ओपिनियन

निर्बन्ध: लक्ष्मी की चंचलता

ठीक तो कह रहे हैं हारीत!... ब्राह्मण को अपने धर्म का पालन करना है तो उसे हस्तिनापुर में रहने की आवश्यकता ही क्या है। ब्राह्मण वहां वास करे, जिस देश में कृष्णसार मृग सहज भाव से विचरण करे।

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Jul 25, 2016

ठीक तो कह रहे हैं हारीत!... ब्राह्मण को अपने धर्म का पालन करना है तो उसे हस्तिनापुर में रहने की आवश्यकता ही क्या है। ब्राह्मण वहां वास करे, जिस देश में कृष्णसार मृग सहज भाव से विचरण करे। जहां हिंसा न हो, उग्रता न हो, रजोगुण का बाहुल्य न हो। और द्रोण ने सदा वास किया शस्त्रों में। आज भी वे खड़े हैं, जहां चारों ओर हिंसा और हत्या है। क्रोध और घृणा है। तो वे कैसे आशा कर सकते हैं कि उन्हें धर्म प्राप्त होगा?

पुण्य प्राप्त होगा? ब्राह्मण तो ब्रह्म के मुख से उत्पन्न हुआ है। उसका उपकरण वाणी है, मां सरस्वती का वरदान। वह बिना कांटों का निरुपम खेत है। उसको उसी में कृषि करनी है। उसी में सब बीजों को बोना है, वही सब कामनाओं को पूर्ण करने वाली खेती है उसकी। पराशर ने कहा- न: 'ब्राह्मणस्य मुखं क्षेत्रं निरुपममकंटकम्। वापयेत् सव्र्ववीजानि सा कृषि: सर्वकामिका।। अर्थात उग्रता ब्राह्मण के लिए नहीं है। वह क्षत्रिय का काम है। वह हाथ में शस्त्र धारण करता है। शस्त्र को हाथ में धारण करने वाला, प्रकर्ष दंड वाला क्षत्रिय, प्रजा की रक्षा करता हुआ शत्रु सेनाओं को जीत कर धरा का धर्म के साथ पालन करता है:

'क्षत्रियो ही प्रजारक्षन् शस्त्रपाणि: प्रचंडवत्। विजित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत्।।

द्रोण ने प्रजा के पालन की बात कभी नहीं सोची, तो फिर उन्होंने शस्त्र क्यों धारण किया? इसीलिए तो कि वे रणभूमि में दूसरों की हत्या करें और फिर उनके पुत्र की हत्या हो... अश्वत्थामा मारा गया। युधिष्ठिर ने यह भी नहीं कहा कि अश्वत्थामा ने वीरगति पाई है। उसने कहा अश्वत्थामा मारा गया। हां! मारा ही तो जाना था। अपनी निर्धनता से बहुत दुखी हुए थे द्रोण! पर तब उन्होंने पराशर के वचनों को स्मरण नहीं रखा था 'न श्री: कुलक्रमायाता स्वरूपाल्लिखितापि वा।।

कुलक्रम से आई हुई लक्ष्मी स्थिर नहीं होती न ही आलेखन की हुई लक्ष्मी स्थिर होती है।

लक्ष्मी की चंचलता को स्वीकार क्यों नहीं किया उन्होंने।

क्षत्रिय उसे तलवार से प्राप्त करके भोगता है। पृथ्वी का राज्य वीरों द्वारा ही भोगा जाता है। 'खड्गेनाक्रम्य भुंजकीत वीरभोग्या वसुंधरा।।Ó11 पर वह क्षत्रिय, दुर्योधन के समान प्रतिदिन अपने भाइयों और बेटों को युद्धभूमि में कटवाता है। द्रोण के समान नहीं कि पुत्र के मारे जाने का समाचार पाकर हाथ से शस्त्र छूटकर गिर जाता है। इरावान को मरते देखा था अर्जुन ने। अभिमन्यु का भी वध हुआ। उससे अर्जुन का गांडीव नहीं छूटा। वह और भी प्रचंड होकर लडऩे आया और उसने जयद्रथ का वध किया।

नहीं द्रोण! तुम उस क्षत्रिय जीवन के उपयुक्त नहीं। व्यर्थ का लोभ किया। व्यर्थ का अहंकार किया। वे इस प्रकार के जीवन के योग्य नहीं हैं। उनका ब्रह्म 'मोक्षÓ है। वे मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं। तो फिर उन्होंने अपनी आजीविका रणभूमि में क्यों चुनी? यह आजीविका उनके लिए है, जो उसके माध्यम से धर्म की स्थापना कर सकते हैं। भूल हुई द्रोण! तुमसे भूल हुई। तुम्हें अपने मार्ग पर ही चलना चाहिए था।

नरेंद्र कोहली के प्रसिद्ध उपन्यास से

Published on:
25 Jul 2016 03:38 am
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