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Patrika Opinion: अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के नियम बदलने का समय

फाइनल में सौ ग्राम वजन बढऩे पर वह फाइनल के लिए पात्र साबित नहीं हुई, तो उसे फाइनल से ही वंचित किया जाना चाहिए या फाइनल तक के उसके पूरे सफर को खारिज किया जाना चाहिए?

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पेरिस में हाल में संपन्न ओलंपिक खेलों की कुश्ती प्रतियोगिता में भारत की पहलवान विनेश फोगाट के साथ का घटनाक्रम विनेश और भारत के लिए तो बहुत बड़ा आघात साबित हुआ ही है, यह कुश्ती जगत को भी नुकसान पहुंचाने वाला है। ओलंपिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन होता है। दुनिया के सभी खेल फेडरेशन इससे जुड़े होते हैं। सभी अपनी ओर से भरसक कोशिश खेलों के आयोजन को प्रतिस्पद्र्धी, निष्पक्ष और साफ-सुथरा बनाने की करते हैं। इसके बावजूद विनेश फोगाट जैसा प्रसंग सामने आया है, तो यह इन सभी संस्थाओं पर सवालिया निशान है और संस्थाओं के लिए सोचने का समय है कि खेलों के नियमों को एक बार फिर गहराई से देख लिया जाए। खेलों और इनके नियमों की विसंगतियों पर बात कर ली जाए और इन्हें दूर करने के कदम उठा लिए जाएं।

विनेश फोगाट भारत की हैं, सिर्फ इसलिए नहीं, बल्कि इसलिए कि उनके साथ जो कुछ हुआ, वह वास्तव में अन्याय है। विनेश ने खेलों के सभी नियम-कायदों पर खरा उतरते हुए एक के बाद एक तीन मुकाबले जीतकर फाइनल में प्रवेश किया था। फाइनल में सौ ग्राम वजन बढऩे पर वह फाइनल के लिए पात्र साबित नहीं हुई, तो उसे फाइनल से ही वंचित किया जाना चाहिए या फाइनल तक के उसके पूरे सफर को खारिज किया जाना चाहिए? आम भारतीय की नजर में विनेश के साथ यही अन्याय हुआ है। फाइनल तक की उनकी पूरी यात्रा नियमपरक और सभी मापदंडों पर खरी थी, तो उसका श्रेय और इसके लिए बनने वाला फल तो उन्हें दिया जाना चाहिए। इन हालात में वह फल रजत पदक था। यह दुर्भाग्यजनक है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन फॉर स्पोट्र्स ने विनेश की अपील खारिज कर दी। यह कोर्ट परंपराओं पर चला, जबकि इस मामले में नई परिस्थितियों में नई नजीर पेश करने की गुंजाइश थी। इससे विनेश के साथ भी न्याय हो जाता और भविष्य में कई और विनेश बनने की आशंका भी खत्म हो जाती।

पूरे प्रकरण से अंतरराष्ट्रीय कुश्ती फेडरेशन और ओलंपिक समिति को यह तो समझ आ गया होगा कि एक दिन में एक मुकाबला खेलने वाले और दो चार घंटे में तीन स्पद्र्धाओं में पूरा दमखम झोंकने वाले पहलवान की उस दिन की खुराक अलग-अलग होगी, जो वजन में उतार-चढ़ाव का कारण बन सकती है। वजन नियंत्रण में रहे और सभी पहलवानों को इसके लिए बराबर समय मिले, यह व्यवस्था इन संस्थाओं को करनी होगी। फेल होने वाले पड़ाव से पूर्व की उपलब्धियों को खारिज करने की व्यवस्था तो तुरंत बदल लेनी चाहिए, ताकि दुनिया में फिर किसी खिलाड़ी को विनेश जैसा अन्याय न झेलना पड़े।