
jat agitation protest
- प्रकाश सिंह
आंदोलनकारी कभी बसों को जला देते हैं तो कभी रेलवे स्टेशन पर तोडफ़ोड़ करते हैं। धारणा बन चुकी है उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। इस धारणा को बदलने के लिए जरूरी है कि कानून-व्यवस्था संभालने वालों को विधायी आवरण मिले।
सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण आंदोलन के संदर्भ में पहले ही स्पष्ट कर रखा है कि आंदोलनकारी जिस तरह से निजी या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसका आकलन करना चाहिए। इतना ही नहीं नुकसान की भरपाई भी इन्हीं आंदोलनकारियों से करानी चाहिए। सामूहिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। लेकिन, राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन को अपनाने में खुद को अक्षम पा रहीं हैं। कुछ तो आंदोलनकारियों से सीधा टकराव नहीं लेना चाहतीं। यही वजह है कि राज्य सरकारें कई मौकों पर आंदोलनों पर सख्ती के बजाय इस काम के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों के कंधों का इस्तेमाल करती हैं।
उनका मानना रहता है कि केंद्रीय बल सख्ती दिखाकर चले जाएंगे और इसकी जिम्मेदारी उनकी होगी। वे सख्ती दिखाने से बच जाएंगे। हम देखते हैं कि आंदोलनकारी कभी बसों को जला देते हैं तो कभी रेलवे स्टेशन पर जाकर तोडफ़ोड़ करते हैं। ऐसी धारणा बन चुकी है कि ऐसा करने के बावजूद कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इस मिथ्या धारणा का टूटना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए जरूरी है कि कानून-व्यवस्था संभालने वालों को विधायी आवरण मिले। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश हैं लेकिन राज्य सरकारें उनकी अनुपालना नहीं करतीं। ऐसे में जम्मू-कश्मीर सरकार ने अध्यादेश लाकर नैतिक साहस दिखाया है। उन्होंने सही दिशा में सही कदम उठाया है।
यह अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय और स्वागत योग्य कदम है। दरअसल, हुकूमतें अप्रिय फैसले लेने से डरती हैं। वे अदालतों की आड़ लेती हैं। कार्यपालिका को जब कानून-व्यवस्था की अनुपालना में लकवा मार जाता है तो न्यायपालिका को कदम उठाना पड़ता है। अकसर देखने में आ रहा है कि अदालतों को आगे बढक़र फैसले देने पड़ रहे हैं। एक और बात यह कि प्रशासन इस तरह के मामलों में भीड़ में से किसकी पहचान कर पाएंगे, कहकर बचना चाहता है। लेकिन, मेरा मानना है कि पहचान करना कठिन है नामुमकिन बिल्कुल भी नहीं है। बस, केवल इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
उदाहरण के तौर पर कहीं आंदोलनकारियों ने नहर को काट दिया। तो ऐसे में जरूरी है कि आंदोलनकारियों पर या फिर उस स्थान विशेष के लोगों पर जुर्माना लगा दिया जाए। इससे लोगों में डर रहेगा और वे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान होने से बचाएंगे। किसी गांव के लोग ऐसा करते हैं तो उनके विकास की राशि मे भी कटौती की जा सकती है। लोगों में सामूहिक जिम्मेदारी का भाव जगाने के लिए ऐसा करना ही होगा। लगना चाहिए कि आंदोलनकारियों ने गलती की है और इसका खमियाजा उन्हें या उनके लोगों को सामूहिक रूप से भुगतना पड़ सकता है।

Published on:
29 Oct 2017 01:56 pm
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