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स्पंदनः पुर-२

जब भी भावनात्मक आवेग का दौर आता है, हृदय स्थित अनाहत चक्र पर दबाव पड़ता है। वह सूर्य-चक्र से ऊर्जा खींचता है।

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Gulab Kothari

Oct 30, 2017

hindu sadhu meditating

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जब भी भावनात्मक आवेग का दौर आता है, हृदय स्थित अनाहत चक्र पर दबाव पड़ता है। वह सूर्य-चक्र से ऊर्जा खींचता है। यानी पाचन शक्ति का ह्रास। इसी प्रकार स्नेह-सौन्दर्य आदि का सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गीता में कृष्ण कहते हैं कि ईश्वर को बाहर मत ढूंढ़ो। वह तो हृदय में ही है। जीवात्मा की स्थिति भी हृदय में ही दीपकलिका रूप में वर्णित की गई है। हृदय में ‘हृ’ आकाश तत्त्व का बोधक है, ‘य’ वायु तत्त्व का। ‘द’ मृत्युसूचक अनित्य कहा गया है। दोनों ओर अमृत रहने के कारण यह भी अमृतमय भासित होता है। इसी प्रकार ‘हृ’ को मन का ***** कहा है, ‘द’ को वाक् का, ‘य’ को प्राण का प्रतिनिधि कहा गया है।

तीनों साथ रहते हैं-मन, प्राण, वाक्। प्राण में गति ***** इन्द्र प्राण की प्रधानता रहती है। यह ब्रह्मा और विष्णु प्राण (स्थिति और आगति) के कार्यों में प्रेरक बनता है। इन्द्र ही दस इन्द्रियों का भोग साधक है। इन्द्रियों की चेष्टा को बुद्धि तक पहुंचाना इन्द्र का कार्य है। अर्थात्-इन्द्र ही हृदय हो विज्ञानात्मा से जोड़ता है। विज्ञान बुद्धि को कहते हैं। मन तत्त्व रूप है, जो प्राण-वाक् के साथ रहता है, मरता नहीं है। हृदय का ‘द’ मृत्यु ***** है। वह मन का हेतु नहीं होता। मन में संस्कारों की छाप ही उसे बार-बार विषयों की ओर ले जाती है। मन को कोई परमयोगी ही देख सकता है। कहते हैं-माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर। व्यवहार में मन और हृदय एक सिक्के के दो पहलू कहे जा सकते हैं। बाहरी, सृष्टिगत स्वरूप को हृदय कहा जा सकता है और भीतरी अध्यात्म रूप में मन हो जाता है।

विषाद और अवसाद के मध्य अन्त: शान्त मन ही रह सकता है, हृदय नहीं। हृदय का राजा इन्द्र प्राण ही मन के द्वारा विज्ञानात्मा तक पहुंचता है। मन सदा भाव प्रधान ही होता है-वहां वासना नहीं होती। वासना के आवरण हो सकते हैं। तब त्रैगुण्य मन ही हृदय की तरह भासित होता है। हमारा हृदय एक स्थूल अवयव भी है। भौतिक पिण्ड मात्र है। पुराने रक्त को ग्रहण करता है, शोधन करके वितरित करता है। उसकी धडक़न का संचालन व्यान वायु करता है। ये ही हरति, द्यति और यच्छति भावरूप हैं। हृदय अक्षर है। ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र तीनों अक्षर प्राण। अक्षर के भीतर अव्यय बैठा है। कृष्ण बैठा है, हृदय में।

प्राण
आत्मा प्राण वाचक है। मन में कामना उठी-पानी पीना है। कामना क्रिया में बदली, तो मन वहीं गौण हो गया। जब तक पानी नहीं पिया, वाक् भी गौण रहा। आत्मा की गतिविधियों को समझने के लिए प्राण की सहायता चाहिए। मन से आत्मा को पकड़ा नहीं जा सकता। प्राण की गतियों को समझकर ही आत्मा तक पहुंचा जा सकता है। कामना के क्रिया रूप में आते ही मन मर जाता है। गति रह गई। वाक् भी नहीं रहा। तब आत्मा तक कैसे पहुंचेंगे?

प्राण रूप इन्द्र बल है। सभी प्राण इन्द्र के अधीन रहते हैं। इन्द्र ही आत्म-हृदय का अंश लेकर ३३ वें स्तोम तक जा रहा है। वहां से विष्णु प्राण बनकर वापस आ रहा है। अत: प्राण ही ब्रह्म की मुख्य शक्ति है। क्षर सृष्टि की शुरूआत ‘प्राण’ से ही होती है। प्राण, वाक्, आप, अन्न और अन्नाद के क्रम में। प्राण बल के बिना सत्य प्रतिष्ठित ही नहीं होता। ब्रह्म भी बल से ही सत्य बनता है। पहला सत्य ही अव्यय पुरुष है।

उपनिषद् कहता है-‘जहां से वाणी लौट आती है, वह ब्रह्म मन से भी अप्राप्य है। जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ हो, अक्षर-शब्द की जहां कोई स्थिति न हो, मन से उसका ध्यान करने पर भी वह अप्राप्य ही है।’

आकाश
वाणी की पहुंच कहां तक है? सृष्टि का पहला महाभूत आकाश है और इसकी तन्मात्रा नाद/ध्वनि है। अत: वाणी की पहुंच आकाश तक है। उसके आगे नहीं है। मन की पकड़ अव्यय पुरुष तक है। मन बनता ही अव्यय पुरुष में है। उसके आगे मन की भी पकड़ नहीं है। आद्य ब्रह्म तो इसके भी आगे है। श्रुति कहती है-‘इन्द्रो मायाभि: पुरुरूप इयते’। वह जो बल है (इन्द्र) वह माया से अनेक रूपों को धारण करता है। वह इन्द्र ब्रह्म से अवच्छिन्न होकर संसार में अनेक रूपों को प्रकट करता है।