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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पराजित करने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की मुखिया ममता बनर्जी का कद निश्चित रूप से बढ़ा है और वह उस बढ़े कद के अनुसार विपक्ष की राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रही हैं। हालांकि, यह भी हकीकत है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हैसियत महज एक क्षत्रप से ज्यादा की नहीं है। इसीलिए राष्ट्रव्यापी पहचान और पैठ रखनेवाली कांग्रेस को उन्हें अपना नेता मानने में दिक्कत है। राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का नेतृत्व कर रहीं सोनिया गांधी को तो यह कतई मंजूर नहीं होगा कि इसका नेतृत्व ममता बनर्जी या किसी अन्य क्षत्रप के हाथ में चला जाए।
लोकसभा में संख्याबल को भी देखें तो टीएमसी (22 सांसदों) वाइएसआर कांग्रेस के साथ चौथे पायदान पर है। डीएमके के सदस्यों की संख्या 24 और कांग्रेस की 53 है। लोकसभा सदस्यों का संख्या बल, हालत पतली होने के बावजूद, कांग्रेस को ही विपक्ष का स्वाभाविक नेता मानने की मजबूरी पैदा करता है। यह अलग बात है कि सोनिया गांधी अब 2004 की तरह प्रभावशाली नहीं रह गई हैं। इसके बावजूद, यह सच है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने में कांग्रेस की भूमिका अब भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण बनी हुई है। इसीलिए मुंबई में ममता की राजनीतिक मुलाकातों से पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के बिना विपक्ष का कोई गठबंधन बेमानी है। ममता बनर्जी की राजनीतिक मुलाकातों और बातों से स्पष्ट है कि वह भाजपा के खिलाफ प्रभावशाली मोर्चा बनाने के लिए सक्रिय हैं। वे पुराने गठबंधन को ही आगे बढ़ाने की बजाय किसी नए गठबंधन की ओर बढऩा चाहती हैं। ममता बनर्जी ने यह कहकर एक नई राजनीतिक खलबली तो मचा दी है कि अब यूपीए का अस्तित्व नहीं है। साफ है कि वह विपक्ष का एक नया ऑर्डर चाहती हैं, जिसमें उनके लिए महत्त्वपूर्ण जगह हो। वैसे भी ममता बनर्जी 2004 में यूपीए का हिस्सा नहीं थीं। पश्चिम बंगाल में उम्मीद से ज्यादा सीटें जीतने के बाद राज्यसभा में उनके लिए स्थितियां बेहतर हुई हैं। विभिन्न राज्यों के क्षत्रप देखो और आगे बढ़ो की नीति पर चल रहे हैं।
देखना होगा कि बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस अपने आप को कैसे प्लेस करती है। आखिरकार कांग्रेस की पोजिशनिंग के आधार पर यह तय होगा कि आगामी चुनाव में विपक्ष की खिचड़ी पकेगी या नहीं। निश्चित रूप से भाजपा की नजर भी इसी पर टिकी होगी। क्योंकि, देखा यही जा रहा है कि जहां क्षत्रप मजबूत हैं, वहां भाजपा की दाल नहीं गल पा रही है।
Published on:
03 Dec 2021 11:57 am
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