6 फ़रवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख- युवा ही स्वतंत्र करे, इस तंत्र से

राजस्थान में श्रम-तप-दान तीनों ही श्रेणी के धार्मिक कार्यों का लम्बा इतिहास रहा है। हमने अमृतं जलम्- हरयाळो राजस्थान, एक मुट्ठी अनाज जैसे अनेक सामाजिक कार्यक्रमों में जनता का हौंसला देखा है।

5 min read
Google source verification
gulab kothari

गुलाब कोठारी
राजस्थान में श्रम-तप-दान तीनों ही श्रेणी के धार्मिक कार्यों का लम्बा इतिहास रहा है। हमने अमृतं जलम्- हरयाळो राजस्थान, एक मुट्ठी अनाज जैसे अनेक सामाजिक कार्यक्रमों में जनता का हौंसला देखा है। लोकसंग्रह के कार्यों में पूरे समाज को एकजुट होकर श्रमदान-पुरुषार्थ- सहयोग करते देखा है। अपवाद कोई है तो हमारे नेता- हमारे अफसर जो केवल फाइलों का पेट भरते हैं। जनहित से इनका कोई सरोकार ही नहीं। जनप्रतिनिधि को तो लाखों लोग वोट देकर सिर पर बैठाते हैं और वे ही जनता की पीठ में छुरा घोंपते, जमीनों पर कब्जा करते, दलाली खाते नजर आते हैं। डर के मारे वे ही गुण्डे तक पालने लगे हैं। उनको पांच साल में अपनी सारी निर्लज्जता को गर्व के साथ जनता के सामने रख देना है। अधिकारी का कार्यकाल लगभग तीन दशक का होता है। उनके कार्यों का स्वरूप संगठित है। नौकर तो हैं जनता के, कार्य उनके लिए नहीं करते। आज तो खुलेआम नेताओं के साथ मिलकर शासन करने लगे हैं। इनको क्या कहना चाहिए, आप जानें!

मध्यप्रदेश में तो व्यापमं घोटाले के घाव अभी तक हरे हैं। न अफसरों को कोई सबक मिला, न नेताओं को। अब भी निडर होकर ऐसे ही घोटाले करते रहते हैं। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम भी अफसरों के शैतानी दिमाग की उपज थी। आदिवासियों को हर तरह से लूट कर भी पेट नहीं भरा तो किसानों की जमीनें छीन कर उद्योगपतियों को देने की योजना बना डाली। जब भक्षक ही रक्षक का चोला पहन कर लूट-पाट में लग जाएं तो क्या जनता को चुप बैठना चाहिए?

आज जो कुछ अराजकता, कर्महीनता, भ्रष्टाचार इनके खून में बहने लगा है, नौकरी में आने से पहले तक ऐसा नहीं था। एक जयपुर शहर पूरे राजस्थान की बानगी है। यहां अकाल राहत, जलदाय विभाग, सड़कों के हालात, सफाई व्यवस्था, यातायात, स्वास्थ्य, शिक्षा (पेपरलीक) और संगठित अतिक्रमण (जेडीए तथा नगर निगम अधिकारियों की मिलीभगत से), अवैध शराब और मादक पदार्थों से राज्य के युवा को अपाहिज करने की काली करतूत, आरक्षित क्षेत्रों में अतिक्रमण, सरकारी योजनाओं की तोड़-मरोड़ आदि के अनगिनत काम किसी से छिपे नहीं हैं। जनहित में जो करना चाहिए उसके बजाए सभी जगह गूंगे बनकर बैठे हैं। ऊपर से सवर्ण और आरक्षित वर्ग तथा अल्पसमुदायों के बैनरों का छद्म वातावरण। सबने मिलकर राज्य को पैंदे में बैठाने का संकल्प कर लिया। केवल खुद के वारे-न्यारे होते रहें।

संकल्पों का समय

आप चाहो तो सरकार को कोसते रहो, गालियां देते रहो, श्राप दे दो, ये कलियुग के देवता सुधरने वाले नहीं है। जब बड़े से बड़ा कोर्ट इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया, सरकारें क्या कर लेंगी? प्रश्न यह है क्या सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा अथवा जनता भी अपनी चूड़ियां उतारने का सोचेगी? जनहित के मुद्दों की रखवाली तो अब इन स्वामी-विरोधी सेवकों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। चारों ओर शहर बर्बाद है- चारदीवारी का सत्यानाश भाजपा की वसुंधरा सरकार कर गई थी। उसको मेट्रो से ज्यादा लाड़ था। उसने शहर में भूमिगत नहरें चलती नहीं देखी। मेट्रो विस्तार के दौर में सारे भूमिगत सिस्टम - छोटी, बड़ी चौपड़ के फव्वारे तोड़ दिए। पुरातत्व को ठेंगा दिखा गई। विश्व के सभी देशों में मैट्रो चालू है, किन्तु सत्ता का इतना नंगा नाच कहीं नहीं देखा। विकास की यह परिभाषा घर फूंक तमाशा देखने की ही कही जाएगी।

जलमहल, रामगढ़ और द्रव्यवती का कोई इतिहास पढ़े, फिर इनकी बाबर जैसी करतूतें देखें। विकास की इनकी परिभाषा ने शहर के सारे नाले ढंक दिए, नीचे से जमीन पक्की कर डाली, शहर की गलियाें में सड़कें, दरवाजों से एक-एक मीटर ऊंची हो गई। पर्यटन के नाम पर शराब का नया अवतार पैदा हो गया। उधर पिछले पांच साल में कांग्रेस की गहलोत सरकार के कार्यकाल में जो अवैध बसावट जयपुर तथा अन्य शहरों के चारों ओर हुई, जितने घुसपैठिए जयपुर में आए, उनके आधार कार्ड - अवैध वोटर कार्ड - राशन कार्ड और जमीनों के पट्टे तक जारी हुए। फर्जी-कागजी संस्थाओं को स्वीकृतियां दी गई, हाथ दुखने लग जाएंगे लिखते-लिखते। क्या-क्या कानून पास कर गए!

