त होने के बाद मुझे मेरे अपने राज्य भेजने के बजाय रेतीले धोरों के राज्य राजस्थान भेज दिया गया, जो मेरा काडर स्टेट था। यह चयन गोपनीय होता है और पहचान आधारित नहीं होता, इसलिए स्वीकार्य था। लेकिन संभव है कि निकट भविष्य में स्थितियां बदल जाएं।

प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर कार्मिक विभाग के संयुक्त सचिव ने 17 मई 2018 को सभी मंत्रालयों और विभागों को एक पत्र जारी किया। इसके अनुसार, सिविल सेवा परीक्षा में चुन कर आए प्रोबेशनरी अधिकारियों को फाउंडेशन कोर्स के बाद काडर आवंटित करने और ऐसा उनके सिविल सेवा परीक्षा और फाउंडेशन कोर्स के प्राप्तांक के आधार पर करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

प्रस्ताव में बहस का विषय यह है कि यूपीएससी का काम केवल अखिल भारतीय एवं केंद्रीय सेवाओं की कुल रिक्तियों के लिए सफल उम्मीदवारों की सूची तैयार करने तक सीमित किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो विशिष्ट सेवाओं या स्टेट काडर का कोई आवंटन होगा ही नहीं। सभी अभ्यर्थी एक साथ फाउंडेशन कोर्स करेंगे। इसके बाद सिविल परीक्षा और फाउंडेशन कोर्स के प्राप्तांक के आधार पर अभ्यर्थियों को सेवाओं या काडर का आवंटन किया जाएगा। और यह सारी प्रक्रिया भारत सरकार द्वारा की जाएगी।

आखिर इस परिवर्तन का मकसद क्या है? इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर सेवानिवृत्त अधिकारियों के कमेंट की तो जैसे बाढ़ ही आ गई। फिलहाल सेवारत सिविल अधिकारियों के पास तो ऐसा कोई विकल्प है ही नहीं! बहरहाल, मुख्य रूप से जो आशंकाएं जताई जा रही हैं, वे कुछ इस तरह
हैं। यूपीएससी परीक्षाएं देश की विभिन्न सेवाओं के लिए कुशल, बुद्धिमान युवाओं के चयन का पहला चरण मात्र रह जाएंगी। बाकी सेवाओं और स्टेट काडर का आवंटन फाउंडेशन कोर्स खत्म होने के बाद ही होगा।

इस प्रकार कहीं संविधान के अनुच्छेद 315 और 320 में वर्णित यूपीएससी की भूमिका और दायित्वों में कमी तो नहीं की जा रही, यह जांच का विषय है। अभ्यर्थियों को सेवा व काडर का आवंटन केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा, यूपीएससी द्वारा नहीं। यदि मान लें कि फाउंडेशन कोर्स के अंक लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन निर्धारित करती है तो यह किसी जोखिम से कम नहीं होगा। उस क्रम व स्केल की मेरिट तय करने में दक्षता की कमी इस जोखिम की शुरुआत होती है। इसमें एकेडमी चला रहे स्टाफ की औसत कुशलता, गैर व्यक्तिगत क्षेत्र में विभिन्न व्यक्तित्वों की भूमिका, पक्षपात की संभावना, पसंदीदा उम्मीदवार को लाभ पहुंचाने और अन्य को संकट में डालने जैसे घटकों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। यह देखा जाना चाहिए कि एकेडमी निदेशक का आकलन एक परिवीक्षाधीन अधिकारी के ‘चापलूसी कौशल’ का मूल्यांकन तो नहीं है।

आशंका यह भी है कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्थान द्वारा मेरिट के आधार पर अभ्यर्थी चयन की प्रक्रिया में केंद्र सरकार जिस तरह जानते-बूझते हस्तक्षेप कर रही है, उसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे। देखा जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इन अभ्यर्थियों के लिए सेवा व काडर का चयन व्यापक तौर पर व्यक्तिगत आधार पर करने की प्रक्रिया शुरू करने पर विचार कर रहा है। फाउंडेशन कोर्स के अंक इस मायने में अधिक प्रभावी हो जाएंगे, क्योंकि इन्हीं के आधार पर अधिकारियों को उच्च सेवा या थोड़ी अल्पस्तरीय सेवाओं में चयनित किया जाएगा। साथ ही काडर स्टेट के रूप में भी किसी भी राज्य भेज जा सकता है, भले ही वे उससे कितने ही अनजान हों या परिचित।

ऐसी भी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि अधिकारियों को सेवा व राज्य काडर दिए जाने की प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव रहेगा। इससे चहेते अधिकारियों को मनमुताबिक सेवा व काडर मिलेगा, जबकि बाकी को नहीं। परिवीक्षाधीन अधिकारियों को प्रशिक्षण के दौरान ‘यस सर’ कहने का कौशल सीखना होगा ताकि उन्हें अपनी वफादारी का बेशकीमती ईनाम मिल सके। लगता है, अब एक ‘वफादार’ प्रशासनिक अधिकारी की परिभाषा बदलने वाली है। जिन राज्यों में आइएएस अधिकारियों की पोस्टिंग की जाती है, वहां सत्ता में किसी और पार्टी के आने पर इन अधिकारियों के करियर पर क्या असर पड़ेगा, यह एक नए विवाद का विषय होगा।

नए प्रस्ताव से सकारात्मक के बजाय नकारात्मक प्रभाव की आशंकाएं अधिक हैं। आशा है, इस मामले में विवेकपूर्ण निर्णय ही लिया जाएगा, अन्यथा स्वतंत्र भारत में सात दशक से चल रही गौरवपूर्ण परंपरा का अंत होते देर नहीं लगेगी।