
china one belt one road
- अतुल कौशिश वरिष्ठ पत्रकार
चीन में हाल ही संपन्न चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के 19 वें सम्मेलन के दौरान वहां के संविधान में वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) को शामिल करने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। चीन खरबों डॉलर की इस राजनीतिक परियोजना से भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है कि वह भी इसमें शामिल हो। भारत ने इसमें भाग लेने से स्पष्ट तौर पर इनकार कर दिया है। इससे भारत के सुरक्षा में सेंध लग सकती है। यह भी उल्लेखनीय है कि ओबोर से भारत को कोई फायदा तो होगा नहीं बल्कि यह चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को इस प्रकार प्रभावित करेगा कि उससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था व सुरक्षा तो मजबूत होगी लेकिन भारत के हितों पर कुठाराघात होगा।
चीन के सीपीसी सम्मेलन में लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में हो सकता है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत को लॉलीपॉप दिखा कर ओबोर स्वीकार करने के लिए मनाने की कोशिश करें। सीपीईसी को लेकर दिखाए जा रहे उत्साह के बीच (हालांकि इसे गेम चेंजर माना जा रहा है) पाकिस्तान में भी ऐसी भावनाएं प्रबल हो रही हैं, ‘कहीं ऐसा ना हो कि पाकिस्तान चीन की काल्पनिक कॉलोनी बनकर रह जाए और कर्ज के बोझ तले दब जाए।’ ऐसे में भारत कभी नहीं चाहेगा कि उसकी भी ऐसी स्थिति हो। ओबोर अपनाने के पीछे चीन का उद्देश्य युद्ध के बाद दोबारा उठ खड़े हुए यूरोप के ‘मार्शल प्लान के चीनी संस्करण को दुनिया भर में फैलाना मात्र नहीं है बल्कि इसके जरिये वह एशिया, अफ्रीका और यूरोप में व्यापार व वाणिज्य बढ़ाने की जमीन तलाश कर रहा है।
सीपीईसी एक प्रकार से ओबोर का ‘दिखावटी नमूना’ कहा जा सकता है। भारत के लिए इसकी उपयोगिता संदिग्ध ही है। केवल इसलिए नहीं कि यह भारत के उस महत्वपूर्ण हिस्से से गुजरता है जिस पर पाकिस्तान अपना हक जताता रहा है बल्कि इसकी एक वजह यह भी है कि भारत अगर ओबोर स्वीकार कर भी लेता तो पाकिस्तान भारत को अफगानिस्तान अथवा उत्तर-पश्चिम के अपने किसी भी प्रान्त की धरती का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देता। जाहिर है हमें किसी भी ऐसे मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि ओबोर के जरिये भारत, पाक के आगे तक जाने वाले जमीनी रास्ते का इस्तेमाल कर सकेगा। इसके कारणों के बारे में बात करना बेमानी है। रुग्ण मानसिकता वाला पाकिस्तान सैन्य शासन के तहत प्रतिबद्ध है कि वह भारत के साथ मित्रवत् नहीं रहेगा। पाकिस्तान केवल कश्मीर को लेकर ही भारत के साथ असहज नहीं है बल्कि वह अफगानिस्तान के साथ भारतीय व्यापार के लिए अपनी जमीन से होकर जाने वाला रास्ता भी भारत के लिए खोलने को तैयार नहीं है।
इस संबंध में ना तो वह अमरीका की सुन रहा है और ना किसी और की। जब अमरीका ही पाकिस्तान को उन दिनों में भारत को रास्ता देने के लिए राजी नहीं कर सका जब भारत-पाक के संबंध थोड़े बहुत शांतिपूर्ण थे तो इस बात की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि चीन अब पाकिस्तान को भारत को रास्ता देने के मामले पर पुनर्विचार करने के लिए सहमत करे। वह भी विशेषतौर पर तब, जबकि दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हैं। एक दौर जरूर ऐसा था जब पाकिस्तान, भारत के साथ जमीनी सम्पर्क के लिए तैयार था। ईरान और भारत के बीच एक गैस पाइपलाइन परियोजना के लिए पाक भारत को अपनी धरती का इस्तेमाल करने देने पर सहमत हो गया था लेकिन अमरीका की आपत्ति के बाद यह गैस पाइपलाइन परियोजना ठंडे बस्ते में पड़ गई।
मध्य एशिया और उसके आगे के क्षेत्र के लिए जमीनी रास्ता उपलब्ध करवाने वाली ओबोर परियोजना निश्चित रूप से भारत के लिए प्रलोभन है लेकिन अपनी जमीन का इस्तेमाल ना करने देने की पाक हठधर्मिता के चलते भारत के लिए इसे नकार देना ही मुनासिब है। सीपीईसी के मुताबिक चीन इस परियोजना के तहत पाकिस्तान में 50 खरब डॉलर का निवेश करेगा, जिससे पाक में आधारभूत ढांचा सुधरेगा। इससे चीन से पाकिस्तान को भेजे जा रहे सैन्य हथियारों की भारी आपूर्ति को अधिक बढ़ावा मिलेगा। चीन का उद्देश्य पश्चिमी देशों की आंख की किरकिरी बन चुके व आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान को आर्थिक व सैन्य मोर्चे पर भारत के समकक्ष ला खड़ा करना है।
चीन और पाकिस्तान के बीच मिलीभगत जगजाहिर है कि चीन भारत में निरंतर आईएसआई समर्थित आतंक फैलाने में पाक की सहायता कर रहा है। जो लोग भारत को ओबोर अपनाने की वकालत कर रहे हैं, उनका मानना है कि बिना इसके भारत क्षेत्र में अलग-थलग पड़ जाएगा। इसी साल मई में चीन में आयोजित उच्च स्तरीय आबोर सम्मेलन में पड़ोसी देशों ने इस संबंध में चुप्पी साधे रखी। खैर, अमरीका और जापान ने ओबोर का पूर्णत: समर्थन नहीं किया। अगर भारतीय कूटनीति का फोकस केवल वार्ता के बजाय व्यापक होता तो क्षेत्रीय सडक़ सम्पर्क बढ़ाने के लिए भारत अधिक प्रयास कर चुका होता और व्यापार भी काफी समृद्ध हो चुका होता। ईरान में जारी चाबहार परियोजना सीपीईसी को टक्कर दे सकती है। परन्तु क्षेत्र में भारत का किसी भी मुद्दे पर अलग होना दुनिया के लिए मायने रखता है और ओबोर के बगैर भी भारत विकास पथ पर अग्रसर रहेगा, रूकेगा नहीं।

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