बड़ा मूल प्रश्न! आने वाली पीढ़ियों को क्या मिलेगा? क्या वर्तमान पीढ़ी इसी तरह नर्क में जीवन गुजारती रहेगी? नहीं! अभी तो देश में युवाओं की ताकत भी बढ़ी है और सामाजिक संगठनों की संख्या भी समय के साथ बढ़ी है। रोटरी, लायंस, महावीर इंटरनेशनल जैसी संस्थाएं भी हैं और विभिन्न समाजों और समुदायों के सामाजिक संगठन भी कार्यरत हैं। उन्हें समय की आवश्यकता के अनुसार अपनी कार्यशैली में भी परिवर्तन कर लेना चाहिए। उनको तत्कालीन परिस्थितियों में भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

यह भी पढ़ें: पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख- बदलें शोध के धरातल

अभी बरसात में सड़कें टूट रहीं है, पानी भरा है, पीने के पानी की किल्लत है। बरसात से पहले जो बाढ़ राहत के बजट बने उनका क्या उपयोग हुआ, किस अधिकारी की डॺूटी किस क्षेत्र में लगी- हमें देखना होगा। क्षेत्रवार हमें जनता के लिए उतरना पड़ेगा। अधिकारियों पर सामूहिक दबाव बनाना चाहिए। हर सदस्य अपने-अपने क्षेत्र में सूचना के अधिकार का प्रयोग करे। जनप्रतिनिधि की जनविरोधी गतिविधियों का पीछा करें। हमें भी सूचना दे सकते हैं। लोकतंत्र की परिभाषा में ‘जनता के लिए’ और ‘जनता के द्वारा’ भी सम्मलित है। इसका अर्थ वोट डालने तक ही सीमित नहीं है। पूरे पांच साल जागरूक रहकर इन्हेंकाम में लगाए रखना है। अगले चुनाव में हमारे पास आने के लिए सोचना पड़ेगा। आज तो लूटते भी हैं- गुर्राते भी हैं।

अब युवा-आंदोलन जैसे संकल्पों का समय आ गया है। इसके बिना सुधार के मार्ग लगभग बंद हो चुके हैं। नगर निगम- नगर परिषद, जेडीए- नगर विकास न्यास जैसी संस्थाओं के अधिकारी भी स्वयं आगे होकर अतिक्रमण करवाते हैं। चौथ वसूली करते हैं। पुलिस जगह-जगह ट्रेफिक रोककर वसूली करती है। खाद्य निरीक्षक-फैक्ट्री निरीक्षक जैसे इंस्पेक्टर राज के सपूत भी खूब आने लगे हैं। आप सारी बातचीत को फोन पर रिकार्ड कर सकते हो। संस्थान में सीसीटीवी लगा सकते हो। एक अभियान या जनआंदोलन के रूप में कमर कसनी चाहिए। जातियों- धर्म-समुदायों से ऊपर उठकर, एकजुट होकर युवा निकल पड़ें, तभी कुछ माहौल सुधर पाएगा। भय बिन होत न प्रीत।

यह भी पढ़ें: पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख- सरकारी ‘शक्तिमान’

एक और बड़ा कार्य करना है। सारे कार्यों की रिपोर्ट में नेताओं-अधिकारियों के नाम भी सार्वजनिक होने चाहिए। चूंकि कोर्ट के आदेश नामजद नहीं होते तो कार्रवाई किसके विरुद्ध की जाए। गहलोत सरकार ने आदेश जारी किए थे कि हर आदेश पर अधिकारी (हस्ताक्षरकर्ता) का नाम होना चाहिए। फिर कोर्ट आदेश भी उसी अधिकारी के नाम क्यों नहीं हो। न्यायाधीश भी इस विध्वंसकारी हालात के साक्षी तो रहना चाहते हैं तो सुधारक नहीं कहला सकेंगे।

हर सामाजिक संस्था को क्षेत्रवार, विभाग के कार्यों के अनुसार कार्यशैली पर विचार करना चाहिए। सामूहिक कार्य हो सके, सभी एक नई संस्था के रूप में समितियां बनाकर सरकारों -जनप्रतिनिधियों- अधिकारियों की भ्रष्ट, नकारा कार्यशैली का पीछा करे- छाया केबिनेट की तरह। सारा जनसमुदाय आपके साथ जुट जाएगा। विभिन्न संस्थाओं में अनुभवी वकील गण भी होते हैं। जब कोर्ट में किसी आदेश की पालना सरकार 4-6 माह में भी नहीं करें तो वकील, अधिकारी विशेष के खिलाफ नामजद कोर्ट की अवमानना याचिका लगा सकते हैं। कई रिटायर्ड, वरिष्ठ अधिकारी भी व्यक्तिगत रूप से अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

राजस्थान के किसान, व्यापारी, पशुपालक, युवा सभी वर्ग खुशहाल हो सकेंगे। कृष्ण के उद्घोष को याद कीजिए- वे सबके भीतर बैठे हैं।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। गीता 4/7

यह भी पढ़ें: पत्रिका में प्रकाशित अग्रलेख- मातृ देवो भव