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पत्रिका में प्रकाशित आज का अग्रलेख : विकास की भट्टी

विकास जी रहा है, भारत मर रहा है। चाहे खान-पान हो या रहन-सहन। लगता तो यही है कि भारतीयता अर्थात प्राकृतिक जीवन, से दूर भागना ही विकास है। बीमार होकर, मरना ही विकास है। विकास के नाम पर पहले रोगों को निमंत्रण देना तथा बाद में उनकी चिकित्सा करना विकास का वर्तमान रूप बन गया है।

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जयपुर

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Kirti Verma

May 27, 2024

गुलाब कोठारी
विकास जी रहा है, भारत मर रहा है। चाहे खान-पान हो या रहन-सहन। लगता तो यही है कि भारतीयता अर्थात प्राकृतिक जीवन, से दूर भागना ही विकास है। बीमार होकर, मरना ही विकास है। विकास के नाम पर पहले रोगों को निमंत्रण देना तथा बाद में उनकी चिकित्सा करना विकास का वर्तमान रूप बन गया है। छोटे-छोटे बच्चे गंभीर रोगों के शिकार हो रहे हैं। छोटी-छोटी उम्र में बच्चियों के गर्भाशय में गांठें बन रहीं है। गर्भाशय एवं स्तन कैंसर आम बात हो गई है। गर्मी का आज का अहसास भी इसी विकास का प्रसाद है। भ्रष्टाचार भी उसी विकास का वरदान है।

भारत में अभी तक भारत की शिक्षा वर्जित है। अंग्रेजी साहित्य से भारतीय संस्कृति का 36 का आंकड़ा है। हमें अपने ज्ञान पर भरोसा नहीं है। नकल में विश्वास भी है और गर्व भी। परीक्षा में छात्र को नकल करने पर सजा मिलती है, किन्तु शिक्षित नागरिक जब जीवनशैली में विदेशी नकल करता है, तो यह उसका मौलिक अधिकार बन जाता है। उदाहरण के लिए यदि राजस्थान का व्यक्ति बाजरा-ज्वार-मक्का न खाकर गेहूं-चावल (जल प्रधान अन्न) खाता है तो बीमार पड़ने का उसका अधिकार है। उन्नत बीज-खाद-कीटनाशक मिले हों तो और भी विकसित कहलाएगा। यही हाल फलों-सब्जियों-दूध आदि का है। सब विदेशी हो गए। पशु तक विदेशी हो गए। हमारा संपूर्ण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया।

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प्रकृति में न तो दो व्यक्ति एक जैसे होते हैं, न ही दो भू-भाग। हर भू-भाग का अपना एक निश्चित स्वरूप (प्राकृतिक) होता है। अनाज, जल, पशु-पक्षी- बोली-देवी-देवता, वेशभूषा और यहां तक कि शरीर तक का गठन बदल जाता है। भारत गर्म देश है, पश्चिम शीत क्षेत्र है। भारत और पश्चिम के लोग, अन्न, पशु सभी विपरीत प्रकृति वाले होते हैं। शीत प्रदेश में जो कुछ पैदा होगा, वह उष्ण प्रकृति का होगा। वहां की जीवनशैली हमारे लिए हानिकारक होगी।

चूंकि पश्चिम में वर्ष भर (भारत के सापेक्ष) शीतकाल रहता है, वहां कई वस्तुओं को लम्बी अवधि तक सुरक्षित रख पाते हैं। भारत में तीन मुख्य ऋतुएं होती हैं। सर्दी और गर्मी की फसलें (स्यालू-उन्यालू) भी विपरीत प्रकृति की होती है। भोजन का स्वरूप बदल जाता है। यह अलग बात है कि एसी/फ्रीज की सहायता से हम तापमान नियंत्रित रखने में समर्थ हो जाते हैं, किन्तु पदार्थ की रासायनिक प्रक्रिया तो हम नहीं रोक सकते। दूध-चॉकलेट-मक्खन आदि महिने भर तक खा तो सकते हैं किन्तु इनके भीतर होने वाले रासायनिक परिवर्तनों को नहीं रोक सकते।

हमारा शरीर और पश्चिमी मनुष्यों के शरीर की प्रकृति भी भिन्न होती है। वहां व्यक्ति उष्णता (खान-पान, वेशभूषा, मकान आदि) को प्राथमिकता देगा। वे सभी वस्तुएं हमारे लिए भी गुणकारी साबित हों, आवश्यक नहीं है।

