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पाकिस्तान: पूर्व पीएम को देश की मशीनरी पर ही नहीं रहा भरोसा

पाकिस्तान की स्थिति क्षेत्र पर नियंत्रण की यूएस-चीन की महत्त्वाकांक्षाओं को बड़ा खेल खेलने का मौका देती है

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Patrika Desk

Mar 16, 2023

पाकिस्तान: पूर्व पीएम को देश की मशीनरी पर ही नहीं रहा भरोसा

पाकिस्तान: पूर्व पीएम को देश की मशीनरी पर ही नहीं रहा भरोसा

अरुण जोशी
दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार
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पाकिस्तान की मीडिया में आगजनी, अश्रुगैस छोड़े जाने और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थकों द्वारा पत्थर फेंके जाने की तस्वीरें छाई हुई हैं। इमरान को गिरफ्तार करने की खबर फैलते ही उनके समर्थक अपने नेता को बंदी बनाए जाने से रोकने के तहत पिछले कई घंटों से मानव दीवार बनकर जमा हो गए थे। लाहौर के जमान पार्क स्थित उनके आवास के बाहर के क्षेत्र का दृश्य पहली नजर में युद्ध का मैदान बन गया है। तनाव में उबाल की शुरुआत उस वक्त हुई, जब पुलिस एक सप्ताह से कम समय में ही दूसरी बार उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची थी और इमरान ने अपने समर्थकों को सरकार एवं पुलिस का विरोध करने के लिए सडक़ों पर आने का आह्वान किया था। इमरान को डर था कि पुलिस उन्हें हमेशा के लिए चुप कराना चाहती है, उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा जहां उन्हें मार डाला जाएगा। ट्विटर पर उनका संदेश बिजली की गति से वायरल हो गया। पेशावर से कराची तक कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। पीटीआइ समर्थकों और पुलिस के बीच पिछली रात से शुरू हुईं झड़पें बुधवार सुबह तक जारी रहीं। यह स्पष्ट नहीं है कि इमरान को गिरफ्तार किया जाएगा या नहीं, क्योंकि संघर्ष के बढ़ने का खतरा था।

पाकिस्तान ने वह रेखा पार कर ली है जहां से उसका लौटना सम्भव नहीं है। यह संकट किसी व्यक्तिगत नेता से कहीं अधिक का है। जाहिर है कि पाकिस्तान अपने ही संकट में काफी गहराई तक डूब गया है, जहां किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। पाकिस्तान अन्त:विस्फोट की स्थिति में पहुंच गया है। इसका सीधा असर उसके पड़ोसियों विशेषकर भारत पर पड़ेगा।

पुलिस इमरान खान को क्यों गिरफ्तार करना चाहती है? उन पर दो तरह के मामले हैं। उन्हें पद पर रहते हुए जो तोहफे मिले थे, उन्हें हड़पने का आरोप है। नियमानुसार उन्हें इन तोहफों को तोशाखाना या सरकारी खजाने में जमा कराना चाहिए था। उन पर हाइकोर्ट के न्यायाधीश को भी अपमानित करने का आरोप है। लेकिन इमरान ने बाहुबल का इस्तेमाल किया। पुलिस उन तक न पहुंच सकी और न ही गिरफ्तार कर पाई। गिरफ्तारी वारंट, आंशिक रूप से, शहबाज शरीफ सरकार और उनके बीच चल रहे टकराव के राजनीतिक प्रतिशोध से अलग है। कोई संदेह नहीं कि सत्ता से बेदखली के बाद इमरान और अधिक मजबूत व लोकप्रिय हुए हैं। सेना के साथ, खासकर पूर्व सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ उनका टकराव भी संकट का बड़ा कारण बना है। गत वर्ष 3 नवंबर को ‘इस्लामाबाद चलो’ के दौरान सडक़ों पर जनसमूह के उमड़ने से अपनी लोकप्रियता दिखने और पंजाब के वजीराबाद में हत्या के प्रयास से बचने के बाद इमरान का अहंकार बढ़ा है। वह आत्ममुग्ध हैं कि पाकिस्तान की नियति के वे एकमात्र निर्णयकर्ता हैं। यह आत्म-जुनून उनकी बर्बादी की वजह बन गया है।

भारत और अन्य देशों के विश्लेषक पाकिस्तान को सही चश्मे से नहीं देख रहे हैं। वे अपने अनुकूल मुहावरेदार भाषा में कह रहे हैं- ‘पाकिस्तान में गड़बड़ है।’ पाकिस्तान में क्या हो रहा है या अब तक क्या हुआ है और घटनाओं के सम्भावित परिणाम क्या होंगे, उसकी यह उपयुक्त व्याख्या नहीं है। पड़ोसी देश में यह अराजकता के सदृश्य है जहां कानून का शासन खत्म हो गया है। दृष्टिगत साक्ष्य तो इमरान के गिरफ्तारी वारंट को नाजायज तरीके से नकारने के हैं। उन्हें इसका सम्मान करना चाहिए था और अदालत में अपनी बेगुनाही को साबित करना चाहिए था। इसके बजाए उन्होंने पुलिस का विरोध करने के लिए अपने लोगों की भीड़ को बुलाया। हिंसा से यही पता चलता है कि जो व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री रहा, उसे अपने ही देश की कानूनी और संवैधानिक मशीनरी पर कोई भरोसा नहीं है।

समस्या जितनी दिखती है, उससे कहीं बड़ी है। दंगे पाकिस्तानी शहरों तक ही सीमित हो सकते हैं, पर इसके अप्रत्याशित प्रभाव अंदरूनी और बाहरी दोनों हैं। विशेषकर भारत पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। पड़ोसी देश, जो भारत में आतंकवाद और आतंकियों की पैठ कराता रहा है और देश-विदेश में भारत विरोधी प्रचार में स्थायी रूप से लिप्त है, में अराजकता जवाबदेही से जुड़े सभी संस्थानों को नष्ट कर देती है। पाकिस्तान में ऐसी अराजकता वहां के आतंकी संगठनों के लिए सबसे अच्छी स्थिति है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण कुछ को रोका गया है जबकि अन्य खुलेआम घूम रहे हैं। उनका एजेंडा कट्टरपंथी है।

भारत को पाकिस्तान के इस डरावने घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। एक और खतरा है - विदेशी ताकतें। अमरीका-चीन भी उस देश में अपनी चालें चलेंगे जहां उनके भू-राजनीतिक हित हैं। यह स्थिति क्षेत्र को नियंत्रित करने में उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को बड़ा खेल खेलने का मौका देती है। ऐसे में राजनीतिक दलों-पीटीआइ, पीएमएल-एन, पीपीपी और सेना के आंतरिक राजनीतिक हितों को उनके संघर्ष के रूप में खारिज करना बड़ी रणनीतिक गलती होगी। भारत को इन बातों पर चौकस रहना चाहिए - आतंकियों का पाकिस्तानी धरती पर रुख, पाक सेना की भूमिका और विदेशी ताकतों की गतिविधियां।