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सबको दो जून की रोटी मिल सके, इसके भी इंतजाम होने चाहिए। सच्चे अर्थों में भारत तभी खुशहाल माना जाएगा। दुनिया के ७५ फीसदी नए अरबपति भारत और चीन से आ रहे हैं। ये खबर देश की प्रगति की रफ्तार को दर्शाती है। ये तो हुआ खबर का एक पहलू। दूसरे पहलू की गहराई में जाया जाए तो उससे निकलने वाली तस्वीर धुंधली नजर आती है। भारत और चीन इस मामले में अमरीका को सीधी टक्कर भी दे रहे हैं। लेकिन सवाल ये कि क्या देश भी इन अरबपतियों की तरह प्रगति कर रहा है? कितने लोग आज भी भुखमरी के शिकार हैं? लाखों लोग आज भी फुटपाथ पर जिंदगी गुजारने को विवश हैं।
सरकारी अस्पतालों में आज भी पर्याप्त डॉक्टर नहीं है। गांव में सडक़ें नहीं हैं तो अनेक जगह पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। स्वच्छता मिशन चल रहा है लेकिन शौचालय नहीं है। करोड़ों युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। बात एकदम सीधी और साफ है। एक तरफ पैसे वाले और अमीर हो रहे हैं तो दूसरी तरफ रोटी, कपड़ा और मकान के लिए रोज संघर्ष करने वालों की तादाद भी तेज रफ्तार से बढ़ रही है। ये खबर किसी के लिए सुकून देने वाली नहीं मानी जा सकती।
प्रगति के बावजूद खुशहाल भारत अब भी सपना ही बना हुआ है। चिकित्सा सेवाओं में तरक्की के लम्बे-चौड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन जब डेंगू और स्वाइन फ्लू से विधायक और पूर्व मंत्री की मौत की खबर सामने आती है तो इन दावों पर शक होता है। अपनी मृत पत्नी को दस किलोमीटर कंधों पर लादकर ले जाने की खबरें भी इसी देश में सुनने-पढऩे को मिलती हैं।
जरूरत दोनों खबरों की हकीकत में तालमेल बिठाने की है। अरबपतियों की बढ़ती संख्या से भला किसी को क्या ऐतराज हो सकता है। लेकिन सबको दो जून की रोटी मिल सके, इसके भी इंतजाम होने चाहिए। सच्चे अर्थों में भारत तभी खुशहाल माना जाएगा।

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