बारूद के ढेर पर
हमारे यहां मकान मिट्टी के थे- इसी पृथ्वी का अंग थे, जिस पर हम पैदा हुए हैं। विकास ने कच्ची मिट्टी को मिट्टी की ईंटों में बदल दिया। स्कूल में हमें काली मिट्टी की ईंटे बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता था। कुछ धनाढॺ परिवार चूना-पत्थर के मकान बनाने लगे। ये मकान भी विपरीत तापमान रखते थे। जिस प्रकार तालाब-कुएं का पानी दिन में ठण्डा और रात को उष्ण रहता है, उसी प्रकार पत्थर- चूने- मिट्टी के मकान भी दिन में ठंडे- रात को गर्म रहते हैं। प्राकृतिक वातानुकूलता रहती है। ये मकान आज पिछड़ेपन की परिभाषा में चले गए। शहरों में तो इनके कारीगर तक लुप्त हो गए।

नए-विकसित सीमेंट-लोहे के नए आवास का युग आ गया है। कितने लोग स्वीकार करेंगे कि ये इस देश की जलवायु के अनुकूल नहीं है। आज तो पश्चिम भी दु:खी है। आज जब हमारे यहां तापमान 50 डिग्री पहुंच रहा है तो सीमेंट के मकान 5-7 डिग्री अधिक गर्म होंगे। उनमें लगी लोहे की छड़ें (सरिए) उनको भट्टी बना देती है। कितने लोग 24 घंटे एसी लगाकर जी सकते हैं-? मध्यम वर्ग भी काम पर बाहर 45-50 डिग्री में रहेगा, रात को शीत में। शरीर की रोग निरोधक क्षमता टूटेगी या विकसित होगी? मकान में लगी लोहे की छड़ें भी गर्मी से नरम पड़ती जाएंगी। समय के साथ ये मुलायम पड़ती जाएंगी। ऊंची इमारतों के झुकने की संभावनाएं बढ़ती जाएंगी। शीत प्रधान देशों में यह समस्या होती ही नहीं। हमारे यहां तो सर्दी में जब लोहा ठण्डा हो जाता है तो मकान भी रेत की तरह ठण्डा हो जाता है। जहां दिन में लोग पापड़ सेंक लेते हैं। कितने परिवार मकान को गर्म करके जी सकते हैं। पश्चिम में हर मकान में गर्मी की व्यवस्था है। जमीन के नीचे फर्श को गर्म रखने तक की जरूरत पड़ जाती है।

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हमारे यहां नेताओं- अधिकारियों- बड़े लोगों को लॉन रखने की छूट भी मिल जाती है। भले ही मोहल्ला प्यासा मरता रहे। बहुमंजिला विकसित मकान तो हरियाली से पूर्णत: कट जाते हैं। बस लू के थपेड़े आ सकते हैं। बहुमंजिला इमारतों में हवा-रोशनी के लिए रोशनदान (वेंटिलेशन) तो होते ही नहीं। आग लग जाए तो कमरों में भी मुश्किल से एक खिड़की होती है। बाहर निकलना तक मुश्किल हो जाता है। आग में फंसे लोगों का दम तो घुटेगा ही। रोशनदान की यह व्यवस्था तो चौबीसों घंटे रहनी ही चाहिए। यही हाल बहुमंजिला इमारतों में केन्द्रीयकृत वातानुकूलन (सेंट्रलाइज्ड एयरकूलिंग) सिस्टम में होता है। एक बड़े क्षेत्र में इससे वातानुकूलन तो संभव है लेकिन एक-दूसरे से जुड़े रहने के कारण आग-धुंआ सब जगह पहुंच जाती है। कोई 38वीं या 40वीं मंजिल पर रह रहा है। आग बुझाने के लिए सीढ़ी का उपयोग होगा तो वक्त कितना लगेगा? घरों में सिंथेटिक्स-लकड़ी- गलीचे व दूसरा सामान जलने में मिनटों लगते हैं घंटे नहीं। कई मामलों में तो आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड के पहुंचने के पहले ही सब कुछ राख हो जाता है। कहना नहीं होगा कि विज्ञान ने सबको बारूद के ढेर पर बैठा रखा है।

विकास का दूसरा नाम मौत की भट्टी है। कृत्रिम गर्मी से अधिक त्रस्त है। कृत्रिम खाने से रोगग्रस्त है। विकास के कैंसर से जीवन नारकीय हो रहा है। भ्रष्टाचार के विकास का भी इलाज नहीं है। हमें मरना ही होगा। जो व्यक्ति कैंसरग्रस्त है, क्या उसके आगे 50 डिग्री तापमान अधिक कष्टकारक है? जीवन अलग-अलग स्तर पर विकास की अवधारणाओं से बस सुलग रहा है। इस जलन को बनाए रखना ही शायद जीवन के विकास का उद्देश्य है।