
घटोत्कच अलायुध का रक्त में भीगा मस्तक पकड़कर दुर्योधन के रथ की दिशा में आया; और सहसा उसने वह मस्तक दुर्योधन के सम्मुख फेंक दिया। दुर्योधन को लगा, उद्विग्नता से उसका मस्तक फट जाएगा। अलायुध ने स्वयं आकर प्रतिज्ञा की थी कि वह भीम का वध कर देगा। दुर्योधन के मन ने कहीं भीतर ही भीतर उसका विश्वास भी कर लिया था। उसने अपने और अपने भाइयों के जीवन को सुरक्षित ही नहीं, चिरस्थायी मान लिया था। किंतु अलायुध की प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई थी।
घटोत्कच ने अलायुध का वध कर दिया था। तो अब भीम को कौन रोकेगा? कोई नहीं! भीम भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ही लेगा। दुर्योधन को लगा कि उसकी जंघाओं में असहनीय पीड़ा हो रही है। कर्ण ने धृष्टद्युम्न और शिखंडी, दोनों को ही अत्यंत घायल कर दिया था। युधामन्यु, उत्तमौजा और सात्यकि भी उसके सामने कुछ विशेष नहीं कर पा रहे थे। पांडव सेना किसी भी प्रकार स्वयं को सुरक्षित नहीं समझ सकती थी। वे सब युधिष्ठिर की सुरक्षित सेना में प्रवेश करने का प्रयत्न कर रहे थे।
पांडव सेना को हताश और युद्धविमुख देखकर घटोत्कच का रोष आकाश छूने लगा। घटोत्कच ने नया रथ लिया। और कर्ण पर आक्रमण किया। कर्ण का मनोबल भी बहुत ऊंचा था। आज वह कुछ ऐसा अद्भुत करने वाला था कि दुर्योधन का विषादपूर्ण मन भी हर्ष से उछल जाए। वे दोनों ही कर्णी, नाराच, शिलीमुख, नालीक, दंड, असन, वत्सदंत, वाराहकर्ण, विपाठ, सींग तथा क्षुरप्रों की वर्षा करते हुए, अपनी गर्जना से आकाश को कंपाने लगे। पर तभी कर्ण ने अपने दिव्यास्त्र से घटोत्कच के रथ को सारथि और घोड़ों सहित नष्ट कर दिया। घटोत्कच रथ से नीचे नहीं उतरा।
वह पुन: अदृश्य हो गया था। अंधकार में उसको खोज पाना कौरवों के लिए संभव नहीं हो पा रहा था। जाने वह कहां था और कहां से प्रकट होगा। वह कहीं से भी प्रकट होगा और कर्ण को मार देगा। दुर्योधन बहुत डरा हुआ था। यदि आज का यह रात्रियुद्ध भी पांडवों को समाप्त नहीं कर पाया तो स्थिति और भी विकट हो जाएगी। उसे लगा कि उसके मन में कर्ण के प्रति भी गंभीर असंतोष पनप रहा था। पता नहीं, यह क्या कर रहा है। घटोत्कच दिखाई नहीं दे रहा है तो यह सभी दिशाओं में लक्ष्यहीन बाण क्यों नहीं चला रहा है।
उस वैजयंती का प्रयोग क्यों नहीं करता कि वह घटोत्कच को खोज कर उसे मार डाले। पांडवों में से कोई एक तो समाप्त हो। अर्जुन नहीं मरता इससे तो भीम को मारे। भीम नहीं मरता तो घटोत्कच को मारे। पर किसी को तो मारे। यह अपना बाण संधान का अभ्यास ही करता रहेगा क्या, अथवा शत्रु का वध भी करेगा।
दुर्योधन को अपने ऊपर भी बहुत क्रोध आया। उसने अपना सारा जीवन इन लोगों को पालने और प्रसन्न करने में ही व्यतीत कर दिया। पितामह और आचार्य के पास दिव्यास्त्र और देवास्त्र थे। कृपाचार्य की चाटुकारिता भी इसी कारण की। अश्वत्थामा और कर्ण का पालन-पोषण करता रहा। क्यों उसने स्वयं दिव्यास्त्र और देवास्त्र प्राप्त नहीं किए? स्वयं तपस्या कर लेता तो इन लोगों का मुंह तो नहीं देखना पड़ता। तपस्या? यही तो उससे हो नहीं सकता था।
और तभी घटोत्कच ने अब तक की अपनी सबसे भयंकर माया प्रकट की। जाने वह स्वयं कहां था किंतु उसकी ओर से बाणों, शक्ति, ऋष्टि, प्रास, मूसल, गदाओं और शतघ्निों की वर्षा होने लगी। दुर्योधन के मन में अनेक बार आया था कि ये राक्षस भी तो कोई तपस्या नहीं करते थे; किंतु इनके पास कुछ और प्रकार के शस्त्र होते थे। तपस्वियों ने अपनी साधना से अपनी आत्मा को सूक्ष्म प्रकृति से एकाकार कर प्राकृतिक तत्वों से सूक्ष्म अस्त्रबल प्राप्त किया था तो इन राक्षसों ने उसी प्रकृति के स्थूल भौतिक तत्वों से विभिन्न प्रकार की मारक शक्ति प्राप्त की थी।
घटोत्कच की इस अस्त्र वर्षा से सहस्रों दुंदुभियों के बजने की भयंकर ध्वनियां हो रही थीं, जैसे पर्वतों के शिखर टूट कर गिर रहे हों। न तो राक्षस सैनिक किसी पर दया करते थे और न ही उनके द्वारा प्रयुक्त भुषुंडी, शतघ्नी, लोहे के पत्रों से मढ़े हुए स्थूणाकार शस्त्र। कर्ण निरंतर बाण चला रहा था किंतु उसके बाण घटोत्कच की उस शस्त्र वर्षा को रोक नहीं पा रहे थे।
क्रमश: नरेन्द्र कोहली
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