
Premanand Ji Maharaj : भगवान भाव में बंध जाते हैं: प्रेमानंद जी महाराज की प्रेरक कथा (फोटो सोर्स: Patrika Design Team)
Bhagwan ke Darshan Kaise Milte hai Premanand ji maharaj : भगवत दर्शन उसी को मिलते हैं, जिसे सच में उनकी तीव्र चाह हो, लेकिन इसके लिए चार बातें जरूरी हैं। सबसे पहले, रोज नाम जपना और रसिक संतों की संगति करना। देखो, बिना अच्छे संग के भजन हो ही नहीं सकता। मन वैसे ही भटकता रहेगा। रसिकों के साथ रहोगे तो भजन की सही आदत पड़ती है, वो भी गुरु परंपरा से। प्रेमानंद जी महाराज ने कहा दूसरा, भगवान की मूर्ति को सच में भगवान का ही रूप मानो। कुछ लोग पूछते हैं, “अरे पत्थर या धातु पूजने से क्या? वहां भगवान हैं भी?” उनको समझाना मुश्किल है। जब वेद कहता है "सर्वं खल्विदं ब्रह्म", तो हर जगह भगवान हैं। मूर्ति तो भगवान का अवतार है, अर्चा अवतार। जब हम श्रद्धा और भाव से सेवा करते हैं, तो भगवान उस छवि में खुद विराजमान हो जाते हैं। ये विश्वास की बात है, नास्तिकों को ये समझ नहीं आता।
प्रेमानंद जी महाराज (Premanand ji maharaj) ने कहा , जिस मूर्ति को एक मूर्तिकार बना रहा होता है, वही मूर्ति किसी सच्चे भक्त की पूजा से चमत्कारी बन जाती है। बाहर वालों की बातें मत सुनो, वरना जिनकी श्रद्धा कमजोर है, उनकी आस्था डगमगा जाती है। कुछ लोग कहते हैं, “मूर्तियां बोलती नहीं, खाती नहीं, देखती नहीं।” लेकिन सब भाव का खेल है। जब भाव आता है, तो भगवान बोलते भी हैं, खाते भी हैं, साथ चलते भी हैं। इसी पर एक किस्सा है-
प्रेमानंद जी महाराज ने एक कथा सुनाई, एक बार एक बूढ़ा ब्राह्मण तीर्थ यात्रा पर जाना चाहता था। उसके बेटे अमीर थे, लेकिन विलासिता में डूबे थे, साथ नहीं जाना चाहते थे। बूढ़ा सोचता रहा, “काश कोई जवान मिल जाए तो उसे कुछ भेंट देकर साथ ले लूं।” तभी एक गरीब ब्राह्मण का जवान बेटा मिला। उसने कहा, “ये तो हमारा सौभाग्य है, आपके साथ तीर्थ यात्रा करना।” दोनों निकल पड़े, सारे तीर्थ घूमे। जब वृंदावन पहुंचे, जवान ने बड़ी सेवा की। बूढ़ा बहुत खुश हुआ। गोपाल जी के सामने उसने कहा, “मैं बहुत खुश हूं, मेरी बेटी ब्याहने लायक है। तुम्हारी सेवा के बदले मैं उसका विवाह तुमसे कर दूंगा। लेकिन याद रखना, मैंने भगवान के सामने ये वादा किया है।
यात्रा के बाद गांव लौटे। बूढ़े ने अपने बेटों से बहन की शादी की बात छेड़ने की हिम्मत नहीं की। कई दिन बीत गए, कोई चर्चा नहीं हुई। आखिर वो गरीब ब्राह्मण खुद गया और बूढ़े से कहा, “आपने भगवान के सामने वादा किया था।” बूढ़ा डर गया, बोला, “मुझे याद नहीं।” बेटे भी टालने लगे “अगर भगवान खुद आकर गवाही देंगे तभी शादी होगी।” सबको भरोसा था कि मूर्ति तो चलती-बोलती नहीं, उन्हें डर नहीं था।
गरीब ब्राह्मण सब बेचकर फिर वृंदावन पहुंचा। गोपाल जी से बोला, “महाराज, अब तो आपको ही गवाही देनी पड़ेगी।” बाहर बैठा रहा, सब चले गए, वो डटा रहा। भगवान से बोला, “मूर्ति बोलती थोड़ी है, आपने बुलाया तो चलिए बाहर।” भगवान बोले, “तेरे प्रेम के कारण बाहर आ तो गया, लेकिन आगे नहीं जाऊंगा। बुला ले लोगों को यहीं, यहीं साक्षी दूंगा।” गरीब बोला, “महाराज, वो लोग नहीं आएंगे, आपको चलना पड़ेगा।” भगवान बोले, “ठीक है, लेकिन मैं वृंदावन का ठाकुर हूं, रास्ते में अच्छा माखन-मिश्री चाहिए।” गरीब बोला, “महाराज, सब बेचकर ही तो आया हूं, जो है सब खिला दूंगा।”
भगवान बोले, “जब मेरे पैरों की पायल की आवाज़ सुनोगे, समझ लेना मैं साथ हूं। लौटकर कभी पीछे मत देखना, वरना मैं वहीं रुक जाऊंगा।” दोनों चल पड़े। गांव के पास पहुंचे, गरीब का मन डगमगाया, उसने पीछे देखा। तभी भगवान बोले, “तूने वादा तोड़ा, अब मैं यहीं रुकूंगा।” गरीब दौड़कर गांव गया, सबको बुलाया “आओ देखो, गोपाल जी खुद आए हैं मेरी गवाही देने!” पूरा गांव उमड़ पड़ा। पंचायत ने देखा, भगवान खुद विराजमान हैं। अब किसी की हिम्मत नहीं थी मना करने की। मजबूरन बूढ़े को अपनी बेटी की शादी करनी पड़ी।
आज भी वो मूर्ति ‘साक्षी गोपाल’ के नाम से उड़ीसा में विराजमान है। जिसे तुम पत्थर समझते हो, वही भगवान चलकर उड़ीसा तक गए और गवाही दी। विट्ठल भगवान भी तुकाराम, नामदेव जैसे संतों से बात करते थे। कई संतों ने भगवान को प्रत्यक्ष अनुभव किया है। भगवान भाव में बंध जाते हैं, ये कोई कहानी नहीं, सच्ची घटना है।
Published on:
14 Jan 2026 01:31 pm